तेज और स्वास्थ्य के दाता भगवान सूर्यदेव

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सूर्य एक शक्ति है। भारत में तो सदियों से सूर्य की पूजा होती आ रही है। सूर्य तेज और स्वास्थ्य के दाता माने जाते हैं। यही कारण है कि विभिन्न जाति, धर्म एवं सम्प्रदाय के लोग दैवी शक्ति के रूप में सूर्य की उपासना करते हैं। सूर्य प्रत्यक्ष देवता है, सम्पूर्ण जगत के नेत्र हैं। इन्ही के द्वारा दिन और रात का सृजन होता है। इनसे अधिक निरन्तर साथ रहने वाला और कोई देवता नहीं है। इन्ही के उदय होने पर सम्पूर्ण जगत का उदय होता है और इन्ही के अस्त होने पर समस्त जगत सो जाता है।

इन्ही के उगने पर लोग अपने घरों के किवाड़ खोल कर आने वाले का स्वागत करते हैं, और अस्त होने पर अपने घरों के किवाड़ बंद कर लेते हैं। सूर्य ही कालचक्र के प्रणेता है। सूर्य की किरणों में समस्त रोगों को नष्ट करने की क्षमता विद्यमान है। सूर्य की प्रकाश – रश्मियों के द्वारा हृदय की दुर्बलता एवं हृदय रोग मिटते हैं। स्वास्थ्य, बलिष्ठता, रोगमुक्ति एवं आध्यात्मिक उन्नति के लिए सूर्योपासना करनी ही चाहिए। सूर्य नियमितता, तेज एवं प्रकाश के प्रतीक हैं। उनकी किरणें समस्त विश्व में जीवन का संचार करती हैं। भगवान सूर्य नारायण सतत् प्रकाशित रहते हैं। वे अपने कर्त्तव्य पालन में एक क्षण के लिए भी प्रमाद नहीं करते, कभी अपने कर्त्तव्य से विमुख नहीं होते। प्रत्येक मनुष्य में भी इन सदगुणों का विकास होना चाहिए। नियमतता, लगन, परिश्रम एवं दृढ़ निश्चय द्वारा ही मनुष्य जीवन में सफल हो सकता है तथा कठिन परिस्थितियों के बीच भी अपने लक्ष्य तक पहुंच सकता है।

सूर्य बुद्धि के अधिष्ठाता देव हैं। विद्यार्थियों को प्रतिदिन स्नानादि से निवृत्त होकर एक लोटा जल सूर्यदेव को अर्घ्य देना चाहिए। अर्घ्य देते समय इस बीजमंत्र का उच्चारण करना चाहिएः

ॐ ह्रां ह्रीं ह्रों सः सूर्याय नमः।

इस प्रकार मंत्रोच्चारण के साथ जल देने से तेज एवं बौद्धिक बल की प्राप्ति होती है। रविवार को प्रात: स्नान कर सूर्य की प्रतिमा या तस्वीर की कुमकुम, अक्षत, फूल अर्पित कर धूप और दीप से आरती करें, सूर्यदेव को अर्घ्य दें और यथाशक्ति इस मंत्र का जप करें –

ॐ भास्कराय विद्महे,
महातेजाय धीमहि
तन्नो सूर्य: प्रचोदयात्।।

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