बाल दिवसः बच्चों को मिले पर्याप्त समान अवसर

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14 नवंबर का दिन बच्चों को समर्पित है। यह दिन भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के जन्म दिवस का भी है। वे बच्चों को बहुत प्यार करते थे, इस लिए उनके जन्मदिन को बालदिवस घोषित कर दिया गया।

वास्तव में बाल दिवस की नींव 1925 में रखी गई थी जब बच्चों के कल्याण पर विश्व कांफ्रेंस में बालदिवस मनाने की सर्वप्रथम घोषणा हुई। एक बड़े अंतराल के बाद 1954 में इसे दुनिया भर में मान्यता मिली। बच्चों के प्रति पं.नेहरू में एक अलग ही स्नेहशील भावना थी, जो संभवतः उनकी अलग पहचान बना देती है । ऐसी भावना बाद में डॉ.कलाम में दिखाई दी थी। त्रिमूर्तिभवन पंडित नेहरू का सरकारी निवास था। एक बार वे वहां अपने बगीचे में टहल रहे थे, तभी एक छोटे बच्चे के रोने की आवाज सुनाई पड़ी। नेहरू जी ने सोचा कि उस बच्चे की मां वहीं कहीं माली के साथ कुछ काम कर रही होगी, फिर भी वे उस तक गए और रोते हुए बच्चे को उठाकर थपकियां देने लगे। जब बच्चे की मां भाग कर वहां पहुंची तो उसे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ । बच्चा नेहरू जी की गोद में मुस्कुरा रहा था।एक बार जब वे तमिलनाडु के दौरे पर गए तो वहां उन्हें देखने के लिए भारी भीड़ उमड़ पड़ी। भीड़ के बीच में एक गुब्बारे वाला भी था, जो लगातार धक्के खा रहा था । उन्हें लगा कि वह अभी गिर पड़ेगा, उन्होंने उससे गुब्बारे लेकर वहां खड़े बच्चों में बांट दिए। बच्चों के प्रति इसी भावना ने उन्हें चाचा नेहरू बना दिया। आप इसे नेहरू जयंती कहें या बाल दिवस, फिलहाल यह दिवस पूर्णतया बच्चों को समर्पित है। इस दिन स्कूल तथा कई संस्थान, बालमेला, बच्चों के लिए फैंसी ड्रेस तथा अन्य प्रतियोगिताएं आयोजित करते हैं,ताकि बच्चों की क्षमता और प्रतिभा को बढ़ावा मिले।इस दिन बच्चों से जुड़े मुद्दों जैसे शिक्षा,संस्कार ,सेहत व मानसिक व शारीरिक विकास पर भी चर्चा की जाती है।बच्चों का मन बेहद नाजुक होता है और उन पर छोटी या बड़ी बात का गहरा असर होता है। इसलिए जरूरी है कि उन्हें सही शिक्षा, पोषण और संस्कार मिले यह देश हित के लिए अहम है क्योंकि आज के बच्चे ही कल का भविष्य हैं। यह दिवस हमें सिखाता है कि हर मनुष्य को निर्दोष और जिज्ञासु बच्चे की तरह खुश रहना चाहिए। इस दिन आयोजित होने वाले समारोहों और उनकी भव्यता के बीच हमें चाचा नेहरू की दृष्टि के असली संदेश को नहीं भूलना चाहिए। उनका कहना था कि बच्चों को पर्याप्त समान अवसर देना चाहिए यह हमारे बच्चों को सुरक्षा और प्रेमपूर्ण वातावरण उपलब्ध करवाता है।आज नेहरू के इस देश में 5-6 करोड़ के करीब बच्चे बाल श्रमिक हैं । वे चाय की दुकानों, फैक्ट्रियों में मजदूरों के रूप में हैं या फिर सड़कों पर भिखारी के रूप में भटकते नजर आते हैं । कितने ही बच्चे यौन शोषण का शिकार हैं और जाने कितने अपराधों में लिप्त हो चुके हैं। बचपन आज भी भोला और भावुक है पर हम उनपर ऐसे तनाव और दबाव का बोझ डाल रहे हैं कि वे कुम्हला रहे हैं। बाल दिवस तभी सार्थक होगा जब हर बच्चा अपना बचपन सही मायनों में जी सके।

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