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Haripur में एक रहस्यमयी गुफा, जहां दिन में भी जाने से लगता है डर, नहीं देखी है तो जरूर देखें …

अनदेखी के चलते यह धरोहरें क्षेत्र के ही युवा पीड़ी की नजरों से कोसों दूर

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हरिपुर। खंडहरों को देखकर लगता है कि इमारत बुलंद रही होगी। जी हां यह बात हरिपुर में विद्यमान किले पर स्टीक बैठती है। हरिपुर किले के अंदर से चट्टानों के बीच निकाली गई गुफा जोकि बनेर नदी तक जाती है, अपने आप में ही कारीगरी का एक अद्भुत नमूना है। इस गुफा में दिन के उजाले में भी जाने से डर लगता है। यहीं नहीं यहां प्राचीन कुएं, तालाब, महल व पांडवों के समय की बावड़ी और बड़ी-बड़ी गुफाएं आकर्षण का केंद्र हैं। पर अनदेखी के चलते यह धरोहरें क्षेत्र के ही युवा पीड़ी की नजरों से कोसों दूर हैं।

कई युवाओं को तो इनके बारे में पता नहीं है। पता भी कैसे हो जब इनकी हालत की बद से बदत्तर हो चुकी है। कहने को तो यह किला पुरातत्व विभाग के अधीन है, रियासतों के बिलय के बाद शायद ही एक पाई भी इस किले पर खर्च की हो। बता दें कि हरिपुर, गुलेर रियासत की राजधानी थी। लगभग 1398 से 1405 ई. के  बीच राजा हरिचंद ने इसे बसाया था। पुराने जमाने के कुछ  विशाल भवन, कुएं, तालाब, बावड़ियां मौजूदा समय में पूर्ण रूप से  खंडित हो चुकी हैं और कुछ जो बचे हैं, वह कूड़े-कर्कट ओर झाड़ियों से भर चुके हैं। 

हिमाचल प्रदेश के निचले भाग में गाया जाने वाला गीत सेहरा तां बणेया हरिपुरे दा आज भी विवाह शादियों की रौनक बढ़ाता है। हरिपुर किले के अंदर से चट्टानों के बीच निकाली गई गुफा जोकि बनेर नदी तक जाती है, जिन्हें पर्यटन की दृष्टि से विकसित किया जा सकता है। देहरा के विधायक होशियार सिंह ने बताया कि टूरिज्म के लिहाज से यह एक ऐतिहासिक धरोहर है। यहां पर टूरिज्म विकसित करना चाहिए, जिससे सरकार को भी आय होगी और धरोहर का भी उचित रख-रखाव होता रहेगा। क्योंकि पौंग डैम नजदीक होने से पर्यटकों के लिहाज से एक ऐतिहासिक धरोहर साबित हो सकता है। जिस बारे पुरातत्व विभाग से बात की गई है और शीघ्र ही  उचित कदम उठाया जाएगा।

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