खामोश सरहदें

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वह गर्मियों की रात थी, बनारस रेलवे स्टेशन से जब तांगा उन्हें लेकर रेवड़ी तालाब की पतली सी गली के मुहाने पर पहुंचा , तो सबने जैसे राहत की साँस ली। गली के अंदर पहुंच कर वे एक नीले दरवाजे के सामने रुके। तांगे वाले ने दरवाजा खटखटाया

-कौन है? किसी ने ऊपरी मंजिल से झांका।
मेहमान आए हैं, तांगे वाले ने जवाब दिया।
किसी के सीढ़ियों पर आने की आहट हुई, दरवाजा खुला और नन्हे भैया दिखाई दिए। उन्होंने मां के पैर छुए और सामान ले कर अंदर चले गए। सीढ़ियां खासी चक्करदार थीं। यह सीढ़ी हॉल कमरे तक जाती थी। इस कमरे में मोटे गद्दे बिछे थे। सुवीरा वहां पहुंचते ही एक तरफ ढेर हो गयी। यहां खिड़कियां काफी बड़ी थीं, पश्चिम की तरफ की खुली खिड़की से आकाश दिखाई दे रहा था.… विस्तृत नीला आकाश , चांद पर बादलों की परछाइयां थीं। जल्दी ही सुवीरा गहरी नींद में सो गयी.. । सुबह उसकी आंख खुली तो अंधेरा धीरे-धीरे छंट रहा था। उसने बालों को यों ही समेट लिया और छत पर चली गई। रात भले ही गर्म थी पर सुबह खूबसूरत थी। हवा का एक झोंका आ कर उसके बालों को छेड़ गया। घाट पर चहल-पहल दिखाई देने लगी थी। वैसे भी काशी के घाट भोर के पहले ही जाग जाते हैं। विश्वनाथ मंदिर की घंटियों की मधुर गूंज के बीच अचानक ही अज़ान की आवाज उभरी और सुवीरा की पलकें झंप गयीं। सूरज आहिस्ते से ऊपर उठा और गंगा की जलधारा सिन्दूरी हो उठी। स्याह दिखती डोंगियों में से आवाज आई-हैया हो… .
-जै गंगा मैया …. कोई जोर से चिल्लाया और फिर ख़ामोशी छा गयी।
फिर तो जैसे सारा बनारस जाग गया। अब आसमान के विस्तार में रंग बिरंगी पर फड़फड़ाती तितलियों की तरह उड़ रही पतंगें थीं।
सामने नवाब आफ़ताब की लाल ईंटों वाली इमारत दिख रही थी.. बड़ा सा गेट और बाउंड्री के अंदर दशहरी आमों का बाग़। अनार के दरख़्त पर खाकी अनार झूम रहे थे। बचपन में इन्ही अनारों को बच्चे कितनी हसरत से देखते और मन मसोस कर रह जाते थे। आफताब बिल्डिंग की बालकोनी में दो लड़कियां खड़ी थीं। उसे देखते ही उन्होंने सुवीरा को पास आने का इशारा किया। वे खूबसूरत लड़कियां थीं, एक ने गुलाबी सूट पहन रखा था और दूसरी ने फिरोजी। सुवीरा तेजी से सीढ़ियां उतरने लगी और इसी झोंक में किसी से टकरा गयी। नीचे से आने वाले ने उसे संभाल लिया। उसने धीरे से उसकी आंखों में झांका।
-आंखें तो खासी बड़ी हैं देख कर क्यों नहीं चलतीं ?
-आपने ही क्यों नहीं देखा, कहते हुए वह तड़प कर उससे अलग हो गई। सीढ़ियों से उतर कर उसने मुड़ कर देखा, वह वहीं खड़ा था हंसता हुआ।
अनमने मन से उसने गली पार की और आफताब बिल्डिंग में दाखिल हो गई। दोनों लड़कियां गेट के पास ही थीं बड़ी का रंग चम्पई था और छोटी की रंगत ऐसी थी मानो दूध में केसर घुल गई हो। बात करते उसके होंठ थरथरा उठते थे।
-मैं सायरा आफताब और ये मेरी बाजी नज्मा यास्मीन। कहते हुए उसने सुवीरा के दोनों हाथ थाम लिए।
-यह नन्हे की बहन है , सायरा ने नज़्मा से कहा।
-पर उनकी सगी बहन तो कोई नहीं?
