वृंदावन में भगवान कृष्ण का महारास

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शरद पूर्णिमा से वृंदावन के निधिवन का नाम भी गहराई से जुड़ा है। कहते हैं भगवान कृष्ण ने यहीं महारास किया था और पूरी पृथ्वी को प्रेममय बना दिया था। जहां तक निधिवन की बात है तो यह अत्यंत आध्यात्मिक,घोर रहस्यमय तथा प्रेम से परिपूर्ण स्थान है। जाने कितनी रोचक और रहस्यमय कहानियां इससे जुड़ी हैं । कहने को निधिवन जंगल है पर यह भी विशेष है क्योंकि यहां के सारे पेड़ एक दूसरे से आलिंगनबद्ध दिखाई देते हैं। कहा यही जाता है कि ये पेड़ नहीं बल्कि बांकेबिहारी के भक्त हैं। यह सारा वन तुलसी के पौधों से आच्छादित है।

यह महान संगीतज्ञ स्वामी हरिदास की साधना स्थली भी रही है। वह यहां कुटी बना कर रहते थे। उनके भक्ति गायन से प्रसन्न होकर भगवान कृष्ण ने उन्हें स्वप्न में दर्शन दिए थे और उनके आग्रह पर वहीं अपने आपको प्रकट भी किया था। निधिवन में बना मंदिर अत्यंत सुंदर है इसमें राधा कृष्ण की मूर्तियां स्थापित हैं। पास में ही एक गुप्त कुंज भी है । धारणा है कि यहां प्रतिदिन राधा और कृष्ण रास लीला करने के बाद इसी कुंज में विश्राम करते हैं। सायंकाल की आरती के बाद मंदिर के दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं और यह स्थान निर्जन हो जाता है। तब यहां मनुष्य तो क्या पशु-पक्षी भी नहीं रहते। मंदिर के अंदर रोज बिस्तर लगाया जाता है , चौकी पर पवित्र जल से भरा पात्र और दातुन रखी जाती है। साथ ही भोग के लिए लड्डू भी रखे जाते हैं । सुबह ये सारी चीजें इस्तेमाल की हुई होती हैं। आज के दौर में ये सारी गतिविधियां रहस्यमय ही हैं।

खीर खुले आसमान में रखने का विधान

शरद पूर्णिमा की चांदनी रात में 10 से मध्यरात्रि 12 बजे के बीच कम वस्त्रों में घूमने वाले व्यक्ति को ऊर्जा प्राप्त होती है। सोमचक्र, नक्षत्रीय चक्र और आश्विन के त्रिकोण के कारण शरद ऋतु से ऊर्जा का संग्रह होता है और बसंत में निग्रह होता है। अध्ययन के अनुसार दुग्ध में लैक्टिक अम्ल और अमृत तत्व होता है। यह तत्व किरणों से अधिक मात्रा में शक्ति का शोषण करता है। चावल में स्टार्च होने के कारण यह प्रक्रिया और आसान हो जाती है। इसी कारण ऋषि-मुनियों ने शरद पूर्णिमा की रात्रि में खीर खुले आसमान में रखने का विधान किया है। यह परंपरा विज्ञान पर आधारित है।

शोध के अनुसार खीर को चांदी के पात्र में बनाना चाहिए। चांदी में प्रतिरोधकता अधिक होती है। इससे विषाणु दूर रहते हैं। हल्दी का उपयोग निषिद्ध है। प्रत्येक व्यक्ति को कम से कम 30 मिनट तक शरद पूर्णिमा का स्नान करना चाहिए। रात्रि 10 से 12 बजे तक का समय उपयुक्त रहता है। वर्ष में एक बार शरद पूर्णिमा की रात दमा रोगियों के लिए वरदान बनकर आती है। इस रात्रि में दिव्य औषधि को खीर में मिलाकर उसे चांदनी रात में रखकर प्रात: 4 बजे सेवन किया जाता है। रोगी को रात्रि जागरण करना पड़ता है और औ‍षधि सेवन के पश्चात 2-3 किमी पैदल चलना लाभदायक रहता है।

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