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कई रोग-शोक-बाधा नष्ट करने की शक्ति है रुद्राक्ष में

benefits of Rudraksha

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रुद्राक्ष एक अत्यन्त विचित्र वृक्ष है । संसार में यही एक ऐसा फल है, जिसको खाया नहीं जाता, बल्कि गुद्दे को निकालकर उसके बीज को धारण किया जाता है । यह एक ऐसा काष्ठ है, जो पानी में डूब जाता है । पानी में डूबना यह दर्शाता है, कि इसका आपेक्षिक घनत्व कितना अधिक है । क्योंकि इसमें लोहा, जस्ता, निकल, मैंगनीज, एल्यूमिनियम, फास्फोरस, कैल्शियम, कोबाल्ट, पोटैशियम, सोडियम, सिलिका, गंधक आदि तत्व विद्यमान होते हैं । कई लोगों ने इसको धारण करने के बाद अपने शरीर में सकरात्मक उर्जा के संचार को महसूस किया है।

ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार रुद्र का मतलब भगवान शंकर (शिव) है। अक्ष आंख को कहते है और इन दोनों शब्दों से रुद्राक्ष बना है। जावा सुमात्रा( इन्डोनेशिया) में छोटे आकार के और नेपाल में बड़े आकार के रुद्राक्ष होते है। भारत में भी अब कई स्थलों पर यह वृक्ष लगाया गया है। रुद्राक्ष हमारे लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। पुराणों के अनुसार भगवान शंकर के नेत्र से ध्यानानंद आंसू की बूंद से यह वृक्ष जन्म लेता है। शिव का अर्थ ही कल्याण है। तो यह रुद्राक्ष कल्याण के लिए ही धरती पर आया है। इसके अनेक नाम है। पावन शिवाक्ष, रुद्राक्ष, भूतनाशक, नीलकठाक्षा, हराक्ष, शिवप्रिय, तृणमेरु, अमर, पुष्पचामर, रुद्राक, रुद्राक्य, अक्कम, रुद्रचलू आदि ज्यादा तर हम रुद्राक्ष को एक साधारण वृक्ष बीज समझ लेते है। कोई-इसे गले में तरह-तरह के लोकेट बनाकर माला बनाकर पहन लेते है उसका भी असर होता है।

लेकिन विधि-विधान से इसे धारण करना परम लाभकारी है। रुद्राक्ष का वृक्ष और फ़ल दोनों ही पूजनीय है। रुद्राक्ष का मानव शरीर से स्पर्श महान गुणकारी बतलाया गया है । इसकी महत्ता शिवपुराण, महाकालसंहिता, मन्त्रमहार्णव, निर्णय सिन्धु, बृहज्जाबालोपनिषद्, लिंगपुराणव कालिकापुराण में स्पष्ट रूप से बतलाई गई है ।
चिकित्सा क्षेत्र में भी रुद्राक्ष का विशद् वर्णन मिलता है ।
दाहिनी भुजा पर रुद्राक्ष बांधने से बल व वीर्य शक्ति बढती है ।
वात रोगों का प्रकोप भी कम होता है ।
कंठ में धारण करने से गले के समस्त रोग नष्ट हो जाते हैं, टांसिल नहीं बढता। स्वर का भारीपन भी मिटता है।
कमर में बांधने से कमर का दर्द समाप्त हो जाता है ।
मानव के अनेकों रोग शोक बाधा नष्ट करने की शक्ति रुद्राक्ष में है।

रुद्राक्ष प्रायः तीन रंगों में पाया जाता है । लाल, मिश्रित लाल व काला । इसमें धारियां बनी रहती है । इन धारियों को रुद्राक्ष का मुख कहा गया है । एक मुखी से लेकर इक्कीस मुखी तक रुद्राक्ष होते हैं । परंतु वर्तमान में चौदहमुखी तक रुद्राक्ष उपलब्ध हैं ।रुद्राक्ष के एक ही वृक्ष से कई प्रकार के रुद्राक्ष मिलते हैं । एक मुखी रुद्राक्ष को साक्षात् शिव का स्वरूप कहा गया है । सभी मुख वाले रुद्राक्षों का अलग-अलग फल एवं अलग-अलग धारण करने की विधियां बतलाई गयी हैं । रुद्राक्ष को शुद्ध जल में तीन घंटे रखकर उसका पानी किसी अन्य पात्र में निकालकर, पहले निकाले गए पानी को पीने से बेचैनी, घबराहट, मिचली व आंखों का जलन शांत हो जाता है ।

दो बूंद रुद्राक्ष का जल दोनों कानों में डालने से सिरदर्द में आराम मिलता है । रुद्राक्ष का जल हृदय रोग के लिए भी लाभकारी है । चरणामृत की तरह प्रतिदिन दो घूंट इस जल को पीने से शरीर स्वस्थ रहता है । इस प्रकार के अन्य बहुत से रोगों का उपचार रुद्राक्ष से, आयुर्वेद में वर्णित है ।आयुर्वेद में रुद्राक्ष को महा औषधि की संज्ञा दी गई है। इसके विभिन्न औषधीय गुणों के कारण रोगोपचार हेतु इसका उपयोग आदिकाल से ही होता आया है। जानकारी के अभाव में आम जन उसके इस लाभ से वंचित रह जाते हैं। पाठकों के लाभार्थ, किस रोग के उपचार में कौन-सा रुद्राक्ष उपयोगी होता है इसका एक विशद विश्लेषण यहां प्रस्तुत है।

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