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तंत्र साधना के लिए शुभ है शिवरात्रि

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साधना के लिए सर्वोत्तम समय रात्रि का ही माना गया है। इस प्रकार की मान्यता है कि सभी प्रकार की साधनाएं रात में संचालित करने से शीघ्र फल प्राप्ति होती है। अनुभव में भी यही देखने में आता है कि यंत्र-मंत्र-तंत्र की सिद्धियां निशा काल में सफल रूप से प्राप्त की जा सकती हैं। रात जितनी गहरी होती जाती है, उतनी ही साधना क्रियाएं भी गहरी होती हैं।
आखिरकार रात्रि में ही तंत्र-यंत्र-मंत्र साधनाएं क्यों सफलीभूत होती हैं? वास्तव में तीन प्रकार के गुण होते हैं: तम, रज एवं सत्। रात्रि को तमोगुण संपन्न माना जाता है। निशाकाल में सत् व रज वृत्तियां सबसे कम प्रभावी होती हैं एवं तम वृत्ति पूर्ण प्रभावी होती है। इसलिए वाममार्गी साधनाओं के लिए ये सर्वोत्तम काल होता है। दो प्रकार की तंत्र साधनाओं में दक्षिणपंथी साधना पूर्णतया दैविक साधना है, जिसके लिए दिन का समय अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है किंतु वाममार्गी साधना रात्रिकाल में ही सिद्ध हो सकती है।
साधक पृथ्वी के किसी भी हिस्से में मौज़ूद हो, यदि वहां रात्रि का प्रहर आरम्भ हो तो ऐसे में वहां सूर्य की प्रभा रश्मियां न्यूनतम हो जाती हैं। रात्रि के दूसरे और तीसरे प्रहर में ये अधिकाधिक क्षीण हो जाती हैं। इसी समय सौर व नक्षत्र मंडल के अन्य ग्रहों तथा तारों का पृथ्वी पर प्रभाव अधिकतम हो जाता है। साधना क्रियाओं में चंद्र रश्मियों की विशेष महत्ता है। चन्द्रमा मन का स्वामी है। चन्द्रमा जल तत्व का भी कारक है । इसीलिए रात्रि काल में साधनाओं के सफलीभूत होने की संभावना बढ़ जाती है क्योंकि जल तत्व के द्वारा शरीर के सभी अंगों में ध्वनि या किसी भी रूप में की गई क्रियाएं प्रवाहित होने लगती हैं।
साधना में रात्रि काल का एक और महत्व है। इस समय सभी मानवीय क्रियाएं लगभग सुसुप्तावस्था में आ जाती हैं। व्यवधान और बाधाएं यानि हस्तक्षेप होने की आशंका कम से कमतर हो जाती है। इस समय मस्तिष्क की एकाग्रता का चरम होता है। इसीलिए सारी ऊर्जा लक्षित उद्देश्य की ओर होने लगती है, जिससे सफलता मिलने की गुंजाइश बहुत बढ़ जाती है।

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