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बीमारियों से बचना है तो गिलोय का सेवन करें

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गिलोय के पत्ते पान के पत्तों की आकृति के होते हैं। आयुर्वेद में इसे अमृता कहा जाता है क्योंकि इसके जो गुण हैं वो अमृत के समान उपयोगी हैं। मानव शरीर पर गिलोय का प्रयोग अमृत के समान फलदायी होता है। परंपरागत चिकित्सा पद्धति में प्राचीन समय से ही बुखार आदि रोगों में  गिलोय का काढ़ा देने का प्रचलन रहा है। गिलोय का प्रमुख गुण होता है कि यह जिस पेड़ पर चढ़ कर फैलती है उसके सारे गुण भी अपने में गृहण कर लेती है, नीम पर चढ़ी गिलोय सर्वाधिक उपयोगी मानी जाती है। इसमें नीम के सारे गुण होते हैं साथ ही अपने गुणों के कारण यह अधिक लाभदायक हो जाती है। इसका तना मांसल होता है जिन पर लताएं  नीचे की तरफ झूलती रहती हैं। गिलोय के तने का रंग धूसर, भूरा या सफ़ेद हो सकता है। तने की मोटाई अंगुली से अंगूठे जितनी होती है , लेकिन अगर बेल अधिक पुरानी है तो यह तना भुजा के आकार का भी हो सकता है। तने का सबसे ज्यादा औषधि में उपयोग किया जाता है।

  • गिलोय में एंटी ऑक्सिडेंट गुण प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। गिलोय के सेवन से शरीर की रोगप्रतिरोधक क्षमता में विकास होता है, जिससे व्यक्ति जल्दी बीमार नहीं होता एवं लम्बे समय तक स्वस्थ रहता है।
  • गिलोय के रस का नियमित सेवन करने से शरीर के गुर्दे और जिगर स्वस्थ रहता है। नियमित सेवन करने से शरीर बीमारियों से बच सकता है। गिलोय के तने में स्टार्च मुख्य रूप से पाया जाता है, इसके अलावा इसमें तीन रवेदार द्रव्य गिलोइन , गिलोइनिन और गिलिस्टरोल पाए जाते हैं तथा साथ में ही बर्बेरिन भी कुछ मात्रा में पाया जाता है।

  • गिलोय त्रिदोष शामक औषधि है। यह सभी प्रकार के बुखार में सबसे उत्तम आयुर्वेदिक औषधि है। वायरल, सर्दी, अम्लपित्त, पीलिया, एनीमिया आदि रोगों में भी बेहतर प्रभाव डालती है। 
  • गिलोय में एंटी ऑक्सीडेंट गुण प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं । गिलोय के सेवन से शरीर की रोगप्रतिरोधक क्षमता में विकास होता है, जिससे व्यक्ति जल्दी बीमार नहीं होता एवं लम्बे समय तक स्वस्थ रहता है।
  • गिलोय के रस का नियमित सेवन करने से शरीर के गुर्दे और जिगर स्वस्थ रहता है। नियमित सेवन करने से शरीर बीमारियों से बच सकता है।
  • गिलोय के नियमित सेवन से शरीर मे खून की कमी को पूरा किया जा सकता है। जिनके शरीर में खून की कमी है वे गिलोय के रस के साथ शहद मिलाकर सुबह–शाम सेवन करें। 
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