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अधूरेपन के कारण लोकप्रिय हुआ कालीदास का कुमारसंभव 

Kalidas kumarsambhav popular due to incompleteness

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कुमारसंभव महाकवि कालिदास की रचनाओं में एक अधूरा महाकाव्य है जो विशेष परिस्थितियों के चलते पूरा नहीं हो सका पर यह अपने अधूरेपन के कारण ही ज्यादा लोकप्रिय हो गया। यह भगवान शिव-पार्वती के पुत्र कुमार कार्तिकेय के जन्म से संबंधित महाकाव्य है जिसकी गणना पंच महाकाव्यों में की जाती है। इसके अधूरे रह जाने का कारण बड़ा अस्वाभाविक सा है। कालिदास ने इस काव्य में उमा-महेश्वर के एकांतिक मिलन के क्षणों का अत्यंत श्रृंगारिक वर्णन किया था इसलिए देवी पार्वती ने उन्हें श्राप दे दिया तथा कहा कि तुम्हारा यह काव्य अधूरा ही रहेगा। परिणाम स्वरूप कालिदास को कुष्ठ रोग हो गया और वे इसे पूर्ण न कर सके।
यह काव्य देवी पार्वती के जन्म से लेकर उनके बड़े होने, उनका विवाह होने तथा कुमार के जन्म की पूर्व सूचना के साथ ही समाप्त हो जाता है। हालांकि यह 17 सर्गों में प्राप्त है पर विद्वानों के अनुसार सिर्फ आठ सर्ग तक ही महाकवि का लिखा हुआ है बाकी के सर्ग किसी अन्य ने लिखे हैं। इसमें पार्वती के अन्यान्य रूप वर्णित हैं। बाला पार्वती ,तपस्विनी पार्वती, विनम्र पार्वती और प्रगल्भा पार्वती। आठवें सर्ग में शिव और पार्वती के दाम्पत्योचित काम- क्रीड़ाओं का वर्णन है। विवाह के बाद शिव एक मास तक ससुराल में ही रहे।
इसके बाद उन्होंने मेरु, मंदर, कैलाश, मलय, नंदनवन, गंधमादन आदि स्थानों पर विहारावास किया। कुमार संभव की विलक्षणता है प्रणय की गंभीर गहनता… जो सामान्य होने पर भी सामान्य नहीं है अपितु यह युग-युग तक विशुद्ध पवित्रता और मंगल के प्रतीक रूप में स्थायी रहती है। कवि रबींद्रनाथ टैगोर के शब्दों में- कालिदास ने अनाहूत प्रेम के उस उन्मत्त सौंदर्य की उपेक्षा नहीं की है। इसी उज्ज्वलता में उन्होंने यह काव्य समाप्त नहीं किया। कुमारसंभव के सारे प्रेम का वेग मंगल मिलन में समाप्त हुआ है। 

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