एक पर्वत ऐसा जहां चार भुजा वाला भील

कांची के राजा रत्नग्रीव ने जिस समय राज-पाट छोड़कर तीर्थाटन करने का मन बनाया। उसी समय उनके दरबार में एक तपस्वी ब्राह्मण उपस्थित हुआ वल्कल वस्त्रों में सज्जित उन तपस्वी का पवित्र शरीर चमक रहा था। राजा ने उनका उचित सत्कार किया और पवित्र तीर्थों के बारे में पूछा। तपस्वी ने कहा- मैंने बहुत सारे तीर्थों का दर्शन किया पर नीलगिरि पर्वत पर जो घटित हुआ वैसा कहीं नहीं हुआ। वहां पर्वत के शिखर पर मुझे ऐसे भील दिखाई दिए जिनकी चार भुजाएं थीं और वे धनुषबाण धारण किए थे। मैंने यही सोचा कि जो स्वरूप देवताओं के लिए भी दुर्लभ था वह भगवान के पार्षदों का स्वरूप इन्हें कैसे प्राप्त हो गया। पूछने पर उन्होंने बताया कि हमारे कुटुंब का एक बालक घूमता हुआ इस पर्वत के शिखर पर चढ़ गया।

neelgiriउसने वहां एक अद्भुत देव मंदिर देखा जिसकी दीवारें सोने की थीं और सीढ़ियों पर अद्भुत मणियां जड़ी हुई थीं। बालक मंदिर के अंदर गया और वहां देवाधिदेव पुरुषोत्तम का दर्शन किया। उनकी उपासना में अनेक देवता लगे हुए थे। वे सभी देवता पूजा कर नैवेद्य अर्पण कर अपने स्थान को चले गए। वहां नैवेद्य का कुछ अंश गिरा हुआ था। बालक ने वही खाया और श्रीविग्रह का दर्शन किया। वहां से ही वह अत्यंत सुंदर और चतुर्भुजधारी हो गया। परिवार के बाकी भीलों ने भी यह सुनने के बाद वहां जाकर दर्शन किया और प्रसाद खाकर चतुर्भुज हो गए। भीलों की बात सुनकर मैंने भी संगम में स्नान किया और फिर नीलाचल पर्वत पर चढ़कर देवतादि से वंदित भगवान का दर्शन किया। महाप्रसाद पाकर मैं भी शंख, चक्र आदि चिन्हों से सुशोभित हो गया हूं। कहते हैं नीलाचल पर्वत पर स्वयं भगवान पुरुषोत्तम निवास करते हैं। वह विश्व वंदित स्थान है पर उसके दर्शन सबको नहीं होते।

राजा यह सुनकर भगवान के दर्शन करने को व्याकुल हो गए उन्होंने पुरवासियों को भी चलने का आदेश दिया। मार्ग में उन्हें गंडकी नदी के दर्शन हुए जहां नदी के अंदर ढेरों शालिग्राम थे और उस नदी के किनारे कितने ही तपस्वी तप कर रहे थे। राजा वहीं बैठ कर तप करने लगे। पांच दिन बीत गए तो स्वयं भगवान पुरुषोत्तम संन्यासी का रूप धारण करके आए।

parshotam-1संन्यासी ने कहा – हे राजन मैं अपनी ज्ञानशक्ति से तीनों कालों की बात जानता हूं इसलिए ध्यान से सुनो कल दोपहर के समय भगवान तुम्हें दर्शन देंगे। तुम अपने पांच आत्मीयों के साथ परम पद को प्राप्त होओगे। कहकर संन्यासी अंतर्धान हो गए तभी तपस्वी ब्राह्मण ने कहा – वे स्वयं भगवान पुरुषोत्तम थे, अब कल तुम नीलगिरि पर्वत पर चढ़ सकते हो और भगवान के दर्शन भी कर सकते हो। राजा ने उसी समय से भजन-कीर्तन और दान-दक्षिणा देना आरंभ किया। दोपहर के समय आकाश से मधुर संगीत की धुन सुनाई दी। सहसा राजा के मस्तक पर फूलों की वर्षा हुई। देवताओं ने कहा – नृपश्रेष्ठ नीलाचल के दर्शन करो। इसी के साथ वह महान पर्वत उनकी आंखों के सामने प्रकट हो गया। करोड़ों सूर्यों के समान उसका प्रकाश ब्रह्मांड में फैल गया। राजा ने इस प्रत्यक्ष दर्शन को सिर झुका कर प्रणाम किया और पर्वत पर चढ़ने लगे। शिखर पर उन्हें रत्नजटित स्वर्ण देवालय दिखा। अंदर सोने का सिंहासन था जिस पर भगवान चतुर्भुज स्वरूप से विराजमान थे राजा ने भगवान की पूजा-अर्चना कर प्रसाद ग्रहण किया। तपस्वी ब्राह्मण और मंत्री आदि नेभी प्रसाद लिया और सभी चतुर्भुज स्वरूप प्राप्त कर वैकुंठधाम को चले गए।

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