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ऑटिज्म : अच्छी देखभाल और सही सहायता है जरूरी

Good care and proper help is important for people Suffering from autistic disorder

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वैसे तो ऑटिज्म (Autism) मस्तिष्क की ही एक बीमारी है, पर यह एक बालक और साथ ही उसके माता-पिता को भी असामान्य जीवन जीने पर विवश कर देती है। दरअसल इसमें मस्तिष्क के कुछ हिस्से एक साथ ही काम करने में विफल हो जाते हैं। इसे ऑटिज्म स्पेक्ट्रम विकार भी कहा जाता है। फिर ये लोग सामान्य रूप से बाकी लोगों की तरह सुनते, देखते और महसूस नहीं करते। जिसे यह बीमारी होती है वह जीवन भर के लिए होती है क्योंकि इसे ठीक नहीं किया जा सकता।
इस बीमारी से पीड़ित सभी लोगों को किसी न किसी कठिनाई का सामना करना पड़ता है। इनकी अलग प्रकार की मानसिक और स्वास्थ्य समस्याएं होती हैं। माता-पिता की अच्छी देखभाल और सही सहायता मिलने से इन्हें काफी मदद मिल जाती है। ऑटिस्टिक डिसऑर्डर से पीड़ित रोगी क्लासिकल ऑटिज्म की श्रेणी में आता है। ऐसे बच्चे देर से बोलते हैं। उन्हें समाज और संचार की चुनौतियों का सामना भी करना पड़ता है । उनकी रुचियां अलग हो सकती हैं व्यवहार असामान्य हो सकता है उन्हें भाषा या बौद्धिक समस्याएं भी हो सकती हैं।
एस्पर्जर सिंड्रोम से पीड़ितों में कुछ लक्षण ऑटिस्टिक डिसऑर्डर वाले होते हैं, उनमें असामान्य व्यवहार होता है रुचियां भी अलग होती हैं, पर उन्हें भाषा की या बौद्धिक समस्या नहीं होती। इसके विपरीत परवेसिव डिवलपमेंटल विकार में लक्षण पहले दोनों जैसे ही होते हैं, पर इन्हें सामाजिक और संचार की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे बच्चे अपना नाम पुकारे जाने पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देते। उन्हें कोई प्यार से गले लगाना चाहे तो वे इसका विरोध करते हैं। ज्यादातर अकेले खेलने में खुश रहते हैं। वे बोलने में देरी करते हैं  या फिर वाक्य सही नहीं बोल पाते। अक्सर वे तब ही बात करना चाहते हैं जब उन्हें कुछ चाहिए होता है।
बोलने में उनकी लय बिखरी होती हैऔर वे कभी -कभी एक गीत की तरह या रोबोट के जैसी आवाजें निकालते हैं। वे शब्द और वाक्यांश भी बोलते हैं पर उनके अर्थ नहीं जानते। सरल से सरल प्रश्नों को भी सुनने में असमर्थ होते हैं यहां तक कि उन्हें दिशाओं का भी ज्ञान नहीं होता। ऐसे बच्चे कभी तो निष्क्रिय होते हैं और कभी बेहद आक्रामक हो जाते हैं। माता-पिता के लिए इनके लक्षणों को समझना आवश्यक है क्योंकि अक्सर उनका व्यवहार प्रतिरोधी होता है। माना जाता है कि यह बीमारी आनुवांशिक होती है या फिर दूषित पर्यावरण के कारण हो जाती है। जरूरी है कि माताएं गर्भावस्था में अधिक दवाएं न लें डॉक्टर की सलाह का पालन करें। ऐसे बच्चे की मां में धैर्य का होना आवश्यक है।
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