खूबसूरत छुट्टियां स्कूल जाने की टेंशन नहीं

वह दोपहर बड़ी खूबसूरत थी छुट्टियां पड़ गई थीं इसलिए स्कूल जाने का भी कोई टेंशन नहीं था रंजन और मानू अपने लॉन के किनारे खड़े पेड़ पर बने ट्री हाउस में जा बैठे। रंजन के हाथ में जुगनुओं से भरा जार था जिसमें जगमग करते जुगनू इधर -उधर उड़ रहे थे। यह ट्री हाउस उनके पापा ने बनाकर उन्हें गिफ्ट किया था। भले ही यह बाउंड्री के अंदर ही था पर यह बच्चों की अपनी दुनिया थी। उनकी कल्पना जैसी ही निराली और खूबसूरत।children2

चारों तरफ फूलों की महक फैली थी। आम के पेड़ पर बैठी कोयल की कूक सुनकर मीनू उसी की तरह चिढ़ाने लगी। वह जितनी तेजी से कोयल को जवाब देती कोयल उससे भी तेजी से बोलती।
-ऐसा नहीं करते मानू … वह पक्षी है तुम ऐसे ही करती रहीं तो वह थक जाएगी।
-ठीक है कहकर मानू खामोश हो गई।
बड़ी देर तक वे चिड़ियों की आवाजें सुनते रहे। फिर मानू कहानियों की किताब खोल कर बैठ गई और रंजन अपने कैसियो पर धुनें निकालता रहा।
इस बीच मां आकर उनके लिए पॉपकार्न और दूध का फ्लास्क दे गईं। बच्चे खुश थे और एंज्वाय कर रहे थे।
-भैया क्यों न हम हाकी खेलने चलें बगल में ही तो खेल का मैदान है।
– हां चलो चलते हैं रंजन ने हामी भरी।
– मैं घर से गेंद और हाकियां उठा लाती हूं। कहती हुई मीनू सीढ़ियों से उतरी और घर के अंदर चली गई।
थोड़ी ही देर बाद वे दोनों मैदान में थे। यह मैदान घर से थोड़ी दूर एक झील के किनारे था। उस खुशनुमा मौसम में खेल की शुरुआत हो गई।
कुछ देर तक तो खेल ठीक चला पर अचानक ही मानू की हिट की हुई गेंद सीधे रंजन के माथे पर जा लगी। रंजन चीख कर वहीं बैठ गया। मानू भाग कर उसके पास आई ।

children-3-सॉरी भैया …ज्यादा लग गई क्या…?

-अरे नहीं तू मुझे इतना कमजोर समझती है क्या ? कहता हुआ वह उठ कर खड़ा हो गया।
खेल फिर शुरू हो गया पर इसबार रंजन की गेंद मानू की नाक पर लगी वह वहीं नाक पकड़ कर बैठ गई। उसकी नाक से खून निकलने लगा था। रंजन भाग कर झील के पानी में रूमाल भिगोकर ले आया पहले उसने खून साफ किया और फिर उसकी नाक पर रूमाल रख दी।
खून तो बंद हो गया पर उसकी नाक पर चोट की जगह सूज गई थी ।
-मानू तेरी नाक पर गूमड़ निकल आया है…वह हंसा।
-अपना माथा भी देख ले वहां भी सूजा हुआ है मानू खिलखिला कर हंस दी।
-अरे मुझे तो पता ही नहीं चला। अब तो मां बहुत नाराज होंगी।
-और पापा से पिटाई भी होगी। उन्होंने कहा था कि घर के बाहर खेलने मत जाना।
-चलो घर चलते हैं, पर ये चोटें हम कैसे छिपाएंगे।
-एक काम करते हैं दादू के कमरे में महानारायण तेल रखा है वही लगा लेते हैं चोट भी ठीक हो जाएगी और किसी को पता भी नहीं चलेगा।
दोनों बेहद खामोशी से दादू के कमरे में घुसे, वहां कोई नहीं था। चोटों पर तेल लगा कर वे चुपचाप अपने कमरे में आकर लिहाफ तान कर सो गए।children-4

मां उन दोनों को ढूंढती पहले ट्री हाउस की तरफ गईं फिर कमरे में आकर देखा। पूरे कमरे में तेल की महक फैली हुई थी। हैरान होकर उन्होंने बच्चों का लिहाफ उठाया । दोनों का चेहरा सूजा हुआ था।
-यह क्या किया है तुम दोनों ने…चोट कैसे लगी…? तब तक पापा भी आ गए थे। सारी कहानी सुनकर दोनों खूब हंसे।
महानारायण तेल चोटों की दवा नहीं है। यह दादू की गठिया की दवा है। कह कर पापा अपनी फर्स्टएड किट से दवा लेकर आए और दोनों को लगाया।

सोने से पहले मानू बोली -भैया हम कोई भी शरारत करें मम्मी को पता कैसे चल जाता है।
मम्मी सब जानती हैं…वह हंस पड़ा।

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