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फील्ड मार्शल सैम मानेक शॉ : वी मिस यू सैम …

Field Marshal Sam Manekshaw Birth Anniversary special

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फील्ड मार्शल सैम मानेक शॉ का जन्म 3 अप्रैल, 1914 को अमृतसर के एक पारसी परिवार में हुआ। उन्होंने अमृतसर में ही शिक्षा पाई, फिर नैनीताल के शेरवुड कॉलेज में दाखिल हो गए। यह रोचक ही था कि इंडियन मिलिट्री एकेडमी के पहले बैच के लिए चुने जाने वाले पहले 40 छात्रों में से सैम एक थे। 17वीं इंफेंट्री डिवीजन में तैनात सैम ने पहली बार द्वितीय विश्वयुद्ध में जंग का सामना किया। वे 4-12 फ्रंटियर फोर्स रेजिमेंट के कैप्टन के तौर पर बर्मा अभियान के दौरान सेतांग नदी के तट पर जापानियों से लोहा लेते हुए गम्भीर रूप से घायल हो गए थे। स्वस्थ होने पर मानेक शॉ पहले स्टाफ कॉलेज क्वेटा, फिर जनरल स्लिम्स की 14वीं सेना के 12 फ्रंटियर राइफल फोर्स में लेफ्टिनेंट बनकर बर्मा के जंगलों में एक बार फिर जापानियों से दो-दो हाथ करने जा पहुंचे, यहां वे लड़ाई में फिर बुरी तरह घायल हुए, द्वितीय विश्वयुद्ध खत्म होने के बाद सैम को स्टाफ आफिसर बनाकर जापानियों के आत्मसमर्पण के लिए इंडो-चायना भेजा गया जहां उन्होंने लगभग 10000 युद्धबंदियों के पुनर्वास में अपना योगदान दिया।

विभाजन के बाद 1947-48 की कश्मीर की लड़ाई में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारत की आजादी के बाद गोरखों की कमान संभालने वाले वे पहले भारतीय अधिकारी थे। गोरखों ने ही उन्हें सैम बहादुर के नाम से सबसे पहले पुकारना शुरू किया था। सैम को नागालैंड समस्या को सुलझाने में अविस्मरणीय योगदान के लिए 1968 में पद्मभूषण से नवाजा गया। सात जून 1968 को सैम जब आठवें चीफ ऑफ द आर्मी स्टॉफ बने तो उनके सामने इम्तिहान की घड़ी थी। हजारों शरणार्थी पूर्वी पाकिस्तान से भारत आने लगे थे। सैम को लगा कि अब युद्ध छिड़ जाएगा और वही हुआ। पाकिस्तान से लड़ाई शुरू हो गई पर सैम के युद्ध कौशल के आगे पाकिस्तान की करारी हार हुईऔर बांग्ला देश का निर्माण हुआ। एक जनवरी, 1973 को उन्हें फील्ड मार्शल के मानद पद से अलंकृत किया गया।चार दशकों की सैन्य सेवा के बाद 15 जनवरी, 1973 को वे सेवानिवृत्त होकर वेलिंगटन में बस गए। वहीं 27 जून, 2008 को उनका निधन हुआ। सैम के साहसी और बेबाक जीवन के कुछ किस्से वाकई बहुत रोचक हैं।

1971 की लड़ाई में इंदिरा गांधी चाहती थीं कि वह मार्च में ही पाकिस्तान पर चढ़ाई कर दें लेकिन सैम ने ऐसा करने से इनकार कर दिया क्योंकि भारतीय सेना उस समय हमले के लिए तैयार नहीं थी। इंदिरा गांधी इससे नाराज भी हुईं। मानेकशॉ ने पूछा कि आप युद्ध जीतना चाहती हैं या नहीं। उन्होंने कहा, “हां”
इस पर मानेकशॉ ने कहा, मुझे छह महीने का समय दीजिए। मैं गारंटी देता हूं कि जीत आपकी होगी। इंदिरा गांधी के साथ उनकी बेतकल्लुफ़ी के कई किस्से मशहूर हैं। एक बार इंदिरा गांधी जब विदेश यात्रा से लौटीं तो मानेकशॉ उन्हें रिसीव करने पालम हवाई अड्डे गए। इंदिरा गांधी को देखते ही उन्होंने कहा कि आपका हेयर स्टाइल जबरदस्त लग रहा है। इस पर इंदिरा गांधी मुस्कराईं और बोलीं, और किसी ने तो इसे नोटिस ही नहीं किया? सैम के लिए सबसे गर्व की बात यह नहीं थी कि भारत ने उनके नेतृत्व में पाकिस्तान पर जीत दर्ज की। उनके लिए सबसे बड़ा क्षण तब था, जब युद्ध बंदी बनाए गए पाकिस्तानी सैनिकों ने स्वीकार किया था कि उनके साथ भारत में बहुत अच्छा व्यवहार किया गया था।

साल 1947 में मानेकशॉ और याहिया ख़ां दिल्ली में सेना मुख्यालय में तैनात थे याहिया ख़ां को मानेकशॉ की मोटरबाइक बहुत पसंद थी। वह इसे ख़रीदना चाहते थे लेकिन सैम उसे बेचने के लिए तैयार नहीं थे। याहिया ने जब विभाजन के बाद पाकिस्तान जाने का फ़ैसला किया तो सैम उस मोटरबाइक को याहिया ख़ां को बेचने के लिए तैयार हो गए। दाम लगाया गया 1,000 रुपए। याहिया मोटरबाइक पाकिस्तान ले गए और वादा कर गए कि जल्द ही पैसे भिजवा देंगे। सालों बीत गए लेकिन सैम के पास वह चेक कभी नहीं आया। बहुत साल बाद जब पाकितान और भारत में युद्ध हुआ तो मानेक शॉ और याहिया ख़ां अपने-अपने देशों के सेनाध्यक्ष थे। लड़ाई जीतने के बाद सैम ने मज़ाक किया, “मैंने याहिया ख़ां के चेक का 24 साल तक इंतज़ार किया लेकिन वह कभी नहीं आया। आखिर उन्होंने 1947 में लिया गया उधार अपना देश दे कर चुकाया। सैम जैसा ऑफिसर सदियों में एक होता है … वी रीयली मिस यू सैम …।

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