एलर्जी रहती है तो शतावरी जरूर लें

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शतावरी आयुर्वेद में एक बेहद परिचित प्राकृतिक रूप से उगने वाला पौधा है जो लता की तरह होता है और सहारा पाकर किसी भी पेड़ पौधे पर चढ़ जाता है। दवा में ज्यादातर इसके कंद का उपयोग किया जाता है। इसके पौधे को विकसित होने एवं कंद के पूर्ण आकार प्राप्त करने में तीन वर्ष का समय लगता है। चूंकि यह एक कंदयुक्त पौधा है अतः दोमट रेतीली मिट्टी में इसे असानी से खोदकर बिना क्षति पहुंचाए इसके कंद प्राप्त किए जा सकते हैं। मध्यप्रदेश के पन्ना में सारंग मंदिर की पहाड़ियों से लेकर कालिंजर और काल्दा पठार तक प्राकृतिक रूप से उपजने वाला तथा औषधीय गुणों से भरपूर शतावरी प्रचुर मात्रा में मिलती है। इसे नागदौन या शतामूल भी कहते हैं। यह लता के तौर पर श्रीलंका और भारत में पाया जाता है। इसके अनेक औषधीय गुण होते हैं।

  • यह हर्व लीवर को हेल्दी और सुरक्षित रखने में अहम भूमिका अदा करती है। शतावरी को सामान्यतः सुरक्षित माना जाता है लेकिन इसका सेवन करने वाले व्यक्ति को हार्ट और किडनी की कोई समस्या नहीं होनी चाहिए।
  • कुछ लोगों को इस हर्ब का सेवन करने पर वजन बढ़ने की शिकायत होती है। जिन लोगों को अक्सर एलर्जी की शिकायत रहती है उनको शतावरी के सेवन से एलर्जी होने की संभावना हो सकती है।
  • यदि आप नींद न आने की समस्या से परेशान हैं तो बस शतावरी की जड़ को खीर के रूप में पका लें उसमें थोड़ा गाय का घी डालें और सेवन करें। इससे आप तनाव से मुक्त होकर अच्छी नींद ले पाएंगे।

  • शतावरी की ताजी जड़ को मोटा-मोटा कूट लें, इसका रस निकालें और इसमें बराबर मात्रा में तिल का तेल मिलाकर पका लें। इस तेल को माइग्रेन जैसे सिरदर्द में लगाएं अवश्य लाभ होगा।
  • प्रसूता स्त्रियों में दूध न आने की समस्या होने पर शतावरी का चूर्ण -पांच ग्राम गाय के दूध के साथ देने से लाभ मिलता है।
  • बुखार में शतावरी के रस एवं गिलोय के रस का सेवन करने से बुखार से मुक्ति मिलती है।
  • शतावरी के रस को शहद के साथ लेने से जलन, दर्द एवं अन्य पित्त से सम्बंधित बीमारियों में लाभ मिलता है।

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