तब नारों को पढ़कर चढ़ता था चुनावी बुखार

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रात के वक्त चौराहों की दीवारों को नए-नए नारों से रंगा जाता था

जात पर ना पात पर, इंदिरा जी की बात पर, मोहर लगेगी हाथ पर। अबकी बार अटल बिहारी, जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी भागीदारी। बात हो रही है उन कुछेक नारों की जो कभी चुनावों में खूब गूंजा करते थे। एक दौर में दीवारों पर लिखे नारे चुनावों का अभिन्न हिस्सा होते थे। रात के वक्त शहर के प्रमुख चौराहों की दीवारों को नए-नए नारों से रंगा जाता था। उन्हें पढ़कर सुबह चुनाव का बुखार शहर पर चढ़ता था। इस मर्तबा भी दीवारों पर लिखी इबारतों को पढ़ने की ख्वाहिश थी पर चुनाव अधिसूचना जारी होने के बाद से कहीं किसी दीवार पर चुनावी रंग चढ़ा हुआ नहीं मिला। चुनाव आयोग की सख्ती के चलते नेताओं ने अपने स्तर पर पहले-पहले जो दीवारें रंगनी थी रंग ली, पर उसमें भी कोई रोचकता भरे नारे पढ़ने को नहीं मिले। हां बीजेपी ने जरूर अबकी बार भाजपा सरकार का नारा दे रखा है।

दीवारों पर लिखी इबारतों को पढ़ने की ख्वाहिश अधूरी

यह खल रहा है कि चुनावों से नारे गायब हो जाएं। दीवारों पर पढ़ने को नहीं, लाउडस्पीकरों और जनसभाओं में भी दिलचस्प नारे सुनने को नहीं मिल रहे। वर्ष 1984 के दौर में कई क्षेत्रीय राजनीतिक दलों ने वोट हासिल करने के लिए जातीयता का सहारा लेना शुरू किया था, जिससे जातिवादी राजनीति का जहर फिजा में घुलने लगा। इस जहर की काट के लिए श्रीकांत वर्मा ने लोकसभा चुनावों में नारा दिया था ‘जात पर ना पात पर, इंदिरा जी की बात पर मोहर लगेगी हाथ पर’।
यह नारा कांग्रेस के साथ लंबे समय तक चलता रहा। इंदिरा गांधी के निधन के बाद जब राजीव गांधी पहला चुनाव लड़े तो उनकी सभाओं में जुटी भीड़ एक तरफ हाथ उठाती तो दूसरी तरफ यह नारा गूंजता था ‘उठे करोड़ों हाथ हैं, राजीव जी के साथ हैं’।
पाकिस्तान को 1971 की जंग में मात देने के बाद हुए आम चुनावों में विश्वास से लबरेज इंदिरा गांधी का गरीबी हटाओ नारा भी खूब चला था। जनता ने इसे खूब पसंद किया था। यह नारा जब आय़ा तब देश समाजवादी मूल्यों को लेकर समर्पित था। इस नारे ने चुनाव में कांग्रेस को खूब फायदा दिलवाया।

नारों में पार्टी की भावी योजना और रणनीति दोनों छिपी रहती थी

हाथ नहीं गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है। बसपा के इस नारे ने भी खूब धूम मचाई थी, यह नारा कुछ क्षेत्रों में अभी भी लोकप्रिय है। बसपा ने नया नारा दिया ब्राह्मण शंख बजाएगा, हाथी बढ़ता जाएगा। फिर बहुजन समाज पार्टी का नारा आया चढ़ विपक्ष की छाती पर, मोहर लगेगी हाथी पर। पर इसका वह असर देखने को नहीं मिल रहा जो बसपा के पहले के कुछ नारों का हुआ था। भारतीय जनता पार्टी का एक नारा मजबूत नेता, निर्णायक सरकार को भी जनता ने खूब सराहा था। वर्ष 1980 के आम चुनावों में कांग्रेस ने काम करने वाली सरकार का नारा दिया था। वर्ष 1996 के लोकसभा चुनावों के दौरान अटल बिहारी वाजपेयी के पक्ष में नारे लगे, अबकी बारी अटल बिहारी।

वर्ष 2004 में इंडिया शाइनिंग का नारा लगा। पर जनता को वह हजम नहीं हुआ। उस चुनाव में कांग्रेस का नारा था कांग्रेस का हाथ, आम आदमी के साथ। उसके बाद मोदी ने नारा दिया अबकी बार मोदी सरकार, अच्छे दिन आने वाले हैं। इसी तरह से कुछ नारे चुनावों के समय नहीं उछाले गए। उनका मकसद चुनावों में लाभ लेने के लिए भी नहीं था, लेकिन उनका राष्ट्रीय महत्व रहा। जैसे नेहरू जी का नारा, आराम हराम है। लाल बहादुर शास्त्री का नारा जय जवान, जय किसान। य़े नारे अब भी प्रासंगिक बने हुए हैं। कुल मिलाकर नारे किसी भी राजनीतिक दल की विचारधारा को आमजन तक लुभावने अंदाज में पहुंचाने का सरल उपाय हैं। ये चुनाव की रंगत है। इनमें पार्टी की भावी योजना और रणनीति दोनों छिपी रहती थी पर इस बार लोग दिलचस्प नारों से वंचित दिख रहे हैं।

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