किराड़ू का मंदिरः श्राप ने पूरे गांव को बना दिया पत्थर

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किराड़ू पांच मंदिरों का एक समूह है जो राजस्थान के बाड़मेर से 39 किलोमीटर की दूरी पर हाथमा गांव में स्थित है । 1161 के एक शिलालेख से पता चलता है की हाथमा को पहले किरतकूप के नाम से भी जाना जाता था जो पहले पनवारा वंश की राजधानी भी थी। इनमें एक मंदिर भगवान विष्णु का है और बाकी सभी भगवान शिव के मंदिर हैं। इतिहासकारों के मुताबिक इसका निर्माण परमार वंश के राजा दुलशालराज और उनके वंशजों ने किया था। परमार राजा सोमेश्वर के समय किराड़ का वैभव ऊंचाइयों पर पहुंच गया और आस-पास के लोगों को खटकने लगा। इतिहास कहता है कि तेरहवीं चौदहवीं शताब्दी में तुर्क लुटेरों ने इस पूरे क्षेत्र को बर्बर तरीके से लूटाऔर तबाह किया। यहां तक तो ठीक था पर इसके साथ एक और कहानी पीढ़ी दर पीढ़ी चलती आई। एक ऐसे श्राप की कहानी जिसने इस पूरे क्षेत्र को वीरान बना दिया। कहते हैं बारहवीं शताब्दी के आस-पास एक ऋषि अपने शिष्यों के साथ यहां आए। शिष्य तो यहीं रुक गए पर ऋषि आगे भ्रमण के लिए आगे निकल गए। कुछ समय बाद यहां एक भयंकर बीमारी का प्रकोप हुआ गांव वालों ने शिष्यों की कोई देखभाल नहीं की बस गांव की एक निर्धन बूढ़ी औरत जितना कर सकती थी करती रही।ऋषि वापस लौटे तो शिष्यों की दशा देख कर उन्हें क्षेत्रवासियों पर अत्यंत क्रोध आया । उन्होंने कहा मेरे शिष्यों की यह दशा देख कर भी तुम लोग पत्थर बने रहे… जाओ तुम सबलोग पत्थर बन जाओ। उन्होंने उस बूढ़ी औरत से भी सूर्यास्त से पहले वह जगह छोड़ने की सलाह दी और कहा कि नहीं तो वह भी पत्थर बन जाएगी। वह अपने घर की ओर भागी सामान लेकर निकलते समय मोहवश उसने घर को मुड़कर देखा और वहीं पत्थर बन गई। पास के सिंहणी गांव में आज भी उसकी पत्थर की मूर्ति है। इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि शाम के बाद जो भी यहां रुकता है वो पत्थर बन जाता है और उसकी मौत हो जाती है। माना जाता है कि इस श्राप के चलते पूरा गांव आज पत्थर का बना हुआ है। जो जैसा काम कर रहा था, वह तुरंत ही पत्थर का बन गया।

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