चोर-सिपाही

उस दिन रेनी डे हो गया था बच्चे घर जल्दी पहुंच गए तो समझ में नहीं आ रहा था कि खाली समय में क्या करें । थोड़ी देर तक तो उन्होंने कापियों के पन्ने फाड़ -फाड़ कर नावें बनाईं और उन्हें पानी में तैराते रहे। मिनी और गोपू के अलावा पड़ोस के बच्चों को मिलाकर वह सात बच्चों की टोली थी।
किसी ने रंगीन कागज की नाव बनाई और किसी ने लिखे हुए पन्ने की ही नाव बना दी । आंगन में पानी भरा था और उसमें नावें ही नावें नजर आ रही थीं।
नीली लाल हरी और धारियों वाली । मिनी ने एक चींटा पकड़ा और अपनी वाली नाव में चढ़ा दिया ।
– वो देखो मेरी नाव में सवारी भी है वह चिल्लाई।
अब सारे ही बच्चे भाग -भाग कर चींटा पकड़ने लगे।
नावों की सवारी करते चींटे अपनी जान बचा कर भाग रहे थे पर बच्चे उन्हें छोड़ने को तैयार नहीं थे । उनके कपड़े पानी से तर-ब-तर थे और सिर से पानी चू रहा था
जल्दी ही बारिश तेज हो गई…बच्चे बरामदे में भाग आए। बारिश में भीगती नावें पहले तो पानी से भर कर खुल गईं और उनमें से चींटे निकल कर तैर कर किनारे पहुंच गए। अब आंगन में गली हुई नावें जगह-जगह पड़ी हुई थीं ।
-क्या कर रहे हो तुम लोग बारिश में भीग रहे हो सब बीमार पड़ोगे जाओ घर में कपड़े बदलो। दादा जी ने डांट लगाई तो सब घर के अंदर भाग लिए।
घर में भी डांट पड़ी। कपड़े बदल कर उन्हें पढ़ने की हिदायत देकर बैठा दिया गया। पड़ोसी बच्चे भी कपड़े बदल कर वापस आ गए।
-अब क्या करें …गोलू ने कहा।
-चोर- सिपाही खेलते हैं। हरी दौड़कर कापी उठा लाया । पर्चियां बनाई गईं और उनपर चोर, सिपाही ,वकील, जज आदि के नाम लिखे गए। जिसके हिस्से में जो पर्ची आनी थी वही उसे बनना था। पर्चियां उछाली गईं मिनी के हिस्से में जो पर्ची आई उस पर चोर लिखा था। सिपाही बना गोपू। हरी कोतवाल था ,सूरज जज बाकी के तीन बच्चे वे थे जिनके घर में चोरियां की जानी थीं ।
-मुझे बेफालतू में चोर बना दिया मिनी चिल्लाई।
-अब तो बनना पड़ेगा क्योंकि तेरे हिस्से में यही पर्ची निकली है। गोपू ने कहा ।
-क्या करना होगा मुझे, वह रुआंसी थी ।
– अब रोने से काम नहीं चलेगा तुझे पता है कि चोर रोते नहीं । अब चुपचाप जा और जो बच्चे खाटों पर सोए हैं उनके सिरहाने रखी चीजों को चुरा कर ले आ।
मिनी ने देखा खाट पर सोए हर बच्चे के सिरहाने कुछ न कुछ रखा था । किसी ने गठरी बना कर रखा था और किसी ने थैली में रखा था।
वह दबे पांव गई और तीनों का सामान उठा लिया। उसके वहां से हटते ही तीनों शोर मचाने लगे। और पकड़ कर सिपाही के पास ले आए।
वह रस्सी लेकर उसे बांधने के लिए आगे बढ़ा ।
-गोपू तू मेरा भाई है कि दुश्मन…? कहते हुए मिनी भाग निकली ।
गोपू ने उसे दौड़ाया …अरे मैं तुझे पकड़ूंगा नहीं तो कोतवाल के पास कैसे ले जाऊंगा । कहते हुए गोपू ने उसे पकड़ लिया।
-मैं चोर नहीं तू खुद चोर है … मिनी ने चीख कर कहा और दोनों गुत्थम गुत्था हो गए। मिनी ने उसकी नाक पर घूंसा मारा और गोपू की नाक से खून निकलने लगा ।
-ओ मेरी मां …कहकर वह चीखा और नाक पकड़कर जमीन पर बैठ गया।
बच्चे शोर मचाने लगे । शोर सुनकर घर के सब लोग वहां आ गए।
-क्या कर रहे हो तुम लोग और यह खून…। हद है, पता नहीं स्कूलों में छुट्टियां क्यों कर दी जाती हैं मां बड़बड़ा रही थीं ।
-मां इसने भी मुझे मारा यह मुझे चोर कहता था । मिनी ने कहा , सचमुच उसकी आंखों के पास नील पड़ा हुआ था ।
-वह तो खेल था यह बात तो समझती नहीं। गोपू अब भी शिकायतें किए जा रहा था ।
खेल खत्म हो गया था। कोतवाल ,वकील और जज साहब की भूमिका बाकी ही रह गई थी।
मां दोनों को अंदर ले गईं गोपू का खून साफ किया मिनी के नील पर दवा लगाई। पड़ोसी बच्चे अपने घरों को चले गए
-क्या तुम दोनों को एक बात पता है ? कल रक्षाबंधन है और तुम दोनों इस तरह लड़ रहे हो । सॉरी बोलो एक दूसरे को।
-सॉरी…मिनी मुझे सचमुच याद नहीं था । गोपू ने कहा ।
– सारी भाई… मिनी शर्मिंदा थी ।
अब नहीं लड़ना हां । कहकर मां किचन में चली गईं।
-आज शाम मैं बाजार से सबसे अच्छी राखी तेरे लिए लाऊंगी ।
– मैं भी अभी अपनी गुल्लक फोड़कर देखता हूं कितने पैसे हैं उनसे मैं तेरे लिए कुछ लाऊंगा ।
थोड़ी देर बाद दोनों अपनी गुल्लकें तोड़कर बैठे पैसे गिन रहे थे।

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