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महाप्रलय के समय मौज़ूद रहती हैं मां धूमावती

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महाविद्याओं में धूमावती का व्यक्तित्व अलग ही है। ये सातवीं महाविद्या हैं और महाप्रलय के समय मौज़ूद रहती हैं उनका रंग महाप्रलय के बादलों जैसा है। जब ब्रह्मांड की उम्र खत्‍म हो जाती है, काल खत्म हो जाता है और स्वयं महाकाल शिव भी अंतर्ध्यान हो जाते हैं, तब मां धूमावती अकेली खड़ी रहती हैं और काल तथा अंतरिक्ष से परे काल की शक्ति को जताती हैं। उस प्रलय के समय न तो धरती, न ही सूरज, चांद, सितारे रहते हैं। रहता है सिर्फ़ धुआं और राख। वही चरम ज्ञान है, निराकार… न अच्छा, न बुरा; न शुद्ध, न अशुद्ध; न शुभ, न अशुभ- धुएं के रूप में अकेली खड़ी मां धूमावती…।

धूमावती शक्ति अकेली हैं। उनका कोई स्वामी नहीं है। देवी धूमावती की उपासना विपत्ति नाश, रोग-निवारण, युद्ध-जय, उच्चाटन और मारण के लिए की जाती है। देवी धूमावती के उपासक पर दुष्टाभिचार का प्रभाव नहीं पड़ता। तंत्र ग्रंथों के अनुसार धूमावती ही उग्रतारा हैं, जो धूम्रा होने से धूमावती कही जाती हैं। देवी जिस पर भी प्रसन्न हो जाएं उसके रोग और शोक को नष्ट करती हैं और यदि देवी किसी पर कुपित हो जाएं तो उस व्यक्ति के जीवन को दुखमय बना देती हैं। देवी को रात्रि सूक्त में ‘सुतरा’ कहा गया है। सुतरा का अर्थ होता है सुखपूर्वक तारने वाला। मां अपने उपासकों को सुख देने वाली हैं।

धूमावती देवी को स्थिर प्रज्ञा का प्रतीक माना गया है। वे उस वास्तविकता को जताती हैं जो कड़वी, रूखी है इसलिए अशुभ लगती हैं। वे अलौकिक शक्तियों से संपन्न हैं और अपने साधक को सांसारिक मोह-माया से विरक्ति दिलाती हैं। यही विरक्त भाव उनके साधकों को अन्य लोगों से अलग-थलग और एकांतवास करने को प्रेरित करता है। हिंदू धर्म में इसे अध्यात्मिक खोज की चरम स्थिति कहा जाता है। उनकी मूर्ति में भी उन्हें हमेशा वरदान देने की मुद्रा में दिखाया जाता है। हालांकि, उनके चेहरे पर उदासी छायी रहती है। वे महाविद्या तो हैं लेकिन उनका व्यवहार गांव-टोले की दादी- मां जैसा है- सभी के लिए मातृत्व से लबालब। कहा जाता है कि अगर धूमावती जयंती के दिन देवी की एक झलक भी प्राप्त हो जाए तो देखने वाले को दिव्य आशीर्वाद प्राप्त हो जाता है।

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