रावी धीरे बहो …

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शहर में नई आई नंदना को आश्चर्य तो हुआ, पर वह इसलिए चली गई क्योंकि आज सर्वेश दा का जन्मदिन था। सर्वेश दा ने तय किया था कि यह दिन वे इस बार बेहद घरेलू तौर पर मनाएंगे। कुछ बेहद आत्मीय मित्र, एक छोटी सी कविगोष्ठी और रात का खाना।
जो लोग सर्वेश दा को प्यार करते थे, वे इसे उनके करीब रहने का बहाना मान कर वहां पहुंचने लगे थे। दोपहर ढलते-ढलते काफी लोग जमा हो गए। लोगों के लाए फूलों से घर आंगन महकने लगा था। सुधा भाभी सुबह से ही तैयारियों में व्यस्त थीं। ड्राइंग रूम का फर्नीचर हटा कर वहां मोटा कालीन बिछा दिया गया था। गद्दों पर रखे गाव तकियों ने पूरे कमरे का नक्शा ही बदल कर रख दिया था।

पांच बजते-बजते लगभग सभी लोग आ गए। सुधा भाभी एक बड़ी सी ट्रे में चाय ले कर आईं तो अभिवादनों, बधाइयों और मुस्कराहटों से कमरा भर गया।
– थैंक्स भाभी सचमुच चाय की जरूरत महसूस हो रही थी।
– मैं वह डॉल्फ़िन वाला कप लूंगी। ग़रिमा चहकी।
-नहीं इस बार यह कप मेरा होगा। कहते हुए देव ने वही कप उठा लिया।
– तेरे लिए फूलों वाला कप है गरिमा, कहते हुए सुधा भाभी ने उसके हाथ में दूसरा कप थमा दिया।
– देखना भाभी यह देव एक दिन मेरे हाथों पिटेगा। गरिमा तुनक कर बोली और सब हंस दिए।
– ठण्ड होने लगी है। सर्वेश दा अंदर आते हुए बोले।
आतिशदान में जलती लकड़ियों से कमरा गुलाबी हो उठा था। नंदना को सर्वेश दा के घर का हर अंदाज़ अच्छा लगता था। देवदार वृक्षों से घिरी उनकी कॉटेज, पेड़ों की डालियों में परिंदों के लिए लटकाए गए सुन्दर नन्हे घर।और उन घरों में चहकते पक्षी। सर्वेश दा के उस कमरे में आने के बाद जैसे कमरे की गर्माहट आत्मीय सी हो उठी थी। जब हर एक ने उनके पास जा कर शुभकामनाएं दीं तो उनके चेहरे पर स्नेह छलक आया। सर्वेश दा नंदना के गांव से ही थे ,पर काफी पहले उनके पूर्वज इस शहर में आ कर बस गए थे। इसलिए भी वह नंदना को छोटी बहन सा ही स्नेह देते थे।
चाय खत्म हुई तो कविताओं का दौर शुरू हुआ। दिवाकर, बनर्जीबाबू ,रुचिका ,राधा और जाने कितने लोग। नंदना आश्चर्य से अभिभूत थी। जिन्हें सिर्फ पढ़ा था, उन्हें सामने देखने की सुखद अनुभूति इस तरह हासिल हो गयी थी।
-अभिमन्यु आज तुम एक बिल्कुल नई कविता सुनाओगे। सर्वेश दा ने कहा, तो सबकी आंखें उधर ही उठ गईं। आतिशदान के करीब बैठा दुबला सा लड़का। देखने से तो यही लगता था कि यों ही जिज्ञासा वश चला आया है.. वह अभिमन्यु जिसकी हर कविता नंदना ने ढूंढ़ कर पढ़ी थी। उन कविताओं की उदासी और तड़प का जितना पता नंदना को था , उतना तो शायद अभिमन्यु को भी नहीं रहा होगा। उसकी आंखें झुक सी गईं, कई बार जिन्हें देखा भी नहीं होता वे दिल के कितने करीब होते हैं।
अभिमन्यु के चेहरे पर गंभीरता और उदासी थी, पर आवाज बेहद सधी और ठहरी हुई।
उसने कहा-
किसी ठंडी सड़क पर चलते हुए
मैंने पाया था मोनाल की कलंगी का एक पंख
रुक कर थोड़ी देर सोचता रह गया था
किस तरह गुजरी होगी वह इधर से
अपनी राजसी शान और सुंदरता में संपूर्ण
मैंने वह पंख अपनी डायरी में रख लिया है
किसी रेशमी स्मृति की तरह सहेज कर
जानता हूं जाना है मुझे अनंत विश्व के आखिरी छोर पर
मेरे कन्धों पर बोझ है अनलिखी कविताओं का
और मैं अपनी जगह ईमानदार हूँ
एक ख्वाहिश सी है काश ,…
देख सकता मैं उस खूबसूरत मोनाल को
उसका वैभव ,उसकी सुंदरता, उसकी शाहाना चाल
बस एक बार ही सही ,…