-वे मेरे कजिन ब्रदर हैं, हम उनकी शादी में आए हैं।
सुवीरा को सायरा अपने कमरे में ले गई नज्मा का कमरा उसके बगल वाला था, जहां कैनवस पर एक अधूरी तस्वीर थी। चांदनी रात … चमकता चांद, बल खाती नदी और पानी में अपने चेहरे देखते पेड़।
-नज़्मा बाजी को तस्वीरें बनाने का शौक है।
-और तुम्हें?
-मैं सितार सीखती हूं।
दोनों ने मिल कर उसकी हथेलियों पर मेंहदी रची … सुन्दर बेल बूटे।
सुवीरा ने जैसे ही घर में कदम रखा, उसके हाथों में सुर्ख मेंहदी का रंग देखते ही दादी का पारा चढ़ गया।
-तू वहां से मेंहदी लगवा के आई, मुसलमानों के घर की मेहंदी। कौन तेरे हाथ का पानी पिएगा. .
-दादी, क्या पता आपका अगला जन्म किसी मुस्लिम घर में हो और आपको नमाज पढ़नी पड़े।
नन्हे भैया जोर से हंस पड़े। दादी कुछ कहतीं इससे पहले ही वे उसे हॉल कमरे में खींच ले गए।
-मैं तुझे अपनी शादी के मौके पर कुछ देना चाहता हूं। बोल क्या लेगी, बनारसी सूट या साड़ी या फिर कोई जेवर ?
-मुझे चांदी के नक्काशी वाले कंगन चाहिए।
-सोने के क्यों नहीं?
-मुझे चांदी के अच्छे लगते हैं।
उसने कहा और कमरे से बाहर आ गई।
story-2घर के सामने थोड़ी सी कच्ची जमीन थी वहीं मंडप बनाया गया। हरे बांस का मंडप लकड़ी के रंगीन तोते और मंडप के चारों ओर सजे अमलतास के फूलों के गुच्छे, रंगबिरंगी झंडियां। दिन भर सुहाग के गीत गए जाते रहे। शाम को इसमें नज़्मा और सायरा भी शामिल हो गयीं। नज़्मा रस्ट कलर की नकाब में थी और सायरा की नकाब काली थी। संगीत की उस महफ़िल में जब सायरा ने नकाब उठाई तो लोग ठगे से रह गए। हल्दी की रस्म पूरी कर सुवीरा उठी तो सायरा उसे अपने घर खींच ले गयी। उसके अम्मी-अब्बू रिश्तेदारी में गए थे घर में सिर्फ नज़्मा थी।
– आज तुझे नज़्मा बाज़ी की शादी का जोड़ा पहना कर देखूंगी वैसे बाजी ट्रायल ले चुकीं हैं।
यह सुवीरा का बचपना ही था कि वह इसके लिए राजी हो गई। मैरून कलर के जोड़े पर सलमा सितारे और जरी का भारी काम था। सायरा ने उसे कपड़ों के साथ जेवर भी पहना दिए।
-क्या गजब की लग रही है , बाज़ी देखो तो सही।
नज़्मा कमरे में आई तो ठिठक कर रह गयी – खुदाया, ये नूर कहां छिपा हुआ था ? उसके मुंह से निकल गया।
-मैं कैसे देखूं ? सुवीरा उत्सुक थी।
सीढ़ियों से ऊपर चली जाओ वहां आदमकद शीशा है। मैं कैमरा लेकर आती हूं।
सुवीरा एक-एक कदम बढ़ाती उस कमरे तक पहुंच गयी। शीशे में खुद को देख वह हैरान रह गई। यह रोज वाली सुवीरा तो न थी इतनी सुन्दर और आकर्षक। नथ का मोती थोड़ा भारी लग रहा था। उसे ठीक करने को उसने हाथ उठाया तो चौंक गई। शीशे में कोई और भी था, उसने पीछे मुड़ कर देखा, दरवाजे पर दोनों हाथ टिकाए वह उसे देख कर मुस्कराए जा रहा था। सिर्फ दो दिन पहले सीढ़ियों पर उससे टकराने वाले को वह इतनी जल्दी तो नहीं भूल सकती थी।
– बन्दे को नवरोज कहते हैं उसने हंसते हुए कहा।
-मुझे जाने दीजिये सुवीरा की आवाज कांप गई।
– बिल्कुल , पर तुम इतनी बदहवास क्यों हो ? उसने सुवीरा के सर से सरकता दुपट्टा ठीक कर दिया। मैं तो यह सोच रहा था कि उस दिन जो लड़की मुझसे सीढ़ियों पर टकराई थी , वह बदस्तूर मेरे सपनों में आने लगी है , आज वह मेरे कमरे में दुल्हन बन कर खड़ी है। आज क्या होगा… कहते हुए वह दरवाजे से हट गया। सुवीरा गिरती पड़ती भाग चली। सीढ़ियों से नीचे खड़ी सायरा हंस-हंस कर दोहरी हुई जा रही थी।
-क्या हुआ ? नज़्मा किचन से बाहर निकल आई।
-बाज़ी, भाईजान , सोच रहे होंगे कि शादी तो हुई नहीं, ये दुल्हन कहां से आ गई।
– तुमने इसे वहां क्यों भेजा?
