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एक अच्छा दिन

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यह संयोग ही था कि नया साल और जुलेखा का जन्मदिन एक साथ ही पड़ता था। अमूमन सभी दोस्तों को याद भी रहता था इसलिए हैप्पी न्यू ईयर के साथ हैप्पी बर्थडे भी चल जाती थी। इस साल एक और खास बात भी हुई कि उसका वीकली ऑफ भी उसी दिन पड़ गया। जुलेखा ने तय किया कि आज का यह दिन वह सिर्फ अपने लिए रखेगी। सुबह आठ बजे वह धर्मशाला जाने वाली बस में थी, वहां से उसे मैक्लोडगंज जाना था।
मैक्लोडगंज की बस में ज्यादा भीड़ नहीं थी, पर जाने का समय आते-आते पूरी बस भर गयी। छोटी बसें पहाड़ी घुमावदार रास्तों के लिए ठीक होती हैं , पर इनकी लदान देख कर छक्के छूट जाते हैं। बस अब देवदार के वृक्षों के बीच से हो कर गुजर रही थी। घाटी में खासी धुंध थी। वह भी ऐसी कि कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा था। धुंध की एक परत बस के चारों ओर झीने परदे की तरह फ़ैल गई थी। खिड़की के पास बैठी जुलेखा के चेहरे को धुंध की नमी छू गई।
-फरसेट गंज। कंडक्टर जोर से चिल्लाया और बस एक धक्के के साथ रुक गई … कुछ सवारियां उतरीं, कुछ चढ़ीं और बस आगे बढ़ गई। यह इलाका अंग्रेजों का कब्रिस्तान रहा था,आज भी उनके निशानात वहां थे। काफी टूटी-फूटी कब्रें थीं हां यह कॉलेज बंक कर के आए युवा जोड़ों के लिए सुरक्षित जगह थी। बस की खिड़की से जुलेखा ने देखा, कई जोड़े कब्रिस्तान के सन्नाटे में बैठे बातें कर रहे थे। जाहिर था कि ऐसा सन्नाटा तो उन्हें और कहीं मिल भी नहीं सकता था।
कब्रिस्तान और प्यार ? जुलेखा के होंठो पर हंसी तिर आई। हरे देवदार के नीचे लार्ड एल्गिन की खूबसूरत कब्र थी और सेंट जॉन चर्च सन्नाटे में डूबा था।
बस मैक्लोडगंज पहुंची और सवारियों को उतार कर वापस मुड़ गई। जुलेखा ने अपना बैग संभाला और सड़क पर आ गई । यहां से जुलेखा ने सीधे बौद्ध मंदिर की राह पकड़ी। नया साल होने की वजह से टूरिस्ट अधिक थे, गाड़ियों के हॉर्न बज रहे थे। थोड़ी दूर जा कर एक छोटा सा बौद्ध मंदिर आया, एक बौद्ध भिक्षु मन्त्र पढ़ता हुआ प्रेयरव्हील घुमाता जा रहा था। जुलेखा भी इस कौतुक में शामिल हो गयी। जल्दी ही यह सिलसिला ख़त्म हो गया। भिक्षु मंत्र पढ़ता हुआ आगे चला गया और जुलेखा हंसती हुई बाहर आ गयी. . .. .. ..
सड़क पर धूप खिली थी पर घाटी में अभी भी धुंध का साम्राज्य था। सड़क के दोनों ओर दुकाने थीं , रंगीन पत्थरों, क्रिस्टल्स और पुरानी मूर्तियों की दुकानें । पटरी पर बैठी तिब्बती औरतें अपना सामान सजाये थीं बौद्ध मन्त्रों के स्वर हवा में गूंज रहे थे… इस सड़क की यह खास पहचान थी। सामने पेस्ट्री हट के पास विदेशियों का एक ग्रुप बातें कर रहा था। उसे लगा जैसे कोई आवाज दे रहा हो। उसने मुड़ कर देखा, तीर की तरह एक विदेशी युवती ने आ कर उसे बाहों में भर लिया।
-कितने दिनों बाद तुम्हे देखा लैका, हैप्पी बर्थडे एंड हैप्पी न्यू ईयर।
तुम यहाँ? जुलेखा के स्वर में हैरानगी थी।
दोस्तों के साथ आई यहाँ विपश्यना का कोर्स कर रही हूँ।
वह उसे खींचते हुए पेस्ट्री हट तक ले गई , एक बड़ी सी पेस्ट्री उसके हाथों में थमा कर बोली – इसे मेरे सामने खाओ।
-और तुम जूलिया ?
– मैं तुम्हे खाते हुए देखूंगी और अपनी कॉफी ख़त्म करूंगी।
-थैंक्स , जाने क्यों जुलेखा की आंखों में बादल आ गए। इस नए साल और उसके जन्मदिन का यह पहला उपहार था।
-बॉय लैका। जूलिया ने कहा और भाग कर अपने दोस्तों में जा मिली।
