विश्व राजनीति के क्षितिज पर प्रभाव छोड़ गईं इंदिरा गांधी

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वह 31 अक्टूबर, 1984 का दिन था जब इंदिरा गांधी की हत्या की गई, वह भी उनके ही अंरक्षकों के द्वारा। यह एक विरोधाभास ही था कि जिनके ऊपर उनकी रक्षा का दायित्व था वही उनके हत्यारे थे। इस घटना से समस्त विश्व एकबारगी स्तब्ध रह गया था।

इंदिरा गांधी का जन्म 19 नवंबर, 1917 को हुआ था उन्होंने अपनी शिक्षा शांति निकेतन से पूरी की। गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर ने उन्हें प्रियदर्शिनी नाम दिया था। वे पं. नेहरू के साथ 1950 में एक निजी सहायक के रूप में रहीं। उनकी नियुक्ति 1964 में राज्यसभा सदस्य के रूप में हुई। फिर वे लालबहादुर शास्त्री के मंत्रिमंडल में सूचना प्रसारण मंत्री बनीं। लाल बहादुर शास्त्री के आकस्मिक निधन के बाद वे प्रधानमंत्री बनीं। इंदिरा गांधी को आधुनिकता को बढ़ावा देने वाली प्रगतिशील महिला कहा जाता है। अपने साहसी निर्णयों की वजह से उन्हें ऑयरन लेडी की संज्ञा मिली। यही नहीं वे महात्मा गांधी के बाद सबसे मशहूर भारतीय मानी जाती हैं। वे कोई संत नहीं थीं और न ही युग निर्माता पर देश की शान और मान को जिस तरह उन्होंने बढ़ाया उसे हिंदुस्तानी कभी नहीं भूल पाएंगे।

1971 में तीसरा भारत-पाक युद्ध हुआ जिसके नतीजे ने इस उपमहाद्वीप का इतिहास ही नहीं भूगोल भी बदल कर रख दिया। दुनिया के नक्शे पर एक नया राष्ट्र उभरा बांग्लादेश। इस नए देश ने उस सिद्धांत की धज्जियां उड़ा दीं, जिसके तहत जिन्ना ने हिंदू और मुसलमानों को लेकर भारत विभाजन को अनिवार्य बताया था। इस कारनामे के पीछे थीं इंदिरा गांधी। अमेरिकी धमकी की बिना परवाह किए उन्होंने मुक्तिवाहिनी की मदद का फैसला किया और इतिहास रच दिया। भारत ने बांग्लादेश को मुक्त करने की कार्रवाई जिस तेजी से की, उसे देखकर दुनिया दंग रह गई। पाकिस्तानी सेना के 93 हजार युद्ध बंदी पूरी दुनिया में भारतीय शक्ति की गवाही दे रहे थे।

प्रधानमंत्री के तौर पर उनका कार्यकाल शानदार था परंतु 1975 में उनके द्वारा लगाई गई इमरजेंसी ने उनकी सारी उपलब्धियों की चमक फीकी कर दी। और नतीजा था कि आजादी के बाद 1977 में पहली बार कांग्रेस को चुनावों में भारी शिकस्त मिली। कहते हैं न वक्त हमेशा एक सा नहीं रहता। वह आपको ठोकरें देता है तो अवसर भी देता है। सिर्फ ढाई साल बाद इंदिरा ने एक बार फिर बहुमत का दिल जीत लिया। इस चुनाव में कांग्रेस को 351 सीटें मिलीं। कठोर निर्णय लेने में इंदिरा कभी भी नहीं हिचकिचाती थीं। 1984 में किया गया ऑपरेशन ब्लूस्टार उसका प्रत्यक्ष उदाहरण है।

हालांकि अपने आसपास के बदलते वातावरण से वे अनभिज्ञ नहीं थीं उन्हें अपनी मौत का आभास था और इसका जिक्र उन्होंने अपने उड़ीसा के भाषण में किया था। 31 अक्टूबर की सुबह उनके सरकारी आवास पर उनके ही अंगरक्षकों ने उन्हें गोलियों से भून दिया। उस निहत्थी औरत पर 32 गोलियां दागी गईं। किसी के सामने न झुकने वाली इंदिरा ने मौत से हार मान ली। उनकी चिता जहां जली थी वह अब शक्ति स्थल कहा जाता है वह भारत की अकेली ऐसी शक्ति थीं जिन्हें भुलाया नहीं जा सकता।

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