-मुझे क्या पता था कि इसी बीच भाईजान आ जाएंगे।
कपड़े बदल कर सुवीरा ने दरवाजे की झिरी से झांक कर देखा वह सीढ़ियों से उतर रहा था। यही उस घर का बेटा था.. फ्लाइट लेफ्टिनेंट नवरोज़
-भाई जान खाना, नज़्मा ने कहा।
-मन नहीं, कह कर वह चला गया।
सुवीरा कमरे से बाहर आई तो उसे स्कर्ट टॉप में देख कर सायरा चौंक गई।
-यह क्या कपड़े बदल लिए और तस्वीर ?
– नहीं खिंचवानी मुझे। उसने कहा और बाहर निकल गई।
सुवीरा जा कर घर की भीड़ में शामिल हो गई , किसी ने पूछा भी नहीं कि वह कहां थी।
उस शाम सभी की चारपाइयां छत पर लगीं। छत काफी बड़ी थी , सुवीरा कोने में बिछी चारपाई पर जा कर सो गई। ठंडी चांदनी में सोई सुवीरा की आंखों में जैसे एक सपना सा तिर आया। … वही खूबसूरत चेहरा, होंठ टेढ़े कर हंसता नवरोज… उसके सर से सरकता दुपट्टा संभालता। वह और करीब आया तो सुवीरा ने आंखें खोल दीं। वह उठी, कोने में रखी सुराही से पानी पिया और फिर लेट गई। नींद उसकी आंखों से गायब हो चुकी थी। सुवीरा ने वह रात जागते हुए गुजारी। मन ही मन उसने तय कर लिया था कि अब वह सायरा के घर नहीं जाएगी..। जिस दिन दुल्हन आई , काफी भीड़भाड़ थी इसी गहमा गहमी के बीच एक बच्चा सुवीरा के हाथ में एक पर्ची थमा गया। लिखा था – सुवी उस दिन की बात का ख्याल न करना खत पाते ही चली आओ प्लीज मैं बहुत मुश्किल में हूं। खत मोड़ कर उसने स्कर्ट की जेब में रखा और सायरा के घर चली गई। सायरा की आंखों में आंसू थे।
-सुवी, भाई जान। …तीन दिन से तेज बुखार है। अम्मी अब्बू हैं नहीं और नज़्मा बाजी दूसरे शहर पेपर देने गयी हैं।
ओह रिलैक्स, तुम्हारा कोई फैमिली डॉक्टर तो होगा , उसे फोन करो तब तक मैं देखती हूं।
सुवीरा ने माथे पर ठन्डे पानी की पट्टी रखी , तो वह आंखें खोल मुस्कराने लगा।
– मैं जानता था , तुम जरूर आओगी. .
