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मंदिर में मुख्य मूर्ति का मुंह पूर्व की ओर होना जरूरी

Architecture for temples

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विश्व में धर्म के प्रति आस्था रखने वाले देवी-देवताओं की पूजा करते हैं। देवी-देवताओं की पूजा-प्रार्थना, आराधना करने के लिए मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, चर्च, मठ इत्यादि धार्मिक स्थलों का निर्माण किया जाता है। प्राचीन काल से भारत में पूजा के लिए भव्य मंदिरों का निर्माण किया जाता रहा है। सदियों पहले निर्मित हुए कई प्राचीन मंदिरों के प्रति जनमानस में आज भी अनंत श्रद्धा है। प्राचीन काल में मंदिरों की वास्तुरचना का शास्त्र बहुत उच्चकोटि का है। सामान्य वास्तु से यह अलग ही महत्व रखता है। देव मंदिरों के लिए भी एक विशिष्ट शास्त्र उपलब्ध है । प्राचीन देवालयों और आज के देवालयों में काफी अंतर है । भक्तों की भीड़ बहुत बढ़ गई है पर आज की तुलना में प्राचीन युग के मंदिर अत्यंत भव्य और श्रेष्ठ थे। फिलहाल अगर आप किसी मंदिर का निर्माण करने की सोच रहे हैं तो कुछ बातों का ध्यान अवश्य रखें ।

Architecture for temples

  • मंदिर का आधार जहां तक हो सके ऊंचाई पर हो क्योंकि मंदिर की मूर्ति की आंखों में एक विलक्षण शक्ति होती है। उस दृष्टि के सामने कुछ भी नहीं टिक सकता। यहां तक कि मंदिर के सामने अगर कोई घर भी हो तो उसमें रहने वाले कभी चैन से नहीं रह सकते।
  • अगर आप मंदिर के आधार को ऊंचाई नहीं दे सकते तो कमसे कम देव मूर्ति की नजर के सामने एक लंबा रास्ता होना चाहिए इससे देवमूर्ति की नजर को टाला जा सकता है।
  • असल बात तो यही है कि मूर्ति का मुंह किधर होना चाहिए तो ध्यान रखें कि मुख्य मूर्ति का मुंह पूर्व की ओर होना चाहिए। देव मंदिर का गर्भगृह, मंडप, शिखर आदि की लंबाई, चौड़ाई देखने में सुंदर और कलात्मक होनी चाहिए।

  • देव मंदिर के चारों ओर दीवार हो। पूर्व, उत्तर और पश्चिम में दरवाजे जरूर रखे जाएं।
  • मंदिर के अहाते में पूर्व -ईशान्य की तरफ भूगर्भ पानी की टंकियां कुएं या तालाब का होना आवश्यक है।
  • आग्नेय कोण में रसोई घर हो जहां अग्नि जलती रहे। वास्तु के आधार पर शिरडी के साईंनाथ मंदिर का उदाहरण लिया जा सकता है। साईं की मूर्ति का मुंह पूर्व की ओर मंदिर का प्रवेश द्वार उत्तर से बाहर जाने का मार्ग भी उत्तर दिशा से। बाबा की धूनी आग्नेय दिशा में और पानी की टंकी पूर्व की ओर है। ऐसे बहुत से मंदिरों के उदाहरण हमारे देश में हैं।

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