एक साल पहले की मुलाकात थी पर जूलिया उसे भूली नहीं थी।
फ़िलहाल दिन की शुरुआत अच्छी हुई थी , जुलेखा एक बुक स्टाल में चली गयी।
-इस साल की नयी पब्लिश कोई किताब होगी ?
– है क्यों नहीं , अरविन्द अडिगा की व्हाइट टाइगर है, चेतन भगत की किताब है और टैगोर का नया कलेक्शन आया है। जुलेखा ने टैगोर की वाटरफॉल किताब ली। अचानक उसकी निगाह एक और किताब पर पड़ी , इसका नाम था – द रोड लेस ट्रेवेल्ड,
-यह हाफ रेट पर है टूरिस्ट आते हैं खरीद कर पढ़ते हैं और जाते वक्त आधे दाम में बेच कर चले जाते हैं। जुलेखा ने वह किताब भी खरीद ली।
एक बेंच पर बैठ कर उसने सबसे पहले वही किताब निकाली । पहले ही पेज पर लिखा था –
डियर कविता ,
दिस बुक सेज लाइफ इज हार्ड सम टाइम्स , बट सम टाइम्स यू मेक मी फील लाइक दैट, आइ होप दिस बुक विल मेक यू थिंक, नेवर स्टॉप क्वेश्चनिंग ,
– लव विकी
तो क्या विकी ने यह सन्देश लिखने के बाद कविता को देना जरूरी नहीं समझा या फिर कविता ने इसे पढ़ने के बाद अपने पास रखना नहीं चाहा था और आधे दाम पर बुकस्टॉल पर बेच कर चली गई थी।
इस संदेश का मूल्य क्या था ….. कौन थे ये कविता और विकी ?
टूरिस्ट, दोस्त या प्रेमी जिनका सफर यहीं पर खत्म हो गया था।
उसने अब भागसूनाग का रुख किया। झरने तक का सफर चढ़ाई का था सामने स्लेट के पहाड़ थे। स्लेटें अपने आप टूट कर खनकती हुई घाटी में गिरती थीं और एक गूँज सी हवा में छोड़ जाती थीं। कुछ युवा झरने के किनारे की चट्टानों पर थे , वे हंस रहे थे , चीख रहे थे , खिलखिला रहे थे और खुल कर एक- दूसरे को गालियां दे रहे थे। झरने का पानी जहां खड्ड में गिर रहा था वहां एक बड़ी सी चट्टान पर लिखा था -सेव एनवायरनमेंट।
लौटते हुए बस आराम से उतरती जा रही थी ,पहाड़ों के ऊपर बादलों के गुच्छे थे .. जाने कैसे उसे अचानक साहिल की याद आ गई। किसी हल्की हवा की तरह छू कर गुजर जाने वाली स्मृति।
चैप्टर क्लोज हो चुका था पर यादें बाकी थीं।
प्यार के जख्म गहरे थे पर कुछ खूबसूरत लम्हे भी यादों में थे।
जिंदगी भी मानो बस का सफर हो गई थी पड़ाव आया और हर आदमी हाथ छुड़ा कर उतर गया।
जुलेखा घर पहुंची तो थक कर चूर हो चुकी थी ….
रात बारिश हुई और सुबह बर्फ ने डेरा डाल दिया। उसने आंखें खोलीं और ईश्वर का धन्यवाद किया कि कल का दिन अच्छा बीत गया था।
दोपहर की डाक से ग्रीटिंग कार्ड्स के साथ एक लिफाफा चला आया था। इस पर जुलेखा का नाम नहीं था।
उस पर लिखा था-टू पर्ल
मैक्लोडगंज, धर्मशाला हिमाचल
फ्रॉम डिक
अब ऐसे खत को ठिकाने तक तो क्या पहुंचना था। उसने लिफाफा खोला , अंदर एक सुन्दर सी नायलॉन की तितली थी और कुछ नहीं। नीले रंग की सुंदर पंखों और चमकीली आंखों वाली तितली।
जुलेखा ने डायरी निकली और लिखना शुरू किया…..
नया साल और मेरा जन्म दिन
एक तितली किसी अनजान पर्ल के नाम, जो मेरे पास चली आई।
सिर्फ मैं ही अकेली नहीं और भी मेरे जैसे लोग हैं जैसे कि विकी और कविता…..
पर्ल और डिक
विकी का अकेलापन एक किताब के पन्ने में दर्ज हो कर रह गया है और डिक की ख्वाहिशें उस रंगीन तितली में कैद थीं।
कौन थे ये पर्ल और डिक ?
जाने क्यों जुलेखा को लगा कि यह लड़की का असली नहीं बल्कि डिक का दिया हुआ नाम था , प्यार का नाम।
पर डिक ने उसे तितली क्यों भेजी थी ?
वैसे प्यार करने वाले अनोखे काम किया ही करते हैं।
फ़िलहाल साल का पहला दिन सचमुच अच्छा बीत गया था

-प्रिया आनंद

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