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गोवर्धन पूजा में करें गउओं की अराधना

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गोवर्धन पर्वत, ब्रज की छोटी सी पहाड़ी मात्र है, लेकिन इसे गिरिराज (पर्वतों का राजा) भी कहा जाता है क्यों कि इसे भगवान कृष्ण के समय का एक मात्र स्थाई व स्थिर अवशेष माना जाता है और ऐसी मान्यता है कि यद्धपि यमुना नदी पूर्वकाल में समय-समय पर अपनी धारा बदलती रही है, लेकिन गोवर्धन अपने मूल स्थान पर ही अविचलित रूप में विधमान रहा है। इसलिए इसे भगवान कृष्ण के प्रतीक स्वरूप भी माना जाता है और इसी रूप में इसकी पूजा भी की जाती है। दीपावली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा की जाती है, किसान लोग इस पूजा को बड़े उत्साह के साथ करते हैं। दीपावली के अगले दिन होने वाली इस पूजा में गोवर्धन पूजन के साथ गौ पूजन, अन्नकूट पूजन, मर्गपाली और बलि पूजन भी होता है। गोवर्धन पूजन में गोधन यानी गायों की पूजा विशेष है क्योंकि गाय को देवी लक्ष्मी का रूप माना जाता है। देवी लक्ष्मी जिस प्रकार सुख समृद्धि प्रदान करती है, उसी प्रकार गौ माता भी अपने दूध रूपी धन से हमारे स्वास्थ्य को उत्तम रखती है।

gobardhan-4गोवर्धन पूजा मंत्र :
लक्ष्मीर्या लोकपालानां धेनुरूपेण संस्थिता।
घृतं वहति यज्ञार्थ मम पापं व्यपोहतु।।

गोवर्धन पूजा का महत्त्व :
इस उत्सव को गांव के लोग बड़े चाव से मानते हैं। गांव के लोग इस पूजा के माध्यम से जलवायु और प्राकृतिक संसाधनों को अपना धन्यवाद देते हैं। इनकी ये भावना होती है कि इस पूजा के कारण ही मानव जाति में सभी प्राकृतिक साधन उपलब्ध है। इस दिन पूजा के लिए लोग अपने घर के पशुओं ( गाय और बैल ) को स्नान कराते हैं, उनके पैर धोते हैं, फूल, माला, धूप और चंदन आदि से उनका पूजन करते हैं, साथ ही इस दिन गायों को मिठाई भी खिलाई जाती है और उनकी आरती उतारी जाती है साथ ही इस दिन पकवानों के बीच में श्री कृष्ण की मूर्ति भी स्थापित की जाती है। माना जाता है कि गौ माता का दूध, उसके दूध से बनी दही, घी, छाछ और मक्खन, यहां तक की गौ माता का मूत्र भी मानवजाति के लिए कल्याणकारी होता है। इसलिए गाय माता को गंगा नदी के तुल्य माना जाता है और इनकी पूजा होती है।

gobardhan-1गोवर्धन परिक्रमा :
सभी हिंदूजनों के लिए इस पर्वत की परिक्रमा का विशेष महत्व है। वल्लभ सम्प्रदाय के वैष्णवमार्गी लोग तो अपने जीवनकाल में इस पर्वत की कम से कम एक बार परिक्रमा अवश्य ही करते हैं क्योंकि वल्लभ संप्रदाय में भगवान कृष्ण के उस स्वरूप की पूजा-अर्चना, आराधना की जाती है, जिसमें उन्होंने बाएं हाथ से गोवर्धन पर्वत उठा रखा है और उनका दायां हाथ कमर पर है। इस पर्वत की परिक्रमा के लिए समूचे विश्व से वल्लभ संप्रदाय के लोग, कृष्णभक्त और वैष्णवजन आते हैं। यह पूरी परिक्रमा 7 कोस अर्थात लगभग 21 किलोमीटर है। परिक्रमा मार्ग में पड़ने वाले प्रमुख स्थल आन्यौर, जातिपुरा, मुखार्विद मंदिर, राधाकुंड, कुसुम सरोवर, मानसी गंगा, गोविन्द कुंड, पूंछरी का लौठा, दानघाटी इत्यादि हैं जबकि गोवर्धन में सुरभि गाय, ऐरावत हाथी तथा एक शिला पर भगवान कृष्ण के चरण चिह्न हैं। इसलिए कृष्ण भक्तों के लिए इस पर्वत की परिक्रमा का महत्वत और भी अधिक बढ़ जाता है। परिक्रमा की शुरुआत दो अलग सम्प्र दायों के लोग दो अलग स्थानों से करते हैं। वैष्णवजन अपनी परिक्रमा की शुरुआत जातिपुरा से करते हैं, जबकि और अन्य् सामान्यजन मानसी गंगा से करते हैं और परिक्रमा के अन्तन पर पुन: वहीं पहुंचते हैं। पूंछरी का लौठा में दर्शन करना आवश्यक माना गया है, जो कि राजस्थापन क्षेत्र के तहत आता है और यह माना जाता है कि यहां आने से ही इस बात की पुष्टि होती है कि आपने गोवर्धन परिक्रमा की है।

gobardhanकुछ भी हो जाए, इस दिन खुश रहें :
ऐसी मान्यता है कि यदि गोवर्धन पूजा के दिन कोई व्यक्ति किसी भी कारण से दु:खी या अप्रसन्न रहता है, तो वर्ष भर दु:खी ही रहता है इसलिए कुछ भी हो जाए, इस दिन प्रसन्न रहने का ही प्रयास करें और इस दिन गोवर्धन पर्व के उत्सव को प्रसन्नतापूर्वक मनाएं, साथ ही ऐसा भी माना जाता है कि इस दिन स्नान से पूर्व पूरे शरीर में सरसों का तेल लगाकर स्नान करने से आयु व आरोग्य की प्राप्ति होती है तथा दु:ख व दरिद्रता का नाश होता है।

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