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धरती कैसे संभालेगी इतनी आबादी का बोझ

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किसी भी देश के विकास की पहचान उसकी जनसंख्या से होती है और यह भी सही है कि एक देश को आगे बढ़ाने और पीछे ले जाने में वहां की जनता का ही हाथ होता है, पर लगातार बढ़ती जनसंख्या का मुद्दा बड़ा है। दुनिया की कुल आबादी की आधे से ज्यादा तो एशियाई देशों में रहती है जिसमें से 18 फीसदी भारत में है और भारत के पास विश्व का सिर्फ 2.4 फीसदी क्षेत्रफल है। अनुमान तो यही है कि आबादी के मामले में अगले सात साल में भारत चीन से भी आगे निकल जाएगा। अब सोचना यह है कि धरती इतना बोझ कैसे संभालेगी। हालांकि भारत के साथ कई देश ऐसे हैं जो जनसंख्या विस्फोट की स्थिति से गुजर रहे हैं।

विश्व के सामने यह एक बड़ी समस्या है कि ग्लोबल वार्मिंग, असंतुलित होता मौसम और बढ़ती जनसंख्या विकास के लिए चुनौती बनते जा रहे हैं। कायदे से किसी भी देश की अनुकूलतम जनसंख्या उतनी ही होनी चाहिए जिसके समुचित भरणपोषण के साधन वहां उपलब्ध हो सकें अन्यथा बेरोजगारी, आर्थिक विषमता, भुखमरी, कुपोषण बीमारी निरक्षरता और अपराध जैसी समस्याएं तो उत्पन्न होंगी ही। जनसंख्या घनत्व से उत्पन्न स्थिति की गंभीरता को 1987 के दौरान ही समझ लिया गया था इसलिए उसी साल 11 जुलाई को लोगों के हित को ध्यान में रखते हुए इस समस्या पर विचार करने के लिए दिन रखा गया।

उस समय तक वैश्विक जनसंख्या 5 अरब के आसपास हो गई थी। इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य सामुदायिक लोगों के जननीय स्वास्थ्य समस्याओं पर ध्यान देना था। तब से लगातार इस आयोजन को चलाया जा रहा है। हमारे सामने इस समय जाने कितनी चुनौतियां हैं। कम खनिज कम उत्पाद, पर्यावरण, आंतरिक-बाहरी कलह और अशांति। इसी के साथ दूसरी समस्याएं भी हैं। मसलन गरीबी, बेरोजगारी और प्रदूषण साथ-साथ आए हैं। इसके बावजूद जनसंख्या वृद्धि पर हम किसी भी तरह रोक नहीं लगा पाए।
जागरुकता फैलाने के लिए अंतरराष्ट्रीय तौर पर कई तरह के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं और उनमें लिंग समानता, गरीबी मातृ स्वास्थ्य और मानवाधिकार समेत परिवार नियोजन के महत्व को भी समझाया जाता है सेमिनार चर्चा, शैक्षिक प्रतियोगिता, निबंध लेखन, पोस्टर वितरण भी इसमें शामिल है जिसे विभिन्न स्वास्थ्य संगठन और जनसंख्या विभाग एक साथ करते हैं पर यह करना इतना आसान भी नहीं है। बढ़ती आबादी खतरे के बिंदु को पार कर चुनौती बनती जा रही है। इसके खतरे से हर व्यक्ति को आगाह करना जरूरी है। लोग जनसंख्या दिवस पर भाषण सुन लेते हैं और घर जाकर भूल जाते हैं। इस तरह कुछ भी नहीं संभलने वाला इस बात को हर आदमी को समझना होगा और यह सबकी जिम्मेदारी भी है।

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