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साहित्य

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बहुरि अकेला …

स्टाफ रूम में गरमागरम बहस चल रही थी। मुझे देखकर क्षणभर को सन्नाटा खिंच गया। मुझे लगा कि कहीं बहस का मुद्दा मैं ही तो नहीं हूं। तभी मिसेज झा ने कहा, लो ये आ गई मिस स्मार्टी। इन्हें भेज दो। बहुत काबिल आयटम हैं। कैसी भी सिच्यूएशन हो ब्रेवली हैंडल करती हैं।

भोलू की पतंग

दोस्ती का कुछ पता नहीं होता। यह कहीं भी और किसी के साथ भी हो सकती है। यह अमीर गरीब का भेद भी नहीं देखती। भोलू झुग्गी- झोपड़ी में रहने वाला बालक था जबकि कमल एक अमीर घर का लड़का था, पर दोनों के बीच एक छोटी सी घटना दोस्ती का करण बन गई।

सहेलियां …

वे पूरे दस साल बाद मिली थीं मान्या और पवित्रा...दो बचपन की पक्की सहेलियां। उसे देखते ही मान्या उसकी ओर झुक आई। -तेरा नाम मान्या क्यों...?  - और तेरा नाम पवित्रा क्यों ...? पवित्रा मुस्कुराई फिर दोनों खिलखिला कर हंस पड़ीं। हुआ यह था कि पवित्रा का दिल काम की निरंतरता से ऊब गया था। चाहे एक हफ्ते के लिए ही सही वह ऑफिस की भीड़ से दूर कहीं जाकर आराम करना चाहती थी। उसे मान्या का ध्यान आया जो डलहौजी में रहती थी। उसने मान्या को फोन कर के किसी अच्छे से रेजॉर्ट में एक कमरा बुक करवाने को कहा तो मान्या हंसने लगी थी । -पवित्रा बड़े…

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मानसरोवर के हंस…

अन्ना अब शायद लिखने के लिए कुछ नहीं रह गया है और अब उसका कुछ अर्थ भी नहीं है मैं पत्र लिखता हूं और उन्हें बम्बई के इस समुद्र में पोस्ट कर देता हूं। पता नहीं वे अपने पतों तक पहुंचते हैं या नहीं। वैसे भी किसी पत्र का अर्थ क्या है, वह पहुंचे या न पहुंचे। पत्र लिखना और कहानियां लिखना लगभग एक सी बात है । कहने के लिए तो सिर्फ एक ही बात है कि हर व्यक्ति की यातना और दु:ख अलग हो सकते हैं, पर उसकी मुक्ति का संघर्ष एक है। सबकी मुक्ति में हर एक की मुक्ति है और एक व्यक्ति की मुक्ति से भी हर एक की मुक्ति का रास्ता खुलता है। अन्ना याद करो…

जामुन का पेड़

रात बड़े जोर का झक्कड़ चला। सेक्रेटेरियट के लॉन में जामुन का एक दरख्त गिर पड़ा। सुबह माली ने देखा कि उसके नीचे एक आदमी दबा पड़ा है। माली दौड़ा चपरासी के पास गया... और मिनटों में गिरे हुए दरख्त के नीचे दबे हुए आदमी के गिर्द मज़मा इकट्ठा हो गया। -बेचारा जामुन का पेड़ कितना फलदार था... एक क्लर्क बोला। -इसकी जामुनें कितनी रसीली होती थीं। दूसरे ने कहा -मैं फलों के मौसम में झोली भर कर ले जाता था मेरे बच्चे इसकी जामुनें बड़ी खुशी से खाते थे... तीसरे ने कहा। -मगर वह आदमी...? माली ने दबे हुए आदमी की तरफ इशारा किया। -हां यह आदमी,…