story5वह बेहद खूबसूरत था अपनी बहन सायरा की तरह, पर उसकी आंखों में उदासियों के भंवर मचलते थे।
डॉक्टर आया, उसने देखा , ताकीद भी की , कि लापरवाही करने से बुखार टायफायड में बदल सकता है। सायरा तीन दिन की जगी हुई थी सुवीरा ने उसे आराम करने भेज दिया और खुद पानी की पट्टियां बदलती रही। शाम पांच बजे के करीब नवरोज ने आंखें खोलीं। कुछ देर वह उसे नासमझी के आलम में देखता रहा , फिर बोला- तुम्हीं हो न , क्यों आईं तुम मेरी जिंदगी में ? तीन दिन से मैं यही सोच रहा हूं कि धर्म, समाज की दीवारों के पार से मैं तुम्हें अपने करीब ला सकूंगा या नहीं, उसने अपना सर सुवीरा की गोद में रख दिया. ..।
कांप उठा सुवीरा का सारा जिस्म। नवरोज़ के चेहरे की तपिश उसके शरीर में उतरती जा रही थी। जाने क्यों सुवीरा की आंखें भर आईं।
उसकी आंखों से आंसू गिरे और नवरोज के रेशमी बालों में समा गये.. उसने धीरे से उसका सर तकिये पर रखा और उठ कर रोशनी जला दी ।
-मैं घर जा रही हूं, सायरा को भेजती हूं। कह कर वह कमरे से बाहर आ गई।
उसी रात नन्हे भैया ने उसे चांदी के कंगन देते हुए कहा- मुझे तो ऐसी खरीददारी करनी नहीं आती पर महीन नक्काशी वाले ये कंगन नवरोज़ ने पसंद किए थे।
फिर नवरोज़… उसका दिल धड़क गया।
उस रात उसकी नींद भी क्या थी मानो सपने ही देने आई थी। गहरी नींद के बीच उसने देखा , नीला आकाश … सफेद बादलों के गुच्छेऔर लहरों पर तैरती कश्ती में अकेली लेटी वह खुद। अचानक बादल का एक टुकड़ा उतर कर उसके चारों और फ़ैल गया। इसी धुंध में उसने नवरोज़ को अपने करीब पाया। अपने चेहरे को छूते नवरोज़ के होंठो को वह रोक नहीं पाई। वही सुन्दर चेहरा , पर उन आंखों की उदासी देख कर तड़प गई सुवीरा।
-तुम इतने उदास क्यों रहते हो ?
-तुम नहीं मिलतीं इसलिए।
वह कुछ कहना चाहती थी पर उसकी नींद टूट गई। चांदनी पूरे जोश पर थी… वह रोती रही ,जो हो रहा था वह गलत था। ऐसे रास्ते कहीं तक नहीं जाते, इतना तो वह भी जानती थी. .
दुल्हन के आने से सब खुश थे, पर सुवीरा अपनी नींद से लड़ते-लड़ते हार गई थी। उस दोपहर दुल्हन को ले कर सब मंदिर चले गए , काफी रिश्तेदार वापस लौट चुके थे।
फिर एक बार सपने में नवरोज़ उसके सामने था। दुल्हन बनी सुवीरा एक-एक कदम उठती उसकी बाँहों में जा समाई। कितने खामोश लम्हे यों ही गुजर गए। अचानक जैसे उसे होश आ गया, वह नवरोज़ को थाम कर रो उठी।
-क्यों इस तरह चले आते हो मेरे पास। चैन से जीने क्यों नहीं देते?
-पर मैं तो यहां आया भी नहीं था।
आवाज सुन कर सुवीरा ने आंखें खोल दीं, नवरोज़ सचमुच उसके सामने खड़ा था। वह घबरा कर उठ गयी।
– मैं तो अरुण से कहने आया था कि मेरी छुट्टियां खत्म होने को हैं वह एक बार मुझ से मिल ले, पर देख रहा हूं तुम मुझे ले कर कुछ ज्यादा परेशान हो। क्या हक़ है मुझे , तुम्हें परेशान करने का, जब कि हमारे बीच धर्म, समाज ही नहीं दिलों की भी दूरियां हैं। वैसे भी प्यार हम हवाबाज़ों के लिए नहीं बना।
storyसुवीरा ने देखा एक ही हफ्ते में उसका चेहरा पीला पड़ चुका था। वह उसके सामने से भाग जाना चाहती थी पर उसने नवरोज़ के सीने में अपना चेहरा छिपा लिया।
-सुवी, यों लड़ते हैं अपने आप से ? देख तो सही क्या हाल बना रखा है।
प्यार का प्रथम स्पर्श , सुवीरा की आंखें बंद हो गईं। अगले ही पल वह उसे छोड़ कर खट-खट सीढ़ियां उतर गया।
इसके बाद कितनी ही छोटी-छोटी मुलाकातें, असंबद्ध बातें. …नवरोज़ वापस चला गया। सुवीरा लखनऊ चली आई। यहां वह अपनी सहेली नेहा के साथ पेइंग गेस्ट के तौर पर रहती थी। इस बीच कितनी ही बार उसने चांदी के कंगन देखे और एक मधुर एहसास के साथ संभाल कर रख दिया। ये कंगन नवरोज़ की पसंद के थे।
वह सुबह खूबसूरत थी गुलाबी सा मौसम और छुट्टी का दिन , अचानक नवरोज़ को आया देख कर दोनों ही चौंक गईं।
-आप ? इस घर का पता आपको कैसे मिला ? सुवीरा हैरान थी।
-पता तो अरुण ने दिया है उसने आपके लिए कुछ भेजा है। कहते हुए नवरोज़ ने उसके हाथ में पैकेट थमा दिया. . मैं यहां किसी काम से आया था आज का दिन खाली है क्यों न आज का दिन आप लोग हमारे साथ बिताएं ?
