एलियन

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सफर काफी थका देने वाला था। कई संकरी गलियों से होते हुए हम साहिल के घर पहुंचे…

-हद है, कहां रहते हो तुम ? मैं अगर अकेले आना चाहूं तो घर ही भूल जाऊं।
-नहीं यह सामने जो राम मंदिर है, उसे याद रखिएगा फिर आप आसानी से पहुंच जाएंगी।
शाम को हम संकन गार्डन घूमने गए काफी लोग टहल रहे थे। कुछ, एक जगह बैठ कर साहित्य चर्चा में मशगूल थे। मैंने देखा उसी भीड़ में पार्थ भी है, जिसने कभी कहा था, कि वह मुझे प्यार करता है। सफ़ेद शर्ट, काली पैंट, यह मेरी पसंद है, पर आज तो हम अचानक ही मिले। तो क्या उसने मेरी पसंद को अपनी पसंद बना लिया है?
-नींबू की चाय पियोगी? यहां बहुत अच्छी बनती है, उसने मेरे पास आ कर कहा। वह सीधे मेरी ओर देख रहा है उसकी आंखों में तरलता है।
-घर में सब ठीक है, पत्नी-बच्चे ?
– हां…कह कर वह चुप हो गया। एक लड़का चाय लाया, तो उससे चाय ले कर पार्थ ने मुझे थमा दी। चाय सचमुच अच्छी थी। साहिल अपने दोस्तों से जा मिला हम दोनों वहीं बैठे रहे। एक अव्यक्त सी चुप्पी थी हम दोनों के बीच।
-मैं नहीं जानता था कि अलगाव इतना तकलीफ देगा, पर तुम्हारा फैसला ठीक था। जब साथ चलना न हो सके तो अलग हो जाना ही ठीक है।
-शायद,… मैंने कहा।
-मंडी में रुकोगी अभी?
-नहीं कल सुबह कुल्लू निकल जाऊंगी।
-मैं गाड़ी से छोड़ आऊंगा।
-नहीं बस से जाना ठीक रहेगा।
-इतना भी विश्वास नहीं रहा मुझ पर ? उसकी आवाज में कम्पन था।
-ऐसा नहीं है, कह कर मैं उठ खड़ी हुई।
– गुड नाइ,… उसने धीरे से कहा और दूसरी तरफ देखने लगा ।
दूर जहां से सीढ़ियां ऊपर को जाती थीं, वहां से मैंने पलट कर देखा, पार्थ वहीं बैठा था। नींबू की चाय वैसी ही उसके हाथों में थी, शायद एकदम ठंडी। वह अंधेरे में था, दूर से बस उसकी आकृति का पता चल रहा था।
सुबह मैं जल्दी उठी, तैयार हो कर चाय बनाई। साहिल मुझे बस स्टैंड तक छोड़ने आया।

busबस चली तो मैंने वही किताब फिर से खोल ली, दि रिवर हैज नो कैमरा। इस किताब के 90 पेज मैंने कल के सफर में पढ़ लिए थे। दो घंटे के सफर के बाद बस इंटीरियर इलाके में पहुंच गई। सौमित्र स्टॉप पर ही था।
-वैलकम हम कल इंतज़ार कर रहे थे, सोचा, आओगी तो दोस्तों के साथ गपशप करेंगे..
-कल मंडी में स्टे किया था। ऑफिस का कुछ काम था।
-क्या तुम जानती हो कि पहाड़ के साहित्यकारों ने तुम्हारा नाम क्या रखा है? उसकी हंसी में शरारत थी।
-नहीं, पर जानना जरूर चाहूंगी।
-एलियन
– अरे क्या मैं एलियन जैसी दिखती हूं ?
-चेहरे से नहीं, बल्कि वे तुम्हारे काम से आतंकित हैं। दरअसल हर हफ्ते तुम्हारी कोई न कोई कहानी आ ही जाती है उनका कहना है कि हर हफ्ते एक नया राइट अप लिखनेोो वाला एलियन ही हो सकता है।
-एनी वे, मुझे यह नाम पसंद आया पर काश मेरे पास उड़न तश्तरी भी होती तो इतना लंबा और उबाऊ सफर न करना पड़ता। कहने को तो मैं कह गई पर मन की उदासी नहीं छिपा पाई।
बातें करते हम घर पहुंच गए। यह लाल रंग का तिकोनी छत वाला घर था, सेबों और प्लम के दरख्तों की हरियाली के बीच जमीन से उगा हुआ ही लग रहा था। सामने बरामदे में छोटा सा टेंट था।
-यह तम्बू किसका है ?
