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हवेली का मुहल्ला

अपनी बीमारी की वजह से सिर्फ अपने बिस्तर तक सिमट कर रह गई है चित्रा, पर बचपन के दौर से लेकर आज तक की स्मृतियां उसके मन में जीवंत हैं।

सफेद सड़क

बर्फ खेतों पर, घास पर, नंगे पेड़ों की शाखों पर गुजरते जंगलों और आंख चुराकर पीछे भागती पहाड़ियों पर उनकी गोद और घरों की ढलवां छतों पर सफेद चूने की हलकी परत  की तरह पड़ी हुई थी। नदी के पानी से भाप उठ रही थी।

जंगली बूटी

अंगूरी अभी आयु की बहुत छोटी थी और दूसरे अंगूरी की मां गठिया के रोग से जुड़ी हुई थी इसलिए भी गौने की बात पांच सालों पर जा पड़ी थी।...फिर एक-एक कर पांच साल भी निकल गये थे और इस साल जब प्रभाती अपने मालिकों से छु्ट्टी लेकर अपने गांव गौना लेने गया था तो अपने मालिकों को पहले ही कह गया था कि या तो वह बहू को भी साथ लाएगा ...

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धूप का एक टुकड़ा

क्या मैं इस बेंच पर बैठ सकती हूं? नहीं, आप उठिए नहीं - मेरे लिए यह कोना ही काफी है। आप शायद हैरान होंगे कि मैं दूसरी बेंच पर क्यों नहीं जाती? इतना बड़ा पार्क - चारों तरफ खाली बेंचें - मैं आपके पास ही क्यों धंसना चाहती हूं? आप बुरा न मानें, तो एक बात कहूं - जिस बेंच पर आप बैठे हैं, वह मेरी है। जी हां, मैं यहां रोज बैठती हूं। नहीं, आप गलत न समझें।

आसमान में मछलियां

वह एक छोटा सा परिवार था जिसमें पिता नहीं थे। पिता की मृत्यु बहुत पहले ही एक दुर्घटना में हो गई थी। अब उस घर में मां ग्रीनऑल्गा और उनका बेटा डेरिक और आया डोरोथी थी। एक दिन डेरिक अपने ही घर में घूमता-घूमता एक ऐसे कमरे में पहुंच गया जो काफी दिनों से बंद था।

आत्माराम

वेदों-ग्राम में महादेव सोनार एक सुविख्यात आदमी था। वह अपने सायबान में प्रात: से संध्या तक अंगीठी के सामने बैठा हुआ खटखट किया करता था। यह लगातार ध्वनि सुनने के लोग इतने अभ्यस्त हो गये थे कि जब किसी कारण से वह बंद हो जाती, तो जान पड़ता था, कोई चीज गायब हो गयी।

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नाविक का फेरा

सागर किनारे भीड़ जमा थी। हर उम्र, मज़हब, वेषभूषा के लोग। कुछ समंदर के सीने को बड़ी ईप्सा से नज़र के आखरी छोर तक देख रहे थे। कुछ नज़रें भीड़ में इस तरह व्यस्त थी जैसे समंदर से कोई वास्ता ही नहीं। कुछ भुट्टा चबा रहे थे, कुछ मूंगफली छील रहे थे और कुछ नारियल पानी पी रहे थे। कुछ बच्चे अपने नन्हें हाथों से रेत के घर बना रहे थे।

बहुरि अकेला …

स्टाफ रूम में गरमागरम बहस चल रही थी। मुझे देखकर क्षणभर को सन्नाटा खिंच गया। मुझे लगा कि कहीं बहस का मुद्दा मैं ही तो नहीं हूं। तभी मिसेज झा ने कहा, लो ये आ गई मिस स्मार्टी। इन्हें भेज दो। बहुत काबिल आयटम हैं। कैसी भी सिच्यूएशन हो ब्रेवली हैंडल करती हैं।

भोलू की पतंग

दोस्ती का कुछ पता नहीं होता। यह कहीं भी और किसी के साथ भी हो सकती है। यह अमीर गरीब का भेद भी नहीं देखती। भोलू झुग्गी- झोपड़ी में रहने वाला बालक था जबकि कमल एक अमीर घर का लड़का था, पर दोनों के बीच एक छोटी सी घटना दोस्ती का करण बन गई।

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सहेलियां …

वे पूरे दस साल बाद मिली थीं मान्या और पवित्रा...दो बचपन की पक्की सहेलियां। उसे देखते ही मान्या उसकी ओर झुक आई। -तेरा नाम मान्या क्यों...?  - और तेरा नाम पवित्रा क्यों ...? पवित्रा मुस्कुराई फिर दोनों खिलखिला कर हंस पड़ीं। हुआ यह था कि पवित्रा का दिल काम की निरंतरता से ऊब गया था। चाहे एक हफ्ते के लिए ही सही वह ऑफिस की भीड़ से दूर कहीं जाकर आराम करना चाहती थी। उसे मान्या का ध्यान आया जो डलहौजी में रहती थी। उसने मान्या को फोन कर के किसी अच्छे से रेजॉर्ट में एक कमरा बुक करवाने को कहा तो मान्या हंसने लगी थी । -पवित्रा बड़े…