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शुक्रतारा

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मानिंद्र ने बस से उतरकर देखा तो हैरान रह गया। दूर तक पहाड़, पेड़ सभी सफेद बर्फ से सिर से पांव तक ढक चुके थे। सड़क का तो पता ही नहीं चल रहा था। मना किया था यतींद्र ने पर उसने दोस्त का कहना नहीं माना था। उसने कहा था कि वह यहां एक महीने की छुट्टी पर आया था और उस दौरान वह साधारण टूरिस्ट की तरह ही घूमना चाहता था। सुबह ही बस में वह कांगड़ा चला आया। सारा दिन वह कांगड़ा फोर्ट में घूमता रहा। एकदम खंडहर बन गए किले की दीवारें, टूटकर धराशायी हुए सुंदर स्तंभ और नीचे खाई में सिर पटकते पानी का हाहाकार। अजीब सा सन्नाटा था। यहां सबसे ऊपर की छत पर खड़ा वह डूबते सूरज को देखता रहा…हल्की गुलाबी तपिश उसके चेहरे को रंग गई थी। सूरज के ढलते ही अचानक उसे गहरे अकेलेपन का एहसास हुआ और वह घबराकर किले से बाहर निकल आया। दूसरी सुबह वह बस में वापसी के लिए चला … पर ड्राइवर ने एक छोटे स्टॉप पर लाकर सबको उतार दिया। कहा – बस आगे नहीं जाएगी बर्फ गिर गई है।
मानिंद्र स्टॉप पर खड़ा देख रहा था … चारों तरफ बस बर्फ थी। सारे रास्ते कहीं खो गए से लगते थे। लोग बस से उतर कर भी रुके नहीं थे और बर्फ में ही आगे बढ़ते जा रहे थे। मानिंद्र ने भी अपना बैग उठाया और उनके साथ हो लिया। लगभग तीन किलोमीटर का सफर तय करने के बाद उसने पाया कि उसके साथ दो-चार लोग ही रह गए थे। आसमान साफ था …चांद की रोशनी बर्फ पर फिसल रही थी।

