मां बगलामुखी के अंग देवता हरिद्रा गणपति

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हरिद्रा गणपति मां बगलामुखी के अंग देवता हैं, इसलिए जो साधक बगलामुखी की आराधना करते हैं, उन्हें हरिद्रा गणपति की साधना, पूजा अवश्य करनी चाहिए। इनकी साधना करने से शत्रु का हृदय द्रवित होकर साधक के वशीभूत हो जाता है। इनकी साधना अभिचारिक कर्म को भी नष्ट करने के लिए की जाती है।
यही कारण है कि मां त्रिपुरसुंदरी के द्वारा स्मरण किए जाने पर हरिद्रा गणपति ने प्रकट होकर भंडासुर दैत्य के द्वारा किए गए अभिचार यंत्र को नष्ट कर दिया था। हरिद्रा हल्दी को कहा जाता है। सभी साधक जानते हैं कि विवाह आदि जैसे मंगल कार्यों में हल्दी पाउडर के लेप का प्रयोग किया जाता है। उसका कारण यह है कि हल्दी को अति शुभ, सुख-सौभाग्य दायक एवं विघ्न विनाशक माना जाता है। इसीलिए हरिद्रा गणपति को अत्यन्त ही शुभ माना जाता है। काम्य प्रयोग में विशेष रूप से इनकी साधना मनवांछित विवाह, पुत्र प्राप्ति, मनोवांछित फल प्राप्ति एवं शत्रु को वश में करने के लिए की जाती है। इन गणपति के पूजन , हवन और भोजन में भी हल्दी का प्रयोग किया जाता है।

  • विनियोग – पहले देश-काल का उच्चारण करें फिर कहें-अस्य हरिद्रा गणनायक मंत्रस्य मदन ऋषि अनुष्टुप छंद हरिद्रागणनायको देवता ममाभीष्ट सिद्धयर्थे जपे विनियोगः।
  • ऋष्यादिन्यास- मदन ऋषये नमः शिरसि अनुष्टुप छंद से नमः मुखे हरिद्रा गण नायक देवतायै नमः विनियोगाय नमः सर्वांगे।
  • करन्यास- हूं गं ग्लौं अंगुष्ठाभ्याम् नमः,हरिद्रा गणपतये तर्जनीभ्याम् नमः वर वरद मध्यमाभ्याम् नमः,सर्वजन हृदयनम् अनामिकाभ्याम् नमः, स्तंभय- स्तंभय कनिष्ठिकाभ्याम् नमःस्वाहा, करतल कर पृष्ठाभ्याम् नमः।
  • षड्गंन्यास- हूं गं ग्लौं हृदयाय नमः हरिद्रा गणपतये शिरसे स्वाहा वर वरद शिखाये वषट् सर्वजन हृदयं कवचाय हुम स्तंभय – स्तंभय नेत्र त्रयाय वौषट स्वाहा।
  • ध्यान- पाशाकुशौ मोदक मेदकंतम् करैदर्धानं कनकासनस्थम् हरिद्र खंडम् प्रतिमम् त्रिनेत्रम् पीतांशुकं रात्रि गणेश मीडे।

ध्यान करने के बाद सर्वतोभद्रमंडल या गणेश मंडल में गणेश प्रतिमा स्थापित करने से पहले नौ पीठ शक्तियों की पूजा गंध,पुष्प अक्षत से करें। पीठ शक्ति का पूजन कर गणेश मूर्ति को पहले घी से फिर दूध से तथा जल से स्नान करवा कर सूखे कपड़े से पोंछ कर पुष्पों के आसन पर गणेश मंडल के बीच में हृम सर्वशक्ति कमलासनाय मंत्र बोल कर गणेश प्रतिमा को स्थापित कर दें। अब गणेश के मूल मंत्र का जप करें। मंत्र-ऊं गं गणपतयै नमः। चार लाख जप का पुरश्चरण होता है जप का दशांश हवन हल्दी, घी और चावलों से करें हवन का दशांश तर्पण किया जाता है और फिर ब्राह्मण भोज करवाया जाता है।

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