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महाविद्या मातंगीः इंद्रजाल विद्या या जादुई शक्ति में पारंगत

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मां मातंगी का संबंध प्रकृति, पशु, पक्षी, जंगल, वन, शिकार इत्यादि से हैं, जंगल में वास करने वाले आदिवासी-जनजातियों से देवी मातंगी वन देवी की तरह अत्यधिक पूजिता हैं।देवी मातंगी दस महाविद्याओं में नवें स्थान पर हैं, सामान्यतः इनका संबंध तंत्र क्रियाओं, विद्याओं से हैं। इंद्रजाल विद्या या जादुई शक्ति में देवी पारंगत हैं । वे त्रिभुवन में समस्त प्राणियों तथा अपने घोर शत्रु को भी वश करने में समर्थ हैं तथा सम्मोहन विद्या एवं वाणी की अधिष्ठात्री हैं। इनका शारीरिक वर्ण गहरे नीले रंग या श्याम वर्ण का है, ये त्रिनेत्रा हैं तथा अपने मस्तक पर अर्ध चन्द्र धारण करती हैं।

मां अमूल्य रत्नों से युक्त रत्नमय सिंहासन पर बैठी हैं एवं नाना प्रकार के मुक्ता-भूषण से सुसज्जित हैं। देवी मातंगी गुंजा के बीजों की माला धारण करती हैं, लाल रंग के आभूषण देवी को प्रिय हैं तथा सामान्यतः लाल रंग के ही वस्त्र-आभूषण इत्यादि धारण करती हैं। देवी सोलह वर्ष की एक युवती जैसा स्वरूप धारण करती हैं उनका शारीरिक गठन पूर्ण तथा मनमोहक हैं। ये चार हाथों से युक्त हैं, इन्होंने अपने दायें हाथों में वीणा तथा मानव खोपड़ी धारण कर रखी है तथा बायें हाथों में खड़ग धारण करती हैं एवं अभय मुद्रा प्रदर्शित करती हैं। सामान्यतः तोते इनके साथ रहते हैं। ये मतंग मुनि की पुत्री के रूप में भी जानी जाती हैं।

इनकी अराधना सर्वप्रथम भगवान विष्णु द्वारा की गई। माना जाता है कि तभी से भगवान विष्णु सुखी, सम्पन्न, श्री युक्त तथा उच्च पद पर विराजित हैं। देवी मातंगी का संबंध मृत शरीर या शव तथा श्मशान भूमि से है। पारलौकिक या इंद्रजाल, मायाजाल से सम्बंधित रखने वाले सभी देवी-देवता श्मशान, शव, चिता, चिता-भस्म, हड्डी इत्यादि से सम्बंधित हैं, पारलौकिक शक्तियों का वास मुख्यतः इन्हीं स्थानों पर हैं। तंत्र विद्या के अनुसार देवी मातंगी तांत्रिक सरस्वती नाम से जानी जाती हैं एवं श्रीविद्या महा त्रिपुरसुंदरी के रथ की सारथी तथा मुख्य सलाहकार हैं।

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