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साहित्य

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धूप का एक टुकड़ा

क्या मैं इस बेंच पर बैठ सकती हूं? नहीं, आप उठिए नहीं - मेरे लिए यह कोना ही काफी है। आप शायद हैरान होंगे कि मैं दूसरी बेंच पर क्यों नहीं जाती? इतना बड़ा पार्क - चारों तरफ खाली बेंचें - मैं आपके पास ही क्यों धंसना चाहती हूं? आप बुरा न मानें, तो एक बात कहूं - जिस बेंच पर आप बैठे हैं, वह मेरी है। जी हां, मैं यहां रोज बैठती हूं। नहीं, आप गलत न समझें।

आसमान में मछलियां

वह एक छोटा सा परिवार था जिसमें पिता नहीं थे। पिता की मृत्यु बहुत पहले ही एक दुर्घटना में हो गई थी। अब उस घर में मां ग्रीनऑल्गा और उनका बेटा डेरिक और आया डोरोथी थी। एक दिन डेरिक अपने ही घर में घूमता-घूमता एक ऐसे कमरे में पहुंच गया जो काफी दिनों से बंद था।

आत्माराम

वेदों-ग्राम में महादेव सोनार एक सुविख्यात आदमी था। वह अपने सायबान में प्रात: से संध्या तक अंगीठी के सामने बैठा हुआ खटखट किया करता था। यह लगातार ध्वनि सुनने के लोग इतने अभ्यस्त हो गये थे कि जब किसी कारण से वह बंद हो जाती, तो जान पड़ता था, कोई चीज गायब हो गयी।

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नाविक का फेरा

सागर किनारे भीड़ जमा थी। हर उम्र, मज़हब, वेषभूषा के लोग। कुछ समंदर के सीने को बड़ी ईप्सा से नज़र के आखरी छोर तक देख रहे थे। कुछ नज़रें भीड़ में इस तरह व्यस्त थी जैसे समंदर से कोई वास्ता ही नहीं। कुछ भुट्टा चबा रहे थे, कुछ मूंगफली छील रहे थे और कुछ नारियल पानी पी रहे थे। कुछ बच्चे अपने नन्हें हाथों से रेत के घर बना रहे थे।

बहुरि अकेला …

स्टाफ रूम में गरमागरम बहस चल रही थी। मुझे देखकर क्षणभर को सन्नाटा खिंच गया। मुझे लगा कि कहीं बहस का मुद्दा मैं ही तो नहीं हूं। तभी मिसेज झा ने कहा, लो ये आ गई मिस स्मार्टी। इन्हें भेज दो। बहुत काबिल आयटम हैं। कैसी भी सिच्यूएशन हो ब्रेवली हैंडल करती हैं।

भोलू की पतंग

दोस्ती का कुछ पता नहीं होता। यह कहीं भी और किसी के साथ भी हो सकती है। यह अमीर गरीब का भेद भी नहीं देखती। भोलू झुग्गी- झोपड़ी में रहने वाला बालक था जबकि कमल एक अमीर घर का लड़का था, पर दोनों के बीच एक छोटी सी घटना दोस्ती का करण बन गई।

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सहेलियां …

वे पूरे दस साल बाद मिली थीं मान्या और पवित्रा...दो बचपन की पक्की सहेलियां। उसे देखते ही मान्या उसकी ओर झुक आई। -तेरा नाम मान्या क्यों...?  - और तेरा नाम पवित्रा क्यों ...? पवित्रा मुस्कुराई फिर दोनों खिलखिला कर हंस पड़ीं। हुआ यह था कि पवित्रा का दिल काम की निरंतरता से ऊब गया था। चाहे एक हफ्ते के लिए ही सही वह ऑफिस की भीड़ से दूर कहीं जाकर आराम करना चाहती थी। उसे मान्या का ध्यान आया जो डलहौजी में रहती थी। उसने मान्या को फोन कर के किसी अच्छे से रेजॉर्ट में एक कमरा बुक करवाने को कहा तो मान्या हंसने लगी थी । -पवित्रा बड़े…

मानसरोवर के हंस…

अन्ना अब शायद लिखने के लिए कुछ नहीं रह गया है और अब उसका कुछ अर्थ भी नहीं है मैं पत्र लिखता हूं और उन्हें बम्बई के इस समुद्र में पोस्ट कर देता हूं। पता नहीं वे अपने पतों तक पहुंचते हैं या नहीं। वैसे भी किसी पत्र का अर्थ क्या है, वह पहुंचे या न पहुंचे। पत्र लिखना और कहानियां लिखना लगभग एक सी बात है । कहने के लिए तो सिर्फ एक ही बात है कि हर व्यक्ति की यातना और दु:ख अलग हो सकते हैं, पर उसकी मुक्ति का संघर्ष एक है। सबकी मुक्ति में हर एक की मुक्ति है और एक व्यक्ति की मुक्ति से भी हर एक की मुक्ति का रास्ता खुलता है। अन्ना याद करो…

जामुन का पेड़

रात बड़े जोर का झक्कड़ चला। सेक्रेटेरियट के लॉन में जामुन का एक दरख्त गिर पड़ा। सुबह माली ने देखा कि उसके नीचे एक आदमी दबा पड़ा है। माली दौड़ा चपरासी के पास गया... और मिनटों में गिरे हुए दरख्त के नीचे दबे हुए आदमी के गिर्द मज़मा इकट्ठा हो गया। -बेचारा जामुन का पेड़ कितना फलदार था... एक क्लर्क बोला। -इसकी जामुनें कितनी रसीली होती थीं। दूसरे ने कहा -मैं फलों के मौसम में झोली भर कर ले जाता था मेरे बच्चे इसकी जामुनें बड़ी खुशी से खाते थे... तीसरे ने कहा। -मगर वह आदमी...? माली ने दबे हुए आदमी की तरफ इशारा किया। -हां यह आदमी,…

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एक जीवी, एक रत्नी, एक सपना

पालक एक आने गठ्ठी, टमाटर छह आने रत्तल और हरी मिर्चें एक आने की ढेरी "पता नहीं तरकारी बेचने वाली स्त्री का मुख कैसा था कि मुझे लगा पालक के पत्तों की सारी कोमलता, टमाटरों का सारा रंग और हरी मिर्चों की सारी खुशबू उसके चेहरे पर पुती हुई थी। एक बच्चा उसकी झोली में दूध पी रहा था। एक मुठ्ठी में उसने मां की चोली पकड़ रखी थी और दूसरा हाथ वह बार-बार पालक के पत्तों पर पटकता था। मां कभी उसका हाथ पीछे हटाती थी और कभी पालक की ढेरी को आगे सरकाती थी, पर जब उसे दूसरी तरफ बढ़कर कोई चीज ठीक करनी पड़ती थी, तो बच्चे का हाथ फिर पालक के पत्तों पर…