भीष्म पंचम व्रतः पाप नाशक और अक्षय फलदायक

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यह व्रत कार्तिक शुक्ल एकादशी से प्रारम्भ होकर पूर्णिमा तक चलता है, लिहाजा इसे भीष्म पंचम कहा जाता है। इस व्रत की शुरुआत के दिन घर के आंगन या नदी तट पर सुंदर सा मंडप तैयार करें। वह स्थान गोबर से लीप कर शुद्ध करें। यदि स्थान कच्चा नहीं है तो गंगा जल आदि से वह स्थान पवित्र करना चाहिए। वहां वेदी बनाएं तथा तिल भरकर कलश की स्थापना करें।

मंडप में विष्णु प्रतिमा की स्थापना कर षोडशोपचार पूजन करें तत्पश्चात ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र से भगवान वासुदेव की अराधना करनी चाहिए तथा ऊँ विष्णवे नम: स्वाहा मंत्र से तिल, जौ की 108 आहुतियां दे कर हवन करना चाहिए। सामान्य पूजा के अतिरिक्त पहले दिन भगवान के हृदय का कमल पुष्पों से पूजन करें ,दूसरे दिन कटि प्रदेश का विल्व पत्रों से पूजन करें तीसरे दिन घुटनों का केतकी के फूलों से पूजा करें, चौथे दिन चरणोंका चमेली से तथा पांचवें दिन संपूर्ण विग्रह का तुलसी की मंजरियों से पूजा करें। यह व्रत पाप नाशक और अक्षय फल दायक है।

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