लक्ष्मी स्वरूप है एकाक्षी नारियल

0

हमारी सनातन पूजा पद्धति में श्रीफल यानी नारियल का विशेष महत्व है। हिन्दू धर्म की कोई भी पूजा बिना श्रीफल अर्पण के पूर्ण नहीं होती। चाहे वह प्रसाद के रूप में हो या भेंट के रूप में। गौरतलब है कि सभी नारियल श्रीफल नहीं कहे जाते। सिर्फ एकाक्षी नारियल ही श्री फल कहा जाता है। ‘श्री’ अर्थात् लक्ष्मी, ‘एकाक्षी नारियल’ को साक्षात लक्ष्मी का रूप माना गया है। यह अत्यन्त दुर्लभ होता है। सैकड़ों-हजारों नारियलों में कोई एक श्रीफल होता है। एकाक्षी नारियल जिसके भी पास होता है उस पर सदैव लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है। उसे जीवन में कभी आर्थिक संकटों का सामना नहीं करना पड़ता।

एकाक्षी नारियल को तोड़ना अशुभ होता है। सामान्य नारियल की आकृति में तीन छिद्र दिखाई देते हैं जिन्हें प्रचलित भाषा में दो आंखें व एक मुख कहा जाता है। ध्यान से देखने पर आपको नारियल में तीन खड़ी रेखाएं भी दिखाई देती हैं किन्तु एकाक्षी नारियल अर्थात् श्रीफल में केवल दो छिद्र होते हैं। जिन्हें एक मुख व एक आंख कहा जाता है। जैसा कि नाम से स्पष्ट है एकाक्षी अर्थात् एक आंख वाला।एकाक्षी नारियल में तीन के स्थान पर केवल दो रेखाएं ही होती हैं। एकाक्षी नारियल प्राप्त होने पर विशेष मुहूर्तों जैसे दीपावली, होली, रवि-पुष्य, गुरु-पुष्य, ग्रहण काल आदि पर षोडषोपचार पूजा कर उसे लाल रेशमी वस्त्र में बांधकर अपने व्यापारिक प्रतिष्ठान या तिजोरी में रखने या पूजा स्थान में रखने से सदैव लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है। एकाक्षी नारियल में धन आकर्षण की अद्भुत क्षमता होती है।

पूजा विधि :

  • एकाक्षी नारियल प्राप्त होने पर किसी शुभ मुहूर्त जैसे दीपावली, रवि-पुष्य, गुरु-पुष्य, होली इत्यादि में इसका विधिवत् पूजन करें।
  • पूजाघर में एक चौकी पर लाल वस्त्र बिछाएं तथा उस पर एकाक्षी नारियल स्थापित करें। घी वसिंदूर का लेप बनाकर एकाक्षी नारियल पर अच्छी तरह लगाएं ध्यान रहे कि केवल आंख को छोड़कर शेष पूरे नारियल को घी मिश्रित सिन्दूर के लेप से ढक देना है।
  • तत्पश्चात एकाक्षी नारियल को कलावा या मौली से लपेटकर अच्छी तरह से पूरा ढंककर लाल रेशमी वस्त्र में बांधकर उसकी षोडषोपचार पूजा करें। पूजा के उपरान्त निम्न मंत्र की कम से कम 11 माला जप करें।
    ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं महालक्ष्मी स्वरूपाय एकाक्षी नारिकेलाय नम:
  • जप के उपरान्त निम्न मंत्र की 1 माला से हवन करें।
    “ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं महालक्ष्मी स्वरूपाय एकाक्षि नारिकेलाय सर्वसिद्धिं कुरू कुरू स्वाहा॥”

Leave A Reply