लोग चुप थे … एक सन्नाटा सा खिंच गया था। यह उस गोष्ठी की आखिरी कविता थी. सर्वेश दा ने उठ कर अभिमन्यु को बाँहों में समेट लिया।
– थैंक्स अभि , मेरी भी उम्र ले कर जियो।
-जन्मदिन आपका है सर्वेश दा … किसी ने हंस कर कहा।
-इसी लिए आपकी दी हुई दुआओं में से थोड़ी मैं इसे दे रहा हूं।
-नंदना , क्या तुम्हें पता है, कि अभिमन्यु को ब्लड कैंसर है? गरिमा ने धीरे से कहा।
नंदना जहां थी वहीं प्रस्तर प्रतिमा की तरह बैठी रह गई। वह एक टक अभिमन्यु को देखे जा रही थी जैसे ट्रांस में हो। उसकी इस दृष्टि से अभिमन्यु भी थोड़ा असहज हो आया।
खाना खत्म होने के बाद तय हुआ कि चांदनी रात है सड़क पर टहलते हुए जा कर चौगान में बैठा जाए, पर सड़क पर पहुंचते ही वे अलग-अलग ग्रुप में बंट गए। राधा, रुचिका और सुधा भाभी घरेलू बातों में व्यस्त हो गयी थीं। देव दो-तीन लोगों के साथ आगे निकल गया था और गरिमा अभी भी उससे लड़े जा रही थी। सर्वेश दा आने वाले चुनावों की चर्चा करने लगे थे।
बेध्यानी में नंदना ने पाया कि वह काफी पीछे छूट गयी है। उससे बीस कदम पीछे अभिमन्यु था। वह वहीं रुक गयी।
-आप मेरे लिए न रुकें प्लीज ,मुझे अकेले चलने की आदत है।
– मैं आपसे कुछ पूछने के लिए रुक गयी थी।
-मुझसे… पूछिए क्या पूछना है? वह चकित था।
-आपकी कविताओं में इतनी उदासी और एकाकीपन क्यों होता है ?
-जरूरी नहीं कि, सबकी कविताओं में खुशियों, फूलों और सपनों का जिक्र हो। वह मुस्कुराया। उस सांवले चेहरे और उस दृष्टि में ऐसा कुछ तो था जो नंदना को गहरे तक छू गया।
-आइये आगे चलते हैं या यहीं रुके रहने का इरादा है ?
नंदना उसके साथ-साथ चलने लगी। आगे के लोग काफी दूर निकल गए थे। अब सड़क पर सिर्फ उनके क़दमों की आहट थी और रावी का प्रवाह साथ-साथ चल रहा था।
-यह रावी बहुत शोर करती है। कभी-कभी तो सोचना तक मुश्किल हो जाता है।
-तो आप उससे थोड़ी दूर रहा करिए … नंदना मुस्कुराई।
मेरा घर ही रावी के किनारे है,यहाँ से बिल्कुल साफ़ दीखता है। वह है दूसरी तरफ मेरा घर ,मैं रोशनी जलती छोड़ आया हूँ। अब बताइए मैं रावी से दूर कैसे जा सकता हूँ ?
– तो रावी से कहिए वह चुप हो जाए।
अभिमन्यु खिलखिला कर हंस पड़ा। उसकी हंसी हवा में तैरती दूर तक चली गई.
देर तक सब वहीं चौगान में बैठे रह गए। काफी रात हो गयी तो कुछ को सर्वेश दा गाड़ी में छोड़ने चले गए। जिनका घर पास था वे एक बार फिर शुभकामनाएं दे कर वापस हो लिए।
अपने घर को जाने वाली सड़क पर नंदना चुप खड़ी अभिमन्यु को जाते देखती रही। जब अभिमन्यु अपने घर का दरवाजा खोल कर अंदर चला गया तब उसने अपने कमरे की ओर कदम बढ़ाए। उसका दिल बेहद उदास था।
इस बात को करीब एक महीना गुजर गया। एक शाम उसे सुधा भाभी मेडिकल स्टोर में दवाइयां खरीदती मिल गई। उसे देखते ही बोलीं -अभिमन्यु की तबीयत बेहद ख़राब हो गयी थी। कल ही हॉस्पिटल से लौटा है , पर उस दिन तो हम डर ही गए थे। एक तो वैसे भी उसकी देखभाल करने वाला कोई नहीं , फिर रहता भी इतनी दूर है कि ,…
उस शाम नंदना ने पतली पगडंडी पार की और अभिमन्यु के घर तक पहुंच गयी। वह खुले दरवाजे के बीच में खड़ी थी और अभिमन्यु को आभास तक नहीं हुआ था। वह चुपचाप ईजीचेयर पर बैठा खिड़की से बाहर देख रहा था।
क्या देख रहा था वह ? नीला आकाश, दूर दिखती बर्फीली पहाड़ियां या फिर सरसों के पीले फूलों से सजे हुए खेत। नंदना खामोश थी ,पर उसकी चूड़ियाँ खनक गईं। अभिमन्यु ने मुड़ कर उसे देखा और मुस्कुरा दिया।
-सभी आ कर चले गए, बस तुम्हीं बाकी थीं।
मुझे खबर तक नहीं कर सकते थे ?