sunsetमानिंद्र के पैर एकदम ठंडे हो चुके थे और आंखें नींद से भारी थी। वह इस हिस्से से एकदम अपरिचित था…धीरे-धीरे वह उस चढ़ाई पर चढ़ने लगा जहां चाय वाले ने बताया था कि एक रेस्टहाउस है। रेस्टहाउस के बाहर तीन गाड़ियां खड़ी थीं पूरी तरह बर्फ से ढकी हुई। उसने जोर से दस्तक दी। खिड़की खोलकर चौकीदार ने सिर बाहर निकाला।
-जगह नहीं है…।
-दरवाजा खोल दो, हम भी थके हुए मुसाफिर हैं।
-कह जो दिया कि जगह नहीं है।
-सुनो, अब अगर तुमने दरवाजा नहीं खोला, तो कल तुम यहां काम करते नजर नहीं आओगे … मानिंद्र का पारा चढ़ गया।
अचानक दरवाजा खुला और हाथों में लैंप लिए एक लड़की को देख वह हतप्रभ रह गया। उसने कढ़ा हुआ कशमीरी गाउन पहना हुआ था…कानों में भारी ईयररिंग्स थे और उसने सिर पर पहाड़ी लड़कियों की तरह रुमाल बांध रखा था। हाथों में लिए लैंप का प्रकाश उसकी नींद से बोझिल आंखों पर पड़ रहा था।
-कम इन जेंटलमैन …उसने मधुर स्वर में कहा और उसके हाथ से बैग ले लिया।
जाने क्यों मानिंद्र के मन में एक ख्याल कौंध गया- लेडी विद द लैंप।
मानिंद्र ने जब तक कपड़े बदले, वह चाय लेकर आ गई। केतली से उठती भाप देख कर उसे बड़ी राहत सी महसूस हुई… एक सुखद सा एहसास। इस बर्फबारी के मौसम में अनजाने रेस्टहाउस में घर जैसा स्नेहमय स्वागत।
-मैं सुनंदा वर्मन, उसने चाय का प्याला उसके हाथों में थमाते हुए कहा। मैं धर्मशाला इंटरव्यू देने गई थी, लौटी तो बर्फबारी देख कर यहीं रुक गई और आप…?
-मैं कैप्टन मानिंद्र जयधर … यहां घूमने आया था। बारिश की तो सोच सकता था, पर बर्फ गिर जाएगी ऐसा नहीं सोचा था।
-इस हालत में फंसना जरूरी था क्या … ? हेडक्वार्टर फोन कर लिया होता, कोई भी आकर ले जाता।
-जाने क्यों मैं कुछ दिन एक साधारण आदमी की तरह जीकर देखना चाहता था… मानिंद्र का चेहरा लाल हो गया।
-क्या बचपना है … सुनंदा ने कहा और हंस दी।
जलती हुई आग बुझ गई थी पर कमरा गर्म था। बंद खिड़की के शीशे से बाहर बिखरी चांदनी पर अभी भी बर्फ रुई के फाहे की तरह गिर रही थी।
-आपको नींद नहीं आ रही … मानिंद्र ने पूछा।
-नहीं मुझे चांदनी में गिरती बर्फ अच्छी लगती है।
-मैं तो सोना चाहूंगा उसने कहा और मुंह तक कंबल खींचकर आंखें बंद कर लीं।
सुबह उसकी आंख खुली तो धूपcouple2 निखर आई थी।… एक और कंबल उसके ऊपर था। साइड टेबल पर शीशे के ग्लास से दबा एक नन्हा सा कागज रखा था। उसने उठाया, लिखा था – ब्रेकफास्ट करके जाना, पेमेंट करने की जरूरत नहीं, मैंने कर दिया है… नंदा।
मानिंद्र कुछ देर तक कागज हाथ में थामे रह गया। कौन थी यह नंदा … स्वर्ग से उतरी परी की तरह…। वह अपना कंबल भी उसके ऊपर डाल गई थी और उसने उसका पता तक नहीं पूछा था।
वापस लौटा तो यतींद्र ने खूब मजाक बनाया।
-कहिए कैप्टन साहब घूम लिए साधारण टूरिस्ट बनकर…? मानिंद्र झेंप कर रह गया।
जाने क्यों मानिंद्र अंदर से दुख सा गया था। वह और यतींद्र लॉन में बैठे बातें करते होते और उसका चेहरा मुरझा जाता। एक रात उसने यतींद्र को सोते से जगा दिया।
-यतींद्र सुनो कोई गा रहा है।
-हां तो क्या हुआ….यतींद्र आंखें मलते उठ बैठा।
-पर इस गीत में इतनी तड़प क्यों है…?
-पहाड़ी गीत ऐसे ही होते हैं। वियोग और दुःख के, इनमें तड़प और मिठास ऐसी ही होती है…पर तू अपनी नींद क्यों खो बैठा है जय ? यतींद्र ने उसे जबरदस्ती सुला दिया।
नींद मानिंद्र की आंखों से कोसों दूर थी। गीत की भाषा उसकी समझ से परे थी, पर उसकी तड़प उसके दिल में उतरती जा रही थी।
सप्ताह की आखिरी शाम वह एक पुराना मंदिर देखने गया। मंदिर के बाहर पीपल का पेड़ था…और डूबती शाम की गहराइयों में फैला हुआ सन्नाटा था। बस बसेरा लेते पंछियों की आवाजें और पास बहती रावी की तेज लहरों का शोर। दूर बसे गांव के घरों से उठता नीला धुआं आसमान में फैल रहा था। मंदिर के अंदर कोई पूजा कर रहा था। पूजा करने वाली आकृति पलट कर खड़ी हुई तो गर्भगृह में जलते दीपक की रोशनी में उसका चेहरा चमक उठा। मानिंद्र चौंक गया वही बड़ी-बड़ी आयत आंखें…उन आंखों में जैसे असंख्य सपने मचल रहे थे।
-आप नंदा…? उसके मुंह से निकल गया।
-हां मैं तो यहीं रहती हूं … ठीक उसी शुक्रतारे के नीचे, उसने पश्चिम के आकाश में चमकते तेज सितारे की ओर अंगुली उठाकर कहा पर आपको मेरा नाम कैसे याद रह गया।
मानिंद्र ने कहा कुछ नहीं, बस जेcouple4ब से निकाल कर वही स्लिप नंदा की ओर बढ़ा दी। यह वही स्लिप थी जो नंदा उस दिन रेस्टहाउस में उसकी साइडटेबल पर रख आई थी। वह क्षण भर के लिए चकित सी उसे देखती रह गई।
-आइए, पास ही मेरा घर है…पापा आपसे मिलकर बेहद खुश होंगे। कहकर वह सीढ़ियां उतरने लगी। मानिंद्र सम्मोहित सा उसके पीठे चल पड़ा। कैसी थी यह लड़की जो सुंदर थी स्नेहमयी थी और बातें सपनों की भाषा में करती थी।
उस रात वह देर तक नंदा के पापा से बातें करता रहा। वे रिटायर्ड फॉरेस्ट ऑफिसर थे और बड़े सलीके से बातें करते थे। खाना खाने के बाद जब वह चलने लगा तो नंदा उसे गेट तक छोड़ने आई।

