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एक हजार साल तक शिला बनी रही अप्सरा रंभा

रंभा अपने रूप और सौन्दर्य के लिए तीनों लोकों में प्रसिद्ध थी

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देवलोक में रंभा अत्यंत सुंदरी मानी जाती है। समुद्रमंथन के समय इसके प्राकट्य के कारण इसे लक्ष्मीस्वरूपा भी माना गया है।रंभा के जीवन की त्रासदी यह रही कि वह ऋषि विश्वामित्र के श्राप के कारण एक हजार साल तक शिला बन कर रही । बाद में एक दूसरे ऋषि के द्वारा उसे इस श्राप से मुक्ति मिली। रंभा को समुद्र-मंथन से निकली हुई अद्भुत खूबसूरत अप्सरा माना जाता है। पुराणों में रंभा का चित्रण एक प्रसिद्ध अप्सरा के रूप में हुआ है। यह कश्यप और प्राधा की पुत्री थी। रंभा अपने रूप और सौन्दर्य के लिए तीनों लोकों में प्रसिद्ध थी तथा कुबेर के पुत्र नलकूबर के साथ पत्नी की तरह रहती थी।

इन्द्र ने देवताओं से रंभा को अपनी राजसभा के लिए प्राप्त किया था।विश्वामित्र की घोर तपस्या से विचलित होकर इंद्र ने रंभा को बुलाकर विश्वामित्र का तप भंग करने के लिए भेजा था। ऋषि इन्द्र का षड्यंत्र समझ गए और उन्होंने रंभा को हज़ार वर्षों तक शिला बनकर रहने का शाप दे डाला । स्कन्दपुराण में कहा गया है कि ‘श्वेतमुनि’ के द्वारा छोड़े गए बाण से यह शिलारूप में कंमितीर्थ में गिरकर मुक्त हुई।

रम्भा तृतीया व्रत ज्येष्ठ माह में शुक्ल पक्ष के तीसरे दिन रखा जाता है।इस दिन अप्सरा रम्भा की पूजा की जाती है। इस दिन विवाहित स्त्रियां गेहूं, अनाज और फूल के साथ चूड़ियों के जोड़े की भी पूजा करती हैं। जिसे अप्सरा रम्भा और देवी लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है। अविवाहित लड़कियां भी अच्छे वर की कामना से इस व्रत को रखती हैं। रम्भा तृतीया का व्रत शीघ्र फलदायी माना जाता है। इस दिन लक्ष्मीजी तथा माता सती को प्रसन्न करने के लिए पूरे विधि-विधान से पूजन किया जाता है।

पूजन के समय ॐ महाकाल्यै नम:, ॐ महालक्ष्म्यै नम:, ॐ महासरस्वत्यै नम: आदि मंत्रों का किया जाता है। रम्भा तृतीया व्रत विशेषत: महिलाओं के लिए है। रम्भा तृतीया को यह नाम इसलिए मिला, क्योंकि रम्भा ने इसे सौभाग्य के लिए किया था। रम्भा तृतीया का व्रत शिव-पार्वतीजी की कृपा पाने, गणेशजी जैसी बुद्धिमान संतान तथा अपने सुहाग की रक्षा के लिए किया जाता है।

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