एक जीवी, एक रत्नी, एक सपना

पालक एक आने गठ्ठी, टमाटर छह आने रत्तल और हरी मिर्चें एक आने की ढेरी "पता नहीं तरकारी बेचने वाली स्त्री का मुख कैसा था कि मुझे लगा पालक के पत्तों की सारी कोमलता, टमाटरों का सारा रंग और हरी मिर्चों की सारी खुशबू उसके चेहरे पर पुती हुई थी। एक बच्चा उसकी झोली में दूध पी रहा था। एक मुठ्ठी में उसने मां की चोली पकड़ रखी थी और दूसरा हाथ वह बार-बार पालक के पत्तों पर पटकता था। मां कभी उसका हाथ पीछे हटाती थी और कभी पालक की ढेरी को आगे सरकाती थी, पर जब उसे दूसरी तरफ बढ़कर कोई चीज ठीक करनी पड़ती थी, तो बच्चे का हाथ फिर पालक के पत्तों पर…

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लाल हवेली

ताहिरा ने पास के बर्थ पर सोए अपने पति को देखा और एक लंबी सांस खींचकर करवट बदल ली। कंबल से ढकी रहमान अली की ऊंची तोंद गाड़ी के झकोलों से रह-रहकर कांप रही थी। अभी तीन घंटे और थे। ताहिरा ने अपनी नाजुक कलाई में बंधी हीरे की जगमगाती घड़ी को कोसा, कमबख़्त कितनी देर में घंटी बजा रही थी। रात-भर एक आंख भी नहीं लगी थी उसकी। पास के बर्थ में उसका पति और नीचे के बर्थ में उसकी बेटी सलमा दोनों नींद में बेखबर बेहोश पड़े थे। ताहिरा घबरा कर बैठ गई। क्यों आ गई थी वह पति के कहने में, सौ बहाने बना सकती थी! जो घाव समय और विस्मृति ने पूरा कर…

दहलीज़

पिछली रात रूनी को लगा कि इतने बरसों का कोई पुराना सपना धीमे कदमों से उसके पास चला आया है। वही बंगला था, अलग कोने में पत्तों से घिरा हुआ... वह धीरे-धीरे फाटक के भीतर घुसी है... मौन की अथाह गहराई में लॉन डूबा है... शुरू मार्च की वसंती हवा घास को सिरह-सहला जाती है... बरसों पहले के रिकार्ड की धुन छतरी के नीचे से आ रही है... ताश के पत्ते घास पर बिखरे हैं... लगता है, जैसे शम्मी भाई अभी खिलखिलाकर हंस देंगे और आपा (बरसों पहले जिनका नाम जेली था) बंगले के पिछवाड़े क्यारियों को खोदती हुई पूछेगी- रूनी, जरा मेरे हाथों को तो देख कितने लाल…

एक अच्छा दिन

यह संयोग ही था कि नया साल और जुलेखा का जन्मदिन एक साथ ही पड़ता था। अमूमन सभी दोस्तों को याद भी रहता था इसलिए हैप्पी न्यू ईयर के साथ हैप्पी बर्थडे भी चल जाती थी। इस साल एक और खास बात भी हुई कि उसका वीकली ऑफ भी उसी दिन पड़ गया। जुलेखा ने तय किया कि आज का यह दिन वह सिर्फ अपने लिए रखेगी। सुबह आठ बजे वह धर्मशाला जाने वाली बस में थी, वहां से उसे मैक्लोडगंज जाना था। मैक्लोडगंज की बस में ज्यादा भीड़ नहीं थी, पर जाने का समय आते-आते पूरी बस भर गयी। छोटी बसें पहाड़ी घुमावदार रास्तों के लिए ठीक होती हैं , पर इनकी लदान देख कर छक्के छूट जाते…

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मैदान

हमारी आदत सी है कि हम अक्सर ही कुछ कहीं रख कर भूल जाते हैं। कभी-कभी कुछ यादें भी पुराने खतों की तरह और एक दिन जब कुछ ढूंढने लगते हैं तो जाने कितनी यादों की खिड़कियां खुल जाती हैं. . कभी भी न भूलने वाली यादें, जिनका रंग कभी फीका नहीं होता। जैसे पहले प्यार के एहसास में डूबी कोई शाम , अस्त होते सूरज की रोशनी, पंछियों की आवाजें और महकती सांसों की अनुभूति। बारिश घिर कर आ गयी थी। लगता था जैसे आसमान और धरती के बीच एक चादर सी तन गई हो। शुभा ने उठ कर खिड़की से पर्दा हटा दिया। बारिश की फुहार उसका चेहरा भिगो गई। पहाड़ों पर तेजी से बर्फ…