-मेरा , अक्सर मेरे मित्र आते हैं तो कमरा मैं उनको दे देता हूं और खुद इसमें सो जाता हूं।
-तो जाहिर है महिला मित्र भी आती होंगी।
-तुम आई तो हो., वह शरारत से हंस दिया।
खाना खाने के बाद हम बरामदे में बैठ गए।
– श्रुति कहां है सनी ?
-वह, जब मर्जी होती है आती है , जब चाहती है चली जाती है। अन्ना, शायद मैं उसे प्यार करता हूं, पर इसमें कोई दैहिक भावना नहीं। यह संबंधों की ऐसी गहराई है जहां शरीर की आवश्यकता नहीं रहती।
-यू लॉयर,… मैं हंस दी।
नींद से पलकें भारी होने लगीं तो मैं कमरे में चली गई। सोने से पहले नीहार का फोन आ गया।
-कहां हो?
-चाँद पर, कल ही तो नासा से उड़ान भरी थी, मैं खिलखिला कर हंस दी. .
-बेडा गर्क,… मैं सीरियस हूं यार… हर वक्त का मजाक अच्छा नहीं। आप फरमाइए कि क्या कर रही हैं.?
– मेरा एक दोस्त है जो एक शादीशुदा महिला से प्यार करता है, मैं उसे कंसोल कर रही हूं।
-करती रहो। कह कर उसने फोन काट दिया..
alien-5देर तक मैं चुपचाप छत की ओर देखती रही सौमित्र शायद अब तक अपने तम्बू में सो गया था। अजीब सा एहसास है यह, किसी को अंतरात्मा से प्यार करना, एक लंबे समय तक उसे छू लेने की कामना करना और छू भी लेना।
फिर उसके बाद क्या बचता है? सारा नयापन खत्म बल्कि अपराधबोध भी होता है।
सुबह उठी ही थी कि फिर नीहार का फोन आ गया।
-अन्ना तुम्हें पता है कि मैं तुम्हें इतना पसंद क्यों करता हूं ?
-क्यों ? बताना तो सही।
-इसलिए कि तुम झूठ नहीं बोलतीं। अब रात को तुम झूठ बोल सकती थीं, पर तुमने वही कहा, जो सच था।
-तुम कैसे कह सकते हो कि वह सच था?
बीस सालों की पत्रकारिता में इतना तो सीख ही लिया है। वह हंस दिया।
बाहर अब भी अंधेरा था, मैंने चाय बनाई और बरामदे में रखी चेयर पर बैठ गई।
-यह फाउल प्ले है… टैंट में से सौमित्र की आवाज आई।
-तो तुम जाग रहे हो… सुप्रभातम्
– सोता भी कैसे, मुझ निरीह को ये चिड़ियां सोने कहां देती हैं। मैं अंदर जा कर उसके लिए चाय ले आई।
-थैंक्यू एलियाना, चाय का कप उसने लेते हुए कहा।
-तो तुमने भी मुझे एलियन बना ही दिया ?
-इसलिए कि चाय अच्छी बनी है और परग्रही जरूर कोई जादू जानते होंगे।
-अजीब सी बात है परग्रही जीवों से लोग खौफ भी खाते हैं और उन्हें देखना और छूना भी चाहते हैं. .
