पंडित जगन्नाथ के श्लोकों से मंत्रमुग्ध चली आईं मां गंगा

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पंडितराज ने पत्नी संग ली थी जल समाधि

गंगा मात्र एक नदी ही नहीं है। गंगा से भारतीय दर्शन तथा आध्यात्मिकता का गहरा संबंध रहा है। प्राचीन काल से ही यह मान्यता चली आ रही है कि गंगा का जल सभी पापों को धो देता है। वेद पुराणों में गंगा की प्रशंसा है। यह नदी कवियों, विचारकों और लेखकों की प्रिय रही है। गंगा की अनेक स्तुतियों में पंडित जगन्नाथ की गंगा को समर्पित गंगा लहरी सर्वोत्तम रचना है।

पंडित जगन्नाथ संस्कृत के प्रकांड विद्वान और संगीताचार्य थे, पर गंगा ने उनके लिए जो किया वह चकित करता है। भक्त के प्रति दयालुता यहां स्पष्ट हो जाती है। उनके द्वारा रचित गंगालहरी के 52 श्लोकों में इस महान विद्वान द्वारा आर्तभाव से निवेदन किया गया है कि वे उन तक आएं और उनकी सत्यता सिद्ध करने के लिए उन्हें अपनी लहरों में समेट ले जाएं। उनके आवाहन को मां गंगा ठुकरा नहीं सकीं। हर श्लोक के साथ गंगा एक-एक सीढ़ी चढ़ती आईं और उन्हें समेट कर ले गईं। पंडित जगन्नाथ ने अपने लिए ऐसी मृत्यु क्यों चुनी ? उन्होंने ऐसा कौन सा पाप किया था जिसके कारण उन्हें मृत्यु का वरण करना पड़ा। पंडित जगन्नाथ किसे बताना चाह रहे थे कि वे सही हैं और इसकी साक्षी स्वयं गंगा बन गई थीं। इसके पीछे की कथा रोचक है।
पंडित जगन्नाथ का जन्म सनातनी तेलगु परिवार में हुआ था। अपना अध्ययन समाप्त करके वे मुगल दरबार में चले गए जहां उन्हें उनकी योग्यता और विद्वता पर पंडितराज की उपाधि मिली। वहां रहते हुए एक मुगल शहजादी से उनका प्रेम हो गया। समस्त विरोधों के बावजूद दोनों ने विवाह कर लिया पर इस कारण उनके समाज ने उन्हें बहुत अपमानित किया और जाति बहिष्कृत कर दिया। दुःखी होकर दोनों पति-पत्नी काशी के गंगा घाट पर बैठ कर साथ-साथ मधुर स्वर में गंगा का आवाहन करने लगे। उनका गायन जब चरम पर पहुंचा तो एक चमत्कार घटित हुआ। गंगा की लहरें उठीं और उन्होंने पंडित जगन्नाथ को अपने घेरे में ले लिया। उन्होंने पत्नी को भी साथ लेने का अनुरोध किया तो गंगा दोनों को अपने साथ समेट ले गईं। दोनों ने जल समाधि ले ली। जो गंगा को मानते हैं उन्हें भी गंगा ने साबित कर दिया कि मानव धर्म सबसे बड़ा धर्म है। यह दो महान सभ्यताओं के मिलन का सुंदर उदाहरण था जिसे मां गंगा ने साक्षी देकर सत्यापित कर दिया था।

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