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देवी पर्व नवरात्र में हो सभी दुर्गुणों का नाश

How to worship goddess in navratri

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भारतीय अध्यात्म में मां दुर्गा आदिशक्ति के रूप में प्रतिष्ठित हैं पुराणों में उन्हें प्रकृति, पराशक्ति, योगेश्वरी, योगमाया आदि नामों से विभूषित किया गया है। साधारण व्यक्ति के लिए इन्हें जान पाना अत्यंत दुर्गम है इसलिए इन्हें दुर्गा कहा जाता है। नवरात्र देवी पर्व है। जिस प्रकार प्रातःकाल की उपासना अधिक फलवती होती है और संध्या नाम से अभिहित की जाती है, इसी प्रकार नवरात्र का समय भी विशेष फल देने वाला होता है। मां दुर्गा की उपासना इसलिए की जाती है ताकि वे हमारी इंद्रिय चेतना में समाहित सभी दुर्गुणों को नष्ट कर दें। नवरात्र में नौ रूपों में मां की पूजा होती है। जो भी मन वाणी भक्ति एवं श्रद्धा से नौ दिन मां की पूजा अलग-अलग स्वरूपों में करता है मां उसकी समस्त विघ्न बाधाएं हर लेती हैं। मां पुण्यात्माओं के यहां लक्ष्मी रूप में निवास करती हैं और पापियों के यहां दरिद्रता के रूप में तथा सत्पुरुषों में श्रद्धा रूप में निवास करती हैं। मां दुर्गा हम सबका कल्याण करें।

एकैवाहंजगत्यत्र द्वितीया का ममापरा
नित्यैव सा जगन्मूर्तिस्तया सर्वमिदं ततम्

कोई भी साधना बिना शक्ति उपासना के नहीं पूर्ण हो सकती। स्थापना के दिन घर के सभी सदस्यों को नित्य कर्मों से निवृत हो कर स्नान कर स्वच्छ व धारण करना चाहिए। पूजन करते समय आपका मुंह पूर्व या उत्तर की ओर रहे।

नवरात्र में ऐसे करें घट स्थापना

नवरात्र में घटस्थापना का बहुत महत्व होता है। नवरात्र की शुरुआत घट स्थापना से की जाती है। घट स्थापना के लिए मिट्टी, तांबे या पीतल का कलश लें। कलश को सुंदर ढंग से हल्दी कुंकुम से स्वास्तिक आदि बना कर अलंकृत करें। उसमें जल भरें तथा गंगा जल भी डालें। कलश के मुंह पर पंचपल्लव अथवा आम की पांचपत्तियों वाली टहनी को इस तरह रखें कि पत्तियों का ऊपरी सिरा कलश के चारों तरफ दिखाई दे। पानी वाले नारियल को लाल कपड़े में लपेट कर कलश पर रखें। पवित्र स्थान से लाई गई मिट्टी में जौ मिला कर वेदी बनाएं। इसी वेदिका पर कलश को स्थापित करना है। अब कलश में वरुण देव का आह्वान करें।

सर्वे समुद्र सरिता स्तीर्थानि जलदा नदा:
आयन्तु देव पूजार्थ दुरितक्षय कारका:
गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वति
नर्मदे सिंधु कावेरी जलेस्मिन सन्निधिं कुरु

इस अवसर पर जो सप्तशती का पाठ करते हैं उन्हें एक अलग मिट्टी के पात्र में जौ बोना चाहिए। इस अंकुरित जौ को बहुत शुभ माना जाता है।

मूर्ति स्थापना-

मां की मूर्ति को लकड़ी की चौकी पर लाल या पीला व बिछा कर स्थापित करें। जल से स्नान करवाने के बाद धूप-दीप नैवेद्य से पूजा करें तथा सभी देवताओं से प्रार्थना करें कि वे आकर आपकी पूजा को सफल बनावें। अखंड ज्योति की स्थापना तभी करें जब आप इसकी सुरक्षा कर सकें। यह निरंतर नौ दिनों तक जलती रहनी चाहिए क्योंकि यह साधना की अखंडता एवं समृद्धिका प्रतीक है।

आसन – साधना करने वाले का आसन लाल अथवा सफेद होना चाहिए।
बलि विधान- घट स्थापना के दिन,अष्टमी तथा नवमी को कच्चे नारियल की बलि दें।
नवरात्र पाठ – इसके तहत आप किसी दुर्गा मंत्र का अथवा सप्तशती का पाठ कर सकते हैं। जप की संख्या प्रति दिन एक ही जैसी होनी चाहिए।
हवन – मंत्र जप की संख्या का दशांश हवन किया जाता है आम की लकड़ी से अग्नि प्रज्ज्वलित कर इसमें लाल चंदन का चूरा, कमल के बीज, शहद, सरसों तथा हवन सामग्री से हवन करें। नैवेद्य रूप में हवन समाप्ति पर गाढ़ी खीर भी अग्नि में समर्पित करें।

  • इस समय अपनी कुल देवी की भी प्रतिेदिन पूजा करें और उन्हें भी प्रसाद अर्पण करें।
  • नवरात्र समाप्ति के बाद समस्त पूजन सामग्री हवन की भस्म आदि नदी या जलाशय में विसर्जित करें।
  • नवरात्र की इस उपासना में जो घट स्थापित किया जाता है वह मिट्टी का होता है। तात्विक विचार से पृथ्वी के अधिपति शिव हैं,
  • कलश में जो जल भरा जाता है, तो जल तत्व के अधिष्ठाता भगवान गणेश हैं। कलश पर दीप प्रज्ज्वलित किया जाता है उस अग्नि
  • तत्व की अधिष्ठात्री भवानी शक्ति हैं। कलश के ऊपर जल रही ज्योति जगदंबा की प्रतीक ही नहीं प्रतिनिधि भी है इसीलिए नवरात्रि में अखंड ज्योति जलाई जाती है ताकि इस महापर्व के पूरे समय में देवी का घर में निवास बना रहे। इस संदर्भ में कुछ बातों का ध्यान रखना अपेक्षित है।
  • नवरात्रि में प्रात :-सायं विधि-विधान से पूजा करना आवश्यक है। प्रतिमा के सामने गाय के घी का दीपक जलाए रखना कृपादायक होता है।
  • प्रतिमा का मुख उत्तर की ओर न रखें नहीं तो आपका मुख दक्षिण की तरफ हो जाएगा, यह अशुभ फल उत्पन्न करता है।
    देवी-देवताओं को रोली या चंदन अनामिका अंगुली से ही लगाएं।
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