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बांधवगढ़ में भगवान विष्णु की प्रतिमा

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मध्य प्रदेश के उत्तर पूर्व में स्थित उमरिया जिला में बांधवगढ़ का किला काफी पुरातात्विक और ऐतिहासिक महत्व लिए हुए है। इस किले का निर्माण कब किया गया, इस संबंध में कोई ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। चूंकि इस किले का विवरण नारद-पंच रात्र और शिव पुराण में मिलता है, इसलिए ऐसा माना जाता है कि यह किला 2000 साल पुराना है।

कहने की जरूरत नहीं है कि यह किला एक प्राचीन अवशेष है, जो 2000 साल से भी ज्यादा पुराना हो सकता है। इस किले का संबंध कई राजवंशों से रहा है। उदाहरण के लिए तीसरी शताब्दी से माघा के बाद वाकाटक, पांचवीं शताब्दी से लेकर 10वीं शताब्दी तक सेंगर और 10वीं शताब्दी से कलीचुरी वंश का संबंध इस किले से रहा है।

बघेल वंश के महाराजा विक्रमादित्य सिंह ने रीवा को अपनी राजधानी बनाया और 1635 में किला छोड़कर बांधवगढ़ से हट गए। हालांकि अब बांधवगढ़ किला और टाइगर रिजर्व आपस में मिल गया है और यह बाघ और उनके बच्चों के घूमने का स्थान बन गया है।कहते हैं भगवान राम ने वानवास से लौटने के बाद अपने भाई लक्षमण को यह किला उपहार में दिया था इसी लिए इसका नाम बांधवगढ़ यानी भाई का किला रखा गया है।

वैसे इस किले का जिक्र पौराणिक ग्रंथों में भी है स्कंध पुराण और शिव संहिता में इस किले का वर्णन मिलता है। पहाड़ की आधी चढ़ाई पार करने पर पहला पड़ाव आता है शेष शय्या का… यहां लोग रुक कर कुंड का ठंडा पानी पीकर अपनी थकान मिटाते हैं ताकि आगे की चढ़ाई चढ़ सकें। यहां भगवान विष्णु की भीमकाय लेटी हुई प्रतिमा की श्रद्धालु पूजा अर्चना करते हैं। इस प्रतिमा के चरणों की ओर से एक झरने से अविरल धारा निकलती हैं जो कुंड में जमा होती रहती है।

भगवान विष्णु के सभी अवतारों की मूर्तियां भी यहां आकर्षण का केंद्र है इसकी पूजा के बाद लोग पहंचते हैं रामजानकी मंदिर में, जो सैकड़ों साल से आज भी अपनी गौरव गाथा सुनाने के लिए सीना ताने खड़ी है। यहां पत्थर का एक काफी बड़ा चबूतरा भी है जहां बैठ कर यहां के राजा कुदरत के नजारे का दीदार करते थे।

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