-सॉरी मुझे तो अपने लोकल गार्जियन के घर जाना है.. नेहा ने नवरोज़ के हाथ में कॉफी का कप थमाते हुए कहा और बैग ले कर चली गयी । वे दोनों दिन भर घूमते रहे रेजीडेंसी , इमामबाड़ा और जाने कहां-कहां। ढलती शाम वह उसे घर छोड़ कर जाने लगा तो सुवीरा ने उसका हाथ पकड़ कर रोक लिया..
-तुम्हारी पसंद खूबसूरत है चांदी के कंगन बेहद सुन्दर हैं।
-शादी के बाद ऐसे ही सोने के बनवा दूंगा उसने सरगोशियों में कहा।
-क्या ऐसा होगा?
मैं सारी सरहदें पार कर लूंगा जिंदगी में अगर तुम नहीं, तो मैं भी नहीं। कोई नहीं मानेगा तो मैं तुम्हें ले कर बाहर चला जाऊंगा।
-अब कब आना होगा ?
-दिवाली में, उसने सुवीरा को बाहों में समेट लिया।
नेहा अगले दिन आई हंस कर बोली – सबसे पहले तो कांग्रेट्स कि नवरोज़ बहुत खूबसूरत है और दूसरे वह तुमसे टूट कर प्यार करता है। प्यार ऐसा ही होता है , यह न सरहदें देखता है न हिन्दू-मुसलमान।
दिवाली की रात सुवीरा ने वही सूट पहना जो नवरोज ने उसे दिया था। कंगन हाथों में पहन कर वह देर तक देखती रही। मुंडेरों पर दीए जलाती story6सुवीरा ने उन्हें बुझने न दिया। गुजरती रात के साथ इंतज़ार भी लम्बा होता गया। नवरोज नहीं आया। कितनी बार उसकी आंखों के आंसू दीयों के तेल में गिर गए। उसने फोन करने की कोशिश की पर उधर से कोई जवाब नहीं था। एक-एक कर सारे दिए बुझ गए और पूरी छत पर अंधेरा फ़ैल गया। सुबह उसने पीजी की मालकिन के यहां से नन्हे भैया को फोन किया. .
फोन मिलते ही नन्हे ने कहा – सुवीरा, नवरोज़
-क्या हुआ नवरोज को ?
खबर यही मिली है कि सरहद से चार प्लेन एक साथ उड़े थे, तीन वापस लौट आए पर एक नहीं लौटा। उसे दुश्मनों ने मार गिराया। वह प्लेन नवरोज़ का था।
-अभी तो कोई लड़ाई नहीं चल रही, सुवीरा की आवाज कांप उठी।
लड़ाई न चल रही हो तो भी ऐसे हादसे हो ही जाते हैं।
सुवीरा हाथ में फोन लिए मानो पत्थर हो गई। हवा के पंखों पर उड़ने वाला नवरोज ख़ामोशी की नींद सो गया था। ठीक तो कहता था- प्यार हम हवाबाज़ों के लिए नहीं बना।
वह कोई भी सामाजिक लड़ाई लड़े बिना चला गया था।
सरहदें खामोश थीं।

– प्रिया आनंद

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