मोहिनी विद्या : भगवान कृष्ण थे कुशल प्रयोगकर्ता

तंत्र विद्या के प्राचीन ग्रंथों में वशीकरण और मोहिनी विद्या का विस्तार से वर्णन मिलता है। मोहिनी से प्रभावित व्यक्ति की दशा किसी सम्मोहित व्यक्ति की तरह होती है। यहां तक कि वह चेतन अवस्था में भी सम्मोहित रहता है। तंत्र में मोहिनी विद्या का प्रयोग त्राटक, मंत्र और यंत्र के द्वारा किया जाता है। खास बात यह भी है कि सम्मोहन जीवन के समस्त क्षेत्रों में अपना प्रभाव और महत्व रखता है। आधुनिक युग में भले ही इसे पूरी मान्यता न मिली हो पर इसका इतिहास बहुत पुराना है। इसके सूत्र वेदों में मिलते हैं। इन सबसे अलग मोहिनी विद्या के सबसे कुशल और शक्तिशाली प्रयोगकर्ता भगवान कृष्ण थे। वे मोहिनी और वशीकरण विद्या के पूर्ण आचार्य थे।

tantr1ऋग्वेद में लिखा है-

हस्ताभ्यां दशाखाभ्यां जिह्वा वाचं पुरो गवो।
अनामयिलुभ्यां त्वां ताम्यां स्पृश्यामसि।।

अर्थात: मेरी जिह्वा वाणी को प्रथम प्रेरणा देने वाली है। मैं तुमको दस अंगुली रूपी शाखा वाले अपने दोनों हाथों से स्पर्श करता हूं इससे तुम्हारा रोग दूर होगा और आरोग्य बढ़ेगा।
यह मोहिनी प्रयोग का सबसे सुंदर उदाहरण है। दुर्गा सप्तशती में इस विद्या का उल्लेख कुंजिका स्तोत्र में मिलता है।

मारणं, मोहनं, वश्यं, स्तंभोच्चाटनादिकम्।
पाठ मात्र संसिद्धयेत कुंजिका स्तोत्रम्।।

वानर राज बालि को वरदान प्राप्त था कि उसका विरोधी युद्ध क्षेत्र में उसकी सामना करते ही आधा बल खो देगा। बालि की वाणी और नेत्रों में इतनी प्रबल मोहिनी थी कि जैसे ही वह क्रोध से शत्रु को देखता था, उसकी आधी शक्ति समाप्त हो जाती थी।

Comments