सबसे अच्छी दिवाली

दिवाली को बस चार दिन रह गए थे सोनू और गुड़िया दोनों ही बेहद खुश थे। दोनों बार-बार अपनी गुल्लकें खनकाते और अंदाजा लगाते कि उसमें कितने पैसे होंगे। दिवाली के दिन क्या-क्या होगा इसकी प्रोग्रामिंग पहले से ही होने लगी थी। 

भाई, मैं अपनी गुल्लक फोड़ कर देखूं इसमें कितने पैसे हैं। घरौंदा बनाने में जुटी गुड़िया ने कहा।

– नहीं अभी से गुल्लक फोड़ देंगे तो मां गुस्से होगी। मैं तब तक लिस्ट बनाता हूं कि क्या-क्या खरीदना है।
-मैं तो इस घर में रहने के लिए एक प्यारी सी बार्बी डॉल लूंगी और उसके लिए फर्नीचर भी।
-और मैं एक अच्छा सा वीडियो गेम लेने की सोच रहा हूं। बचे हुए पैसों से फुलझड़ियां और पटाके खरीदेंगे ।
दिवाली के एक दिन पहले की शाम को उन्होंने अपने गुल्लक फोड़ दिए और बैठकर पैसे गिनने