बिगड़ रहा है प्राकृतिक संतुलन, बढ़ रहा है प्रदूषण

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कोई भी जगह हो प्रदूषण के अस्त-व्यस्त होने का अर्थ है पारिस्थतिकीय असंतुलन। आज पर्यावरण संबंधी जागरूकता तो आई है पर सभ्यता के विकास के साथ-साथ प्रकृति पर मानव का वर्चस्व भी बढ़ा है और यही आज पर्यावरण के लिए घातक बन गया है। रोचक ही कहा जाएगा कि जब तक मानव असभ्य था तब तक वह प्रकृति के अनुसार जैविक क्रियाएं करता था। इस तरह प्राकृतिक संतुलन बना रहता था। सभ्यता का विकास क्या हुआ कि मानव विलासी बनता चला गया। फलतः प्रदूषण भी बढ़ता चला गया।

प्रदूषण की गंभीर समस्या पर दुनिया का ध्यान पहली बार तब गया जब स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में 5-10 जून 1972 को संयुक्त राष्ट्र सार्वभौम पर्यावरण सम्मेलन का आयोजन हुआ। धीरे-धीरे पर्यावरण संबंधी प्रश्न संसार के सभी विकसित व विकासशील देशों के अत्यधिक चिंता वाले विषयों से जुड़ता चला गया। फिलहाल उस समय विश्व का सबसे अधिक ध्यान उन स्थितियों की ओर लगातार केंद्रित होता गया जो ज्यादा ही भयावह थीं। इनमें ओजोन परत के बढ़ते छेद, तेजाबी वर्षा और भूमि संबंधी परिवर्तन थे। अनियोजित शहरी विकास, बढ़ते हुए रेगिस्तान और वनों के विनाश की समस्या इनके बाद थी।

जाहिर था कि इन पर अगर काबू किया जाना था, पर यही समस्या विकासशील देशों में गंभीर रूप लेती जा रही है। गंगा-यमुना जैसी देश की प्रमुख नदियों का उद्गम और जलग्रहण क्षेत्र भी हिमालय ही है और वह भौतिक रूप से भी देश की जलवायु को नियंत्रित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। इसके बावजूद लापरवाही और लालच के तहत जानबूझ कर अनदेखा किए जाने से जहां पृथ्वी के 70 प्रतिशत भू भाग पर वन थे वहां आज 16 प्रतिशत वन रह गए हैं। सबसे ज्यादा क्षति हिमालयी वनों को हुई है। ऑक्सीजन जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक है। वायुमंडल में ऑक्सीजन की मात्रा पौधों के प्रकाश संश्लेषण क्रिया द्वारा स्थिर रखी जाती है।

अगर यह संतुलन नहीं रह पाया और वायुमंडल में अवांछित तत्व प्रवेश कर गए तो उसका मौलिक संतुलन प्रभावित होता है। कारखानों और वाहनों से निकला कार्बन का धुआं और अवांछित खनिज तत्व वायुमंडल में इकट्ठे हो रहे हैं, उनसे वर्षा का जल तेजाबी हो जाता है। यह वर्षा जल,पेड़-पौधों और मिट्टी को गहरा नुकसान पहुंचाता है। विषैली गैसों के प्रदूषण का प्रभाव जीवन पर तो पड़ता ही है ऐतिहासिक इमारतों पर भी पड़ रहा है । मथुरा के मंदिर और ताजमहल तक स्टोन कैंसर की चपेट में आ गए हैं। दिल्ली का लाल किला और आगरा फोर्ट अपनी चमक खो रहे हैं। यहां तक कि झीलों की नगरी उदयपुर भी अब प्रदूषण की ज़द में है। हमारी सारी बड़ी नदियां प्रदूषित हैं। क्या कर रहे हैं हम लोग … ? प्रदूषण एक अंतरराष्ट्रीय समस्या बन चुका हैऔर इसका निवारण किसी एक देश के लिए संभव भी नहीं है पर शुरुआत तो सबसे छोटी इकाई यानी घर से ही करनी होगी।

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