खांसी-जुकाम में बनफ्शा का काढ़ा जरूर पीएं

0

बनफ्शा की पैदावार कश्मीर और हिमालय की घाटियों में पांच से छह हजार फीट की ऊंचाई पर होती है। इसका आयात ईरान से भी किया जाता है और ईरान की बनफ्शा बहुत उत्तम जाति की होती है। भारत में कश्मीर और पश्चिमी हिमालय के समशीतोष्ण प्रदेश में पांच-छह हजार फीट की ऊंचाई पर पैदा होता है। उत्तरी भारत में बनफ्शा की जगह इसकी अन्य प्रजातियों का प्रयोग होता है, जिनके नाम हैं वायोला साइनेरिया और वायोला सर्पेन्स। यह सर्दी-खांसी और कफ प्रकोप को दूर करने वाली जड़ी-बूटी है, जो आयुर्वेदिक और यूनानी चिकित्सा पद्धति में एक समान रूप से उपयोग में ली जाती है।

शरीर में विभिन्न प्रकार की गर्मी, रक्त में तीक्ष्णता तथा तृष्णा शान्त करने के लिए इसका काढ़ा लाभदायक है। खांसी, जुकाम तथा श्वास, पार्श्वशूल एवं ज्वर में इसका गर्म काढ़ा देना चाहिए। इससे बहुत लाभ होता है और पेट की शुद्धि भी होती है। बनफ्शा के फूल शीतल, स्नेहक, कफनाशक और तनिक सारक हैं। फूलों के अंदर वामक सत्व होता है, इसे 120-240 मिग्रा की मात्रा में देने से वमन होता है। इसकी जड़ तथा फूल में वायोलीन नामक वमनकारी पदार्थ रहता है। फूलों में एक उड़नशील तेल, वायोला क्वासिट्रिन नामक पीला पदार्थ, कई रंजक-द्रव्य, शर्करा तथा मेथिल सैलिसिलिक ईस्टर नामक ग्लूकोसायड होता है।

जुकाम होने पर 5 ग्राम तुलसी के पत्‍ते, 20 ग्राम बनफ्शा, 10 ग्राम मुलहठी को लेकर पानी के साथ उबालकर छान लें। फिर 10 ग्राम मिश्री के साथ शर्बत की तरह चाश्‍नी तैयार कर लें। मात्रा- 1 चम्‍मच उम्र और ताकत के अनुसार दें। इससे जुकाम, खांसी, उल्‍टी आदि रोगों में लाभ होता है। सामान्‍य ज्‍वर की हरारत भी दूर हो जाती है।

Leave A Reply