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शिव का सांध्य नृत्य

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शिव का प्रथम नृत्य सृष्टि की गतिशीलता के शास्त्र का पहला छंद है और इसी के साथ मां पार्वती का लास्य नृत्य पृथ्वी पर आनंद और कल्याण की उत्प्रेरणा का फल है। दोनों के संयोग से यह नृत्य पूर्ण होता है और इन्हीं से यह सृष्टि निर्मित हुई है।

कल्पना कीजिए कि कैलाश पर नृत्य हो रहा है भगवान शिवऔरपार्वती नृत्य कर रहे हैं। यह तांडव और लास्य का अद्भुत संयोग है । जगदंबा पार्वती के स्वर्ण पायलों के घुंघरुओं की झंकार और शिव के डिम-डिम डमरू का निनाद वातावरण को मधुमय बना रहा है। धीरे-धीरे सभी देवता अपनी पत्नियों के साथ नटराज के इस सुंदर नृत्य को देखने के लिए वहां उपस्थित हो जाते हैं। नटराज पूरी तरह नृत्य में तल्लीन हैं और मां पार्वती उनका साथ दे रही हैं।
नटराज का शाब्दिक अर्थ है नृत्य करने वालों का सम्राट यानि समस्त संसार के सभी नृत्यरत प्राणियों का नेतृत्वकर्ता।नटराज का अविर्भाव शिव के उस स्वरूप को महिमामयी बनाने के लिए हुआ, जिसका अर्थ बहुआयामी और बहुपक्षीय है। अपनी इस स्थिति के द्वारा नटराज यह सिद्ध करते हैं कि बिना गति के कोई भी जीवन नहीं और जीवन के लिए लयबद्धता अनिवार्य है। भरत मुनि ने शिव के नृत्यों के 108 प्रकार बताए हैं चिदंबरम् के गोपुरम् में ये सभी नृत्य अंकित हैं। शिव का प्रथम नृत्य सृष्टि की गतिशीलता के शास्त्र का पहला छंद है और इसी के साथ मां पार्वती का लास्य नृत्य पृथ्वी पर आनंद और कल्याण की उत्प्रेरणा का फल है। दोनों के संयोग से यह नृत्य पूर्ण होता है और इन्हीं से यह सृष्टि निर्मित हुई है। कहते हैं भगवान शिव ने पृथ्वी पर पहली बार तिलई की रंगभूमि पर संध्या समय नृत्य किया था । इसीलिए इसे सांध्य नृत्य कहा गया।

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