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लोग राजा का आदेश आज भी मानते हैं यहां  

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वक्त चाहे जितना बदल गया हो पर कहीं- कहीं राजाओं का आदेश आज भी भगवान का आदेश माना जाता है । उनकी कही बात पत्थर की लकीर होती है जिसका सभी सिर झुका कर पालन करते हैं। किसी समय प्रजा पालक की भूमिका निभाते राजा भले ही बदलते समय के चलते आज मौजूद न हों पर उनकी प्रजा पीढ़ी -दर- पीढ़ी उन्हें अपना राजा मानती है।
भारत में दो क्षेत्र ऐसे हैं जिनका नाम विशेष कारणों से बदल गया – एक तो ‘मगध’ जो बौद्ध विहारों की अधिकता के कारण “बिहार” बन गया और दूसरा ‘दक्षिण कौशल’ जो छत्तीस गढ़ों को अपने में समाहित रखने के कारण “छत्तीसगढ़” बन गया। “छत्तीसगढ़” तो वैदिक और पौराणिक काल से ही विभिन्न संस्कृतियों के विकास का केन्द्र रहा है। यहां पर वैष्णव, शैव, शाक्त, बौद्ध के साथ ही अनेक संस्कृतियों का विभिन्न कालों में प्रभाव रहा है, पर राजाज्ञा का एक रोचक उदाहरण हमें मध्य प्रदेश से बनाए गए छत्तीसगढ़ में मिलता है।
छत्तीसगढ़ के जगदलपुर जिला मुख्यालय से करीब 35 किलोमीटर दूर इंद्रावती नदी के किनारे एक प्राचीन शिव मंदिर है। अनुमान है कि यह काफी पुराना है क्योंकि  शिवमंदिर परिसर में जो मूर्तियां हैं वे 10वीं शताब्दी की ठहरती हैं। इन मूर्तियों को छूना मना है। कहा जाता है कि यहां के राजा ने 74 साल पहले ऐसा आदेश पारित कर दिया था। राजाज्ञा की वह तख्ती आज भी इस मंदिर परिसर में टंगी है। बस्तरवासी अपने राजाओं का आदर करते रहे हैं और आज भी उनके आदेशों का सम्मान करते हैं, चूंकि वे बस्तर के राजा को ही अपनी आराध्या मां दंतेश्वरी का पुजारी मानते हैं।
इंद्रावती नदी के किनारे स्थित इस छिंदगांव के गोरेश्वर महादेव मंदिर में पुराने शिवलिंग के अलावा भगवान नरसिंह, नटराज और माता कंकालिनी की पुरानी मूर्तियां हैं। कहा जाता है  कि बस्तर के राजा शिव उपासना के लिए वर्षों से छिंदगांव शिवालय आते रहे और परिसर में पड़ी मूर्तियों को संरक्षित करने का प्रयास करते रहे हैं। उन्हीं के आदेश पर सागौन की लकड़ी पर खोदकर लिखा गया आदेश मंदिर में टंगा है, जिसमें अंग्रेजी और हिंदी में लिखा है
– “इस मूर्ति को हटाना, बिगाड़ना या तोड़ना मना है”- बाहुक्म बस्तर स्टेट दरबार।
इन मूर्तियों के साथ छेड़छाड़ तो दूर, इन्हें दूसरी जगह स्थापित करने का भी कभी प्रयास नहीं किया गया। यह मंदिर 1982 से पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित है। शिवालय में पड़ी पुरानी मूर्तियों को संग्रहालय में लाने का प्रयास किया गया, लेकिन ग्रामीणों ने राजाज्ञा के प्रति सम्मान और आस्था के चलते मूर्तियों को संग्रहालय लाने नहीं दिया।

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