चन्दन गंधा

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बस पहाड़ से हो कर अब मैदानी भाग की तरफ बढ़ रही थी। खिड़की के बाहर पलाश के फूलों की रंगीनियां थीं और फूलों के उस घने संतरीपन में पेड़ों की हरियाली कहीं खो गई लगती थी। पलाश के आलावा एक और भी पेड़ दिखता है जिसमें झुमकों की तरह नारंगी फूल लगे हैं। घाटियों में हर जगह ये पेड़ दिखाई देते हैं। मौलश्री इनके नाम नहीं जानती, पर सालों से इन्हे पहचानती है। मई के महीने में जब उसने जालंधर का प्रोग्राम बनाया तो उसके साथी हंसने लगे थे। कहा- लोग गर्मियों में पंजाब से पहाड़ आते हैं और तुम पहाड़ से पंजाब की गर्मी में जा रही हो ?
-वहां कोई है जो मेरा इंतजार कर रहा है। उसने कहा था और हंस कर रह गई थी। उसने यह नहीं कहा कि कितने सालों के बाद उसे सिद्धांत की खबर मिली थी और वह उससे मिलना चाहता था।
सिद्धांत और मौलश्री सिर्फ दोस्त थे, पर बहुत खुले हुए। यह ऐसी दोस्ती थी जिसमे शिकवे-शिकायतों के लिए जगह नहीं थी। उनकी आपसी समझ इतनी अच्छी थी कि उनके अंदर बदलाव की कोई गुंजाइश नहीं थी। वह अचानक ही उसके आसपास की भीड़ से गायब हो जाता था और जब जी चाहे उन्हीं रास्तों पर वापस लौट आता था। मौलश्री ने कभी उससे कोई सवाल नहीं किया, दोस्ती के नाते भी नहीं। उसे इतना पता था कि सिद्धांत को प्यार में धोखा मिला था। उसके बाद उसने खुद को अजनबी बना लिया था। मौलश्री को वह सिर्फ श्री कहता था और श्री को इसमें कोई आपत्ति नहीं थी। श्री के रुकने का इंतजाम भी सिद्धांत ने ही किया था।
वह ठहरी हुई सी शाम थी, मंदिर के पास के तालाब में रोशनियाँ झिलमिला रहीं थीं। तालाब के किनारे उसके साथ टहलते हुए वह एक जगह रुक कर उसकी ओर मुड़ा था।
-श्री तुमने कभी सोचा कि मैंने शादी क्यों नहीं की?
-नहीं यह तुम्हारा निजी मामला था इसलिए मैंने सोचने की भी दखलंदाजी नहीं की। वैसे कर तो लेना चाहिए था। अभी पूरी जिंदगी पड़ी है।
-मुझे लगा कि कोई और मुझे उस हद तक समझ नहीं पाएग। मुग्धा जैसे मेन्टल लेवल की लड़कियां कम ही होती हैं।
-तुम उसे मिस कर रहे हो, … वह हंसी …..
– रोज करता हूं, शादी तो इसलिए नहीं की कि बेकार के कामों में मैं वक्त नहीं जाया करना चाहता।
वह उससे दस कदम आगे खड़ा था। उस एक क्षण में वह श्री को बेहद आकर्षक लगा। कैसा मासूम सा दिल था उसका,… कुछ लोग चोट खाने के बाद अगले कदम के लिए तैयार ही नहीं होते।
तालाब के पानी में कोई हलचल नहीं थी, बस रौशनी की जाने कितनी लकीरें इस पार से उस पार तक फ़ैली हुई थीं।
– इस शहर की शाम किसी महबूब की दुल्हन सी लगती है। सिद्धांत ने पानी को छूते हुए कहा.,।
-और भोर ?
-एकदम पाकीजा। वह अमृत वेला होती है, तब गुरबाणी के स्वर यहां तक सुनाई देते हैं। सुबह देखना……
-तुम मंदिर के अंदर नहीं गए ?
– तुम्हें जाना है तो चली जाओ, मैं मंदिरों में माथा नहीं टेकता। ये दिल बहलाने को ख्याली बातें हैं। आप भगवान के आगे हाथ जोड़े खड़े रह जाते हैं और इधर आपकी दुनिया ही लुट जाती है।
– तुम्हें पता है, कल सारी रात मैं यहीं टहलता रहा था. . .
– तुम रात भर जागते रहे थे ? मौलश्री के स्वर में हैरानी थी।
– कभी-कभी मुझे लगता है कि खुद से बात करना, नींद और सपनों से कहीं ज्यादा जरूरी है। इसलिए लफ़्जों के संग जगराता करना मेरी आदत में शुमार हो गया है।
-दीवाने हो तुम,…. वह हंस दी।
-किसी रिश्ते को अपने हाथों दफन करो तब पता चलता है कि उदासियों के चिराग कैसे बुझते हैं।
