किंटूर में है पांडवों का लगाया कल्पवृक्ष

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कल्पवृक्ष देवलोक का वृक्ष है। पुराणों के अनुसार समुद्रमंथन से प्राप्त 14 रत्नों में कल्पवृक्ष भी था। समुद्र मंथन से प्राप्त यह वृक्ष देवराज इन्द्र को दे दिया गया था और इन्द्र ने इसकी स्थापना ‘सुरकानन वन’ में कर दी थी। हिंदुओं का विश्वास है कि कल्पवृक्ष से जिस वस्तु की भी याचना की जाए, वही यह दे देता है। इसका नाश कल्पांत तक नहीं होता।

इस वृक्ष में अपार सकारात्मक ऊर्जा होती है। यूपी के बाराबंकी जिला मुख्यालय से 38 किलोमीटर कि दूरी पर किंटूर गांव है। मान्यता है कि इस जगह का नामकरण पांडवों की माता कुंती के नाम पर हुआ है। यहां पर पांडवों ने मां कुंती के साथ अपना अज्ञातवास बिताया था। इसी किंटूर गांव में भारत का एकमात्र पारिजात का पेड़ पाया जाता है। कहते हैं कि इस वृक्ष को छूने मात्र से सारी थकान मिट जाती है। यह काफी बड़ा है। इसका तना काफी मोटा है। इसको देखने दूर-दूर से लोग आते हैं। पुराणों में इसे देव वृक्ष भी कहा गया है।

किंवदंती है कि इसे स्वर्ग से लाकर यहां लगाया गया था।इस वृक्ष की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह अपनी तरह का इकलौता वृक्ष है, क्योंकि इस वृक्ष पर बीज नहीं लगते तथा इस वृक्ष की कलम बोने से भी दूसरा वृक्ष तैयार नहीं होता। कल्पवृक्ष के फूल केवल रात को खिलते हैं और सुबह होते ही मुरझा जाते हैं। इन फूलों का लक्ष्मी पूजन में विशेष महत्व है पर कल्पवृक्ष वृक्ष के वे ही फूल पूजा में काम लिए जाते हैं जो वृक्ष से टूटकर गिर जाते हैं, वृक्ष से फूल तोड़ने और छूने की मनाही है।अगस्त में इस वृक्ष में सफेद फूल आते हैं जो सूखने के बाद सुनहरे रंग में बदल जाते हैं।

इस वृक्ष से दो किलोमीटर दूर कुन्तेश्वर महादेव मंदिर है। कहा जाता है कि जब पांडवों ने किंटूर में अज्ञातवास किया तो उन्होंने वहां अपनी मां कुंती के लिए भगवान शिव के एक मंदिर की स्थापना की जो कि अब कुन्तेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध है। किंवदंती है कि माता कुन्ती कल्पवृक्ष (पारिजात) के पुष्पों से भगवान शंकर की पूजा अर्चना कर सकें इसलिए पांडवों ने सत्यभामा की वाटिका से वृक्ष को लाकर यहां स्थापित कर दिया था और तभी से यह वृक्ष यहां पर है। पद्मपुराण के अनुसार परिजात ही कल्पवृक्ष है। यह वृक्ष उत्तरप्रदेश के बाराबंकी में आज भी विद्यमान है। कार्बन डेटिंग से वैज्ञानिकों ने इसकी उम्र 5,000 वर्ष से भी अधिक की बताई है।

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