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भगवान पर राजनीति नहीं…

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कही-अनकही/अनल पत्रवाल। चलिए आज परंपरा की बात करते हैं। देवभूमि हिमाचल के लगभग हर क्षेत्र में प्राचीन परंपराएं आज तक जीवित हैं और उन्हें पूरी आस्था तथा विश्वास के साथ निभाया जाता है। इसमें कहीं भी किसी तरह के आक्षेप की बात सामने नहीं आती, पर पिछले कुछ दिनों से देखने में आया है कि पालकी प्रकरण पर बहस जारी हो गई है। अब बात पालकी पर आ गई है तो यह जान लेना जरूरी है कि देवभूमि में कुल्लू घाटी का अस्तित्व कितना महत्वपूर्ण है और इसका नाम विश्वपटल पर इतना ख्याति प्राप्त क्यों है। यह देवताओं की घाटी है और अपने विशेष दशहरे के आयोजन के लिए पूरे विश्व में चर्चित है। इस घाटी का सबसे बड़ा आकर्षण भगवान रघुनाथ जी है, जिनके सान्निधय में सभी देवता साल में एक बार दशहरे के उपलक्ष्य पर एकत्र होते हैं। भगवान रघुनाथ के मंदिर का निर्माण राजा जगतसिंह ने करवाया था और मंदिर में स्थापित मूर्ति अयोध्या से लाई गई थी। इस तरह इससे एक इतिहास भी जुड़ता है।

kullu-dusheraभगवान रघुनाथ के मुख्यसेवक महेश्वर सिंह और उनका परिवार आज भी हर उस परंपरा का निर्वहन करता है जो सदियों पहले स्थापित की गई थी। इसी के तहत महेश्वर सिंह का पालकी पर बैठना भी शामिल है। दशहरा उत्सव में निकलने वाली जलेब पर पहले भी विवाद हुआ था और आठ अगस्त, 2004 को भगवान रघुनाथ के दरबार में जगती पूछ का आयोजन हुआ। इस जगती पूछ में जिला के पौने दो सौ देवी देवताओं ने एक सुर में इस परंपरा का समर्थन करते हुए फैसला दिया था। इसलिए परंपरा के तौर पर उनका पालकी पर बैठना अस्वाभाविक तो नहीं ही कहा जा सकता। राजनीति उस समय भी हावी रही थी और आज भी हो रही है। एक भी कटु सत्य है कि राजनीति किसी की नहीं होती और उसके आगे किसी परंपरा,आस्था या विश्वास का कोई मूल्य नहीं। तो एक राजनीतिक इरादे को रंग देने के लिए परंपराओं को भी अब कटघरे में रखने की कोशिश की जाने लगी है। क्या अब इस बात पर भी बहस होना जरूरी हो गया है कि महेश्वर सिंह राज परिवार से ताल्लुक रखते हैं।

mehsbar-singhअगर यह विषय इतना ही महत्वपूर्ण था तो इसे इतने वर्षों तक बहस का मुद्दा क्यों नहीं बनाया गया ? मसला यह नहीं है कि कौन क्या है, सवाल यह है कि क्या अब भगवान पर भी राजनीति होगी… और यह होनी चाहिए या नहीं  ? वैसे अगर देखें तो मात्र कुल्लू का रघुनाथ मंदिर ही नहीं और भी कई ऐसे मंदिर हैं जो निजी व्यवस्था के अंतर्गत चल रहे हैं। हालांकि  अभी भगवान रघुनाथ जी के मंदिर का मामला कोर्ट में विचाराधीन है और वहां से निर्णय आने के बाद ही कोई बात हो सकती है,पर उससे पहले ही जो वाकयुद्ध शुरू हो गया है  उससे स्पष्ट है कि वह मात्र किसी पक्ष का विरोध करने भर को नहीं है । गलत -सही की बात तो दरकिनार, यहां यही सोच हावी है कि सामने वाले को नीचा कैसे दिखाना है। उसके लिए आरोप कैसा भी हो उसे आरोपित करने में क्या जाता है। राजनीति के इस गुस्से का शिकार डीसी कुल्लू को भी होना पड़ा। मेरा कहना है कि कम से कम भगवान को राजनीति से अलग ही रखें इसी में सभी का कल्याण है।

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1 Comment
  1. shaila thakur says

    सही बात है परंपराओं व आस्था को राजनीतिक रंग बिलकुल नहीं देना चाहिए। इन परंपराओं में हमारी संस्कृति की झलक दिखती है।

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