वे काफी देर तक तालाब की सीढ़ियों पर बैठे रहे, फिर जब रात उतरने लगी तो सिद्धांत श्री को उसके कमरे तक छोड़ गया।
वह जानती है कि पत्रकारिता की दुनिया काफी व्यस्त है, पर आज वह बेहद इत्मीनान में दिखाई दिया जैसे माथे का बोझ कहीं और छोड़ आया हो।
रात बेहद अच्छी नींद आई। सुबह एक लड़का ढेरों अख़बार ले कर आया। पीछे सिद्धांत था।
-यह क्या? वह हंस दी।
– मैंने मंगवाए हैं। दिन भर खाली बैठ कर करोगी भी क्या? मैं यहां से घर जाऊंगा, फिर ऑफिस, शाम को ही मिलना होगा। कोई जरूरत हो तो फोन कर लेना। कह कर सिद्धांत चला गया।
मौलश्री ने चाय रेस्तरां में पी और फिर उन्हीं रास्तों पर टहलती रही जिन पर कल वह और सिद्धांत साथ-साथ थे। आसमान नीला था,.. कपासी बादलों से होड़ लेते पंछी और उनकी गुलजार आवाजें। श्री हैरान है कि सिद्धांत सारी-सारी रात जाग कैसे लेता है ?
शाम को वह आया तो वह उसे बिना पलक झपकाए देखती रह गई। दिन भर के काम के बावजूद वह काफी फ्रेश लग रहा था।
-आओ तुम्हें कॉफी पिलाने मंदिर के घेरे से बाहर ले चलता हूं।
– किसी शहर का असली चेहरा देखना हो तो रात में देखना चाहिए। वह रहस्य भरी मुस्कुराहट के साथ बोला. . . वे मंदिर परिसर से बाहर आ गए।
-इस बार पहाड़ों पर बर्फ कैसी रही ?
-बहुत ज्यादा, कांगड़ा तक बर्फ उतर आई। कहते हैं पूरे साठ सालों बाद कांगड़ा में ऐसी बर्फ गिरी।
-तुम सचमुच जन्नत में रहती हो। हम कभी आना भी चाहें तो इस बात का अंदाजा लगाना मुश्किल ही होगा कि कब बर्फ गिरेगी।
-तुम वहीं क्यों नहीं आ जाते ?
वह खामोश हो गया। कॉफी पी कर वे बाहर आए . . .
-सिद्धांत, मैं कभी समझ नहीं पाई कि मेरे तुम्हारे बीच का रिश्ता क्या है?
– तुम मेरे लिए वह हवा हो जिसमें चंदन की सुगंध है। मंद-मंद पवन जो पलकों पर नींद बन कर बहुत सारा प्यार छोड़ जाती है।
– सॉरी मेरे पास तुम्हारे जैसे खूबसूरत शब्द नहीं हैं उसकी आवाज डूब सी गई।
उसने उसकी बात नहीं सुनी थी। वह गुनगुना रहा था।
जाने क्यों श्री का दिल किया कि वह सिद्धांत के कंधे से सिर टिका कर आंखें बंद कर ले।
तुम कहीं मुझसे प्यार तो नहीं करने लगीं ? उसने मौलश्री को कंधे से पकड़ कर अपनी तरफ मोड़ लिया।
-किसने कहा ? वह चौंक गई।
-तुम्हारी आंखें बोलती हैं। ऐसी गलती मत करना यह आग का दरिया है छूते ही जल जाओगी।
श्री की आंखें झंप गईं, यह सिद्धांत मन की बात कैसे जान जाता है।
वह रुक गया था। पोल लाइट की रोशनी में उसकी लम्बाई कुछ ज्यादा ही लग रही थी।
-श्री, हम अपनों की बस्ती के फ़क़ीर हैं … जाने कितने लोग इसमें रहते हैं। इसी बस्ती के रास्तों का एक सिरा तुम तक भी जाता है। यह जरूर है कि मेरी जिंदगी में प्यार के लिए अब कोई जगह नहीं। टूटा हुआ आइना रिपेयर कर के ठीक नहीं किया जा सकता यह तो तुम भी जानती हो।
श्री की आंखें भर आईं।
-मेरे दिल में एक सॉफ्ट कार्नर है वहां तुम हो., वह जगह कोई नहीं ले सकता। यह ऐसा रिश्ता है जो दिल से दिल तक जाता है। बहुत अपना, बहुत कोमल और मेरे लिए बहुत जरूरी, पर यह प्यार नहीं है।
श्री ने सिद्धांत को देखा, उसकी आंखें शून्य में स्थिर थीं। क्या देख रहा था वह … दूर जाती सड़क या फिर पोल लाइट की रोशनियां ? प्यार में मिलने वाले धोखे ने उसे पत्थर बना दिया था।
यह पत्थर क्या कभी पिघलेगा ?
प्रश्न अनुत्तरित था और इसका उत्तर जैसे घने जंगलों में कहीं गुम था। चन्दन गंधा पवन उसके आस-पास से हो कर गुजर रही थी और वह बैरागी हो गया था।

– प्रिया आनंद

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