-आप अपने बारे में कुछ बताएंगे… गेट के पास रुक कर उसने धीमे से कहा।
-क्यों नहीं, आगरे का रहने वाला हूं। छोटा था तभी पापा ट्रेन एक्सीडेंट में मारे गए। मां बेकसूर थी, पर उसे चरित्रहीन बताकर घर से निकाल दिया गया। अब कहां है मैं नहीं जानता … पता नहीं जिंदा भी है या नहीं.. कहते-कहते वह चुप हो गया जैसे आगे कुछ कहने को शब्द न मिल रहे हों।
-कहना जरूरी था यह सब…? नंदा की आवाज में पीड़ा थी।
-मुझसे झूठ नहीं बोला गया। वह उसकी ओर देख कर फीकी हंसी हंस दिया।
-नंदा मुझसे फिर मिलना चाहोगी…?
-क्यों नहीं, मैं किसी से भी मिलूं, दोस्ती करूं, पापा कुछ नहीं कहते और मां तो बिल्कुल नहीं वह बहुत अच्छी हैं।
-पर अगर मैं प्यार करना चाहूं…शादी करना चाहूं…।
-यह क्या बचपना है…कोई भी फैसला इतनी जल्दी…?
-सच यह है कि मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता। अपने मम्मी-पापा से पूछ लो, अगर उन्हें यह यतीम कुबूल हो तो…।
-दुबारा ऐसा न कहना। पहली बार नंदा ने उसे ध्यान से देखा…ब्राउन आंखें …छह फुट से भी निकलता हुआ कद होंठों की उदास मुस्कुराहट जैसे वहीं स्थिर होकर रह गई थी…जैसे किसी ग्रीक देवता की मूर्ति हो। नंदा ने चुपचाप हां में सिर हिला दिया।
नंदा के पिता ने फिर देर नहीं की। एक हफ्ते बाद ही दोनों का विवाह पहाड़ी रीति-रिवाजों के साथ संपन्न हो गया। यतींद्र ने बड़े भाई की तरह सारी जिम्मेदारियां निभाईं।
couple3नंदा को पाकर मानिंद्र बेहद खुश था। वह किसी बात के लिए मना कर देती तो उदास हो जाता। कभी खिलंदड़ेपन पर आता तो नंदा को छेड़-छेड़ कर तंग कर देता…और एकांतिक क्षणों में उसका रूप कुछ और ही होता। मौसम की तरह पल-पल बदलते उसके स्वभाव को देख नंदा बेहद हैरान थी। एक रात वह चुपचाप बाहर निकल आया और और धुंध में खोया आसमान की ओर देखता रहा। नंदा ने उसके कंधों पर गर्म शाल लाकर डाल दी।
-ऐसे ही निकल आए ठंड लग गई तो…?
-जानती हो नंदा …जब बचपन में मैं बहुत उदास होता था तो सोचा करता था, कहीं दूर आकाश से कोई परी आए और मुझे उठा ले जाए।
-फिर …नंदा हंस दी।
-वह परी आई एक दिन…।
– चल बुद्धू … वह खिलखिलाकर हंस दी।
-नहीं यह उतना ही सच है जितना कि तुम्हारा शुक्रतारा जो विश्व के किसी भी कोने में खड़े रहो दिखाई देता है। वह आई थी नंदा और मेरा सारा अकेलापन तोड़ गई। मैं जन्म-जन्म से अभिशापित…। आज शुक्रगुजार हूं मैं उसका…अपने साथ हुए सारे जुल्मों के लिए जिंदगी को मैंने मुआफ़ किया … उसकी आवाज कांप गई। अपनी बाहों में नंदा को लिए वह एक टक नंदा को देखे जा रहा था।
-तुम मेरा शुक्रतारा …नंदा ने हौले से उसके कंधे सिर रख दिया।
शायद जिंदगी में मानिंद्र पहली बार संतोष से हंस दिया।

 – प्रिया

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