पूजाघर में रखें दक्षिणावर्त शंख, बढ़ेगी आय

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शंखों की प्रजाति में दक्षिणावर्त शंख दुर्लभ एवं महत्वपूर्ण है। भारत में जितने भी शंख पाए जाते हैं वे वामवर्त शंख होते हैं, परंतु यह प्रकृति का चमत्कार ही कहा जाएगा कि हजारों-लाखों में कहीं एक शंख दक्षिणावर्त होता है। जिस शंख का पर्दा दाईं तरफ खुला रहता है वही दक्षिणावर्त शंख होता है। यह आसानी से प्राप्त भी नहीं होता और इसका मूल्य भी बहुत होता है। दक्षिणावर्त शंख जिसके घर में रहता है वहां स्वयं स्थिर लक्ष्मी निवास करती है। इसे अत्यंत आदर के साथ पवित्र स्थान में रख कर पूजा करनी चाहिए। यह शंख साक्षात लक्ष्मी का स्वरूप माना गया है, यह जिस घर में होता है वहां आर्थिक अभाव नहीं रहता। इसकी नित्य पूजा होने से समाज में प्रतिष्ठा बढ़ती है सम्मान मिलता है तथा आय में वृद्धि होती है।
इस शंख के भी दो भेद हैं – नर और मादा शंख। मोटी परत वाला भारी शंख नर शंख होता है और पतली परत वाला पतला तथा हल्के वजन वाला मादा शंख होता है। नर शंख अधिक फलदायक है। अथर्ववेद के शंखमणि सूक्त के सात मंत्रों में कहा गया है कि यह शंख , अंतरिक्ष, वायु, ज्योर्तिमंडल एवं सुवर्ण आभा से निर्मित है। इसकी ध्वनि शत्रुओं को निर्बल करने वाली है। यह हमारा रक्षक है तथा रोग, अज्ञान और अलक्ष्मी को दूर करने वाला है। यह चंद्रमा के अमृत मंडल से उत्पन्न है तथा इसे वीर लोग ही अपने पास रखते हैं। अन्य ग्रंथों में भी कहा गया है-
शंखचंद्रार्क दैवत्यं,सध्ये वरुण दैवतम्
पृष्ठे प्रजापतिम विद्यादग्रे गंगा सरस्वतीम्
त्रैलोक्ये यानि तीर्थानि वासुदेवस्य चाज्ञया
शंखे तिष्ठन्ति विप्रेंद्र तस्मात् शंख प्रपूज्ययेत
दर्शनेन हि शंखस्य किं पुन:स्पर्शनेन तु
विलयं यान्ति पापानि हिमवद भास्करोदये…
कहने का अर्थ यह है कि यह शंख चंद्र और सूर्य के समान देव स्वरूप है। इसके मध्य भाग में वरुण, पृष्ठ भाग में ब्रह्मा और अग्रभाग में गंगा नदी है।
तीनों लोकों में जितने भी तीर्थ हैं, सब इसी में आकर समा गए हैं इसलिए इसकी पूजा करनी चाहिए। इसे देखने भर से पाप नष्ट हो जाते हैं फिर इसे छूने की तो बात ही क्या है। यह दक्षिणावर्त शंख जिसके घर में रहता है वहां स्वयं स्थिर लक्ष्मी निवास करती है। इसे अत्यंत आदर के साथ पवित्र स्थान में रख कर पूजा करनी चाहिए। दीपावली की रात्रि को कांसे या चांदी की थाली में कुंकुम से अष्टदल बना कर उस पर दक्षिणावर्त शंख रखें। इस शंख का मुंह साधक की ओर होना चाहिए। फिर इसे जल से स्नान करवा कर सफेद कपड़े से पोंछ लें तथा पुष्प ,अक्षत तथा धूप से पूजा करें। फिर मूल मंत्र से 125 मालाएं फेरें।
मंत्र – ऊँ ह्रीं श्रीं क्लीं ब्लूं दक्षिण मुखाय शंख निधये
समुद्र प्रभवाय शंखाय नम:
प्रात: काल इसे उठाकर पूजाघर या तिजोरी में स्थापित कर दें। वस्तुत: जो भाग्यशाली होते हैं और जिनके जीवन में भाग्योदय होने वाला होता है। उन्हीं के घर में दक्षिणावर्त शंख जाता है और वहां स्थायी रूप से निवास करता है।
दीर्घायु तथा आरोग्यपूर्ण जीवन के लिए करें भगवान धनवंतरि का ध्यान

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