-क्या यहाँ तक आने के लिए मुझे हक़ भी बताना होगा ?
-नंदना,… वह उसकी ओर झुक आया, मुझे उसी दिन लग रहा था कि कहीं कुछ ऐसा कुछ घटित हो रहा है जो नहीं होना चाहिए। फिर कब तक साथ दे पाऊंगा मैं ?
-मैं वहां तक साथ जाऊंगी जहाँ तक आप जाएंगे।
-मुझे आपकी आंखों से डर लगता है। आप कुछ कहें न कहें ,पर इनकी तरलता हर समय बोलती है।
नंदना ने कुछ नहीं कहा। उसने बिस्तर की चादर बदली। तकिये पर धुला गिलाफ चढ़ाया , गुलदान में रखे सूखे फूलों को बाहर फेंका और वहां रखे छोटे से मंदिर में धूप जला दी। वह दूध गर्म कर के ले तो अभिमन्यु ने आँखें खोल दीं। उसने हैरानी से देखा ,सारा कमरा लिली के ताजे फूलों और धूप की सुगंध से महक रहा था. वह एक पल उसे देखता रहा ,फिर धीरे से बोला -मेरे पास जितनी भी जिंदगी बची है उस वक्त तक मैं तुम्हें इस घर में आने का अधिकार तुम्हें देता हूँ।
सर्वेश दा और भाभी दोनों ही जैसे सकते में आ गए थे नंदना की बात सुन कर और सबसे ज्यादा आहत तो अभिमन्यु हुआ था।
-उसकी उम्र कम है नंदना कहीं भी किसी भी वक्त… हार कर सर्वेश दा ने कह ही दिया था।
– पर मैं उन्हें अकेलेपन की मौत नहीं मरने दूंगी। नंदना अपनी जगह दृढ़ थी.
गांव से नंदना की मां को बुलाया गया। पहले तो वह उदास हुईं फिर बेटी की ख़ुशी समझ कर चुप रह गईं। सारे ही अपने इकट्ठे हुए और मंदिर में दोनों का विवाह हो गया।
रात आधी से ज्यादा बीत चुकी थी जब सुधा भाभी नंदना को दरवाजे तक छोड़ गईं।
-अब आगे का रास्ता तुम्हें खुद तय करना है। जाने से पहले उन्होंने कहा.और नंदना का माथा चूम लिया।
पीली रेशमी साड़ी में लिपटी नंदना को देख कर अभिमन्यु चकित हो गया। उसकी नथ का मोती प्रकाश में दमक रहा था और माथे पर चन्दन चर्चित बिंदियाँ चेहरे को और भी मोहक बना रहीं थीं।
-स्वागतम,…आज कह सकता हूं कि मैंने मोनाल को देख लिया है। अभिमन्यु ने मुस्कुरा कर बाहें फैला दीं. अद्भुत आज बहुत सुन्दर लग रही हैं ,कुछ भी मांग लीजिए मुझसे।
-देंगें आप ? नंदना ने भारी पलकें उठाईं।
– बिना पूछे दिया।
– तो प्रॉमिस कीजिये आप कभी उदास नहीं होंगे।
-ए जेन्टलमैन्स प्रॉमिस कह कर अभिमन्यु ने उसे अपनी बाहों में समेट लिया। कितने ही पल गुजरते गए निःशब्द ,…
– नंदना, आज यह रावी शोर नहीं कर रही ? अचानक अभिमन्यु ने कहा।
-आते वक्त मैंने उससे कहा था ,कम से कम आज शोर मत करना , आज मुझे वे सारी बातें सुननी हैं जो अभि ने कहनी हैं।
-ओह नंदना आभारी हूँ तुम्हारा , सचमुच मुझे तुम्हारी बहुत जरूरत थी।
चाँद ऊपर चढ़ आया… उजली चांदनी में घाटी का चप्पा-चप्पा मुस्कराने लगा था। चारों ओर के पहाड़ घरों में जलते कुंकुमों से रोशन थे। रावी का प्रवाह धीमा था ठहरा हुआ- सा। शायद उसने भी प्यार की कीमत जान ली थी।

प्रिया आनंद

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