-देखो, असाधारण योग्यता हमेशा लोगों को अपनी ओर खींचती है., यह कोई नई बात नहीं चिरंतन से ऐसा होता आया है।
– जाने दो ,अब तुम निकलो इस डिब्बे से बाहर। मेरे कहते ही वह हंसता हुआ बाहर निकल आया।
पहाड़ों पर धुंध की रेशमी परत है, इस समय बारिश थमी हुई है आकाश में एक छोर से दूसरे छोर तक इंद्र धनुष दिखाई दे रहा है। बहुत कम जगह ऐसी होती हैं जब आप इंद्रधनुष की कामना करें और उसे हासिल भी कर लें। यह जगह वैसी ही है। जाने कैसे फ़्लैश की तरह घर याद आया है। नीम की छतनार डालियां ,… खेतों में धान की रोपाई करती, गीत गाती औरतें। मेरी आंखें भर आई हैं। पराई धरती, पराए लोग और खोई हुई पहचान , इन सब के बीच रह कर अपने आपको जिन्दा रखना कितना मुश्किल रहा है मेरे लिए. .
सौमित्र के हाथों का दबाव कंधे पर महसूस कर मैंने मुड़ कर देखा है।
-ना, रोना नहीं, तुम्हारे जैसे लोग मशाल की तरह होते हैं, जिनकी रोशनी में लोग अपनी राहें देखते हैं।
शाम, खुबानी की बगीची से हो कर हम ऊपर की सड़क पर टहलने निकले। सौमित्र ने एक पेड़ जोरों से हिला दिया , टप-टप ढेरों खुबानियां गिर कर बिखर गईं। शरारती बच्चों की तरह हमने खुबानियां ‘इकट्ठी कीं , मैंने उन्हें पर्स में डाल लिया। आगे साफ-सुथरी सड़क थी।
-यह सड़क कहां तक जाती है ? मैंने उमग कर कहा।
एक किलोमीटर तक जा कर ख़त्म हो जाती है। आगे अभी बनी नहीं।
-तो ऐसी सड़क पर जा कर हम क्या करेंगे जो कहीं भी न जाती हो ?
-क्यों क्या एक साफ-सुथरी सड़क पर थोड़ी दूर चलना अच्छा नहीं लगता ?
सौमित्र कोई गीत गुनगुनाने लगा है उसकी आवाज मीठी है, मैं चुप हो कर सुनने लगी हूं। आगे सड़क बंद थी ,सड़क के मुहाने पर झाड़ियां थीं और बगल में एक बड़ी सी चट्टान। सौमित्र उस चट्टान पर चढ़ गया। मैं वहीं घास पर बैठ गई। पर्स खोला तो पर्स चींटियों से भरा था। मैंने पूरा पर्स ही उलट दिया।
-क्या कर रही हो? वह हंसा. .
-मेरे पर्स में चींटियां भर गई हैं।
-सिली, तुमने नीचे की गिरी हुई भी उठा ली होंगी।
एक घंटे वहां रुकने के बाद हम लौट आए।
alien-3मेरे हाथ में कैमरा था मैंने डूबते सूरज की ओर फोकस किया तो उसमें एक चेहरा झांक गया. . अपने सफ़ेद कपड़ों और बड़े बालों की वजह से वह पूरा दरवेश लग रहा था।
-इनसे मिलो , डाक्टर मयंक। कहने को डॉक्टर हैं पर इन्हें पूर्वी-पश्चिमी दर्शन पर पूरा कमांड है। सौमित्र ने कहा। मैंने हाथ जोड़ दिए।
-दार्शनिक विचारधारा पर मेरी कुछ खास पकड़ नहीं , पर अपने कुछ सवालों के जवाब इनसे जरूर जानना चाहूंगी।
-बेशक पूछ सकती हैं। वह मुड़ा। अब मैंने उसे ध्यान से देखा , बौद्धिक प्रखरता उसकी आंखों में स्पष्ट थी. .
-जाने क्यों मुझे लगता है कि मेरे अंदर दो फेज बन गए हैं। मेरा दिल तो बेहद सेंसिटिव हो गया है और दिमाग बेहद समझदार।
– जिंदगी का कोई बड़ा निर्णय आप कैसे लेती हैं ?
-दिमाग से पूछ कर , अपने मस्तिष्क की निर्णय शक्ति पर मुझे विश्वास है…दिल भावुकता में गलतियां करता है ,वहीं दिमाग उसे थप्पड़ मार कर उसे सही रास्ते पर ले आता है..
-ये दोनों ही अलग सिचुएशन हैं , जिन्हें आपने अपने अंदर डिवलप होने दिया है। सच तो यह है कि जिस तरह आप सामने वाले की आंखों में सीधे देखती हैं वैसा साहस किसी आम औरत का नहीं होता। आप में मेल फैक्टर ज्यादा है आपकी आंखें झुकती नहीं, झेंपती नहीं स्थिर रहती हैं। शांत-सीधी सपाट दृष्टि जो सामने वाले को सहम से भर देती है।
-शायद। कह कर मैं चुप हो गई।
-इतना ही नहीं, कहीं-कहीं यह दृष्टि बहुत कठोर हो जाती है ,… तब आप अपने प्रति भी क्रुअल हो जाती हैं।
-हे अर्द्धनारीश्वर तेरी माया तू ही जाने,… सौमित्र खिलखिला कर हंस दिया।
उस रात मयंक घर तक चला आया, देर तक हम तीनों भारतीय दर्शन पर बातें करते रहे। डॉक्टर मयंक दस बजे अपने घर गया. .
– अन्ना सच क्या है मैं नहीं जानता, पर तुम में कुछ जरूर है, यह करोड़पतियों के परिवार से है, किसी के घर नहीं जाता। आज मेरे इस छोटे से घर में कैसे चला आया मैं खुद हैरान हूं।
सौमित्र को मैं प्यार से सनी कहती हूं वह सचमुच प्यारा इंसान है , पर डॉक्टर मयंक से मिल कर मैंने जाना कि बौद्धिक प्रखरता की कोई सीमा नहीं होती। जितना डूबते जाइए रास्ते खुलते जाते हैं। सूर्य की तीखी चमक सा नहीं भोर के नरम उजास सा नरम उजाला आपको रास्ता दिखाता है.. .
दोपहर हम ट्री हाउस देखने गए। पेड़ के ऊपर जाती लकड़ी की सीढ़ियां। नीचे बोर्ड पर लिखा था -कृपया जूते उतार दें।
हमने जूते उतारे और ऊपर गए। छोटा सा गोल कमरा, चमकता फर्श मोटे गद्दे ,कुशन और गाव तकिये. . .पेड़ का तना बीच से निकल कर छत से ऊपर चला गया था। उसी की एक नर्म नाजुक डाली पर सतरंगी फानूस लटक रहा था।
पूरे क्षेत्र में यह अकेला ट्री हाउस था पर इसी की वजह से यह पूरा एरिया ट्री हाउस एरिया कहा जाता था।
रात मैं सो तो गई, पर सारी रात नदी की आवाज मेरे पास आती रही। एक बार तो ऐसा भी लगा कि मैं नदी के ही अंदर लेटी हूं और पानी मेरे ऊपर से हो कर गुजर रहा है। आज यहां का आखिरी दिन है पर यह स्वर्ग छोड़ने का दिल नहीं करता।
नदी यहां से दूर है पर वह हल्के से छूकर गुजर जाने वाली हवा का बराबर साथ देती है। पेड़ों के चंदोबे से छन कर आती चांदनी इतनी अपनी लगती है कि अगर मैं यहां काफी दिन रह जाऊं तो भूल ही जाएगा कि मैं माइग्रेटेड हूं। मैं जिसे चिढ़ कर लोग एलियन कहते हैं औरों के लिए यह मजाक की बात होगी पर मुझे आसमान से धरती पर खींच लेने को यह एक शब्द काफी है। इससे आपको सीधे एहसास हो जाता है कि आप ऐसे लोगों के बीच में हैं, जहां आप किसी का भी यकीन नहीं कर सकते और यही एहसास आपको परग्रही होने के सबसे निकट ले आता है।
आज पूरे चांद की रौशनी है, हवा थोड़ी ठंडी। नदी की आवाज एकदम साफ सुनाई दे रही है पर मेरा मन इतना दुखा हुआ क्यों है? मुझे तो खुश होना चाहिए कि अकेलेपन की ऐसी बादशाहत मुझे मिली है , फिर यह अकेलापन मुझे अंधेरी गुफा सा क्यों लगता है?
अपरिचित धरती बेगाने लोग, किसी का भरोसा नहीं कर पाती।
कही मैं सचमुच एलियन तो नहीं… ?

-प्रिया आनंद

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