वाणी की देवीः नदीतमे देवितमे सरस्वति

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श्वेत पद्म पर आसीन, हंसवाहिनी, तुषार धवल कान्ति, वाली वागेश्वरी का वर्ण हिम,कपूर और चंद्रमा की आभा के समान शुभ्र है। ब्रह्मतत्व ही उनका एकमात्र स्वरूप है। वे अंतर्यामी रूप से समस्त त्रिलोकी का नियंत्रण करती हैं। एक समय नदी रूप में प्रकट हुई सरस्वती अगाध जलराशि का परिचय देती थीं। अब वे देवी स्वरूप में मनुष्य मन के दिव्य भाव को प्रकाशित करती हैं। जिनकी कृपा, मनुष्य में कला, विद्या, ज्ञान तथा प्रतिभा का प्रकाश करती है। वही समस्त विद्याओं की अधिष्ठात्री हैं। यश उन्हीं की धवल अंग ज्योत्स्ना है।

वे सत्त्वरूपा, श्रुतिरूपा, आनन्दरूपा हैं। मनुष्य समाज को महानतम सम्पत्ति-ज्ञानसम्पदा प्रदान करती है। श्वेत पुष्प व मोती इनके आभूषण हैं, तथा श्वेत कमल पर ये विराजमान हैं। इनके हाथ में वीणा शोभित है। वेद इन्हें जलदेवी के रूप में महत्ता देते हैं।श्रुतियां उन वाग्देवी की स्तुति करती हैं। विश्व में सुख, सौन्दर्य का वही सृजन करती हैं। वे माताओं में ,नदियों में और देवियों में सर्वश्रेष्ठ हैं। कमलवन में विचरण करने वाली मां सरस्वती हमारा कल्याण करें।

या कुंदेंदु तुषारहार धवला, या शुभ्र वस्त्रावृता |
या वीणावर दण्डमंडितकरा, या श्वेतपद्मासना ||
या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभ्रृतिभिर्देवै: सदा वन्दिता |
सरस्वती स्तुति सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेष जाड्यापहा ||

सरस्वती का प्राकट्य

सृष्टि के प्रारंभिक काल में भगवान विष्णु की आज्ञा से ब्रह्मा ने जीवों, खासतौर पर मनुष्य की रचना की। उन्हें लगता था कि कुछ कमी रह गई है जिसके कारण चारों ओर मौन छाया रहता है। ब्रह्मा ने अपने कमंडल से जल छिड़का, पृथ्वी पर जलकण बिखरते ही उसमें कंपन होने लगा। इसके बाद वृक्षों के बीच से एक अद्भुत शक्ति प्रकट हुई। यह एक चतुर्भुजी सुंदर स्त्री थी जिसके एक हाथ में वीणा तथा दूसरा हाथ वर मुद्रा में था। अन्य दोनों हाथों में पुस्तक एवं माला थी। ब्रह्मा ने देवी से वीणा बजाने का अनुरोध किया। जैसे ही देवी ने वीणा का मधुरनाद किया, संसार के समस्त जीव-जन्तुओं को वाणी प्राप्त हो गई। जलधारा में कोलाहल व्याप्त हो गया। पवन चलने से सरसराहट होने लगी। तब ब्रह्मा ने उस देवी को वाणी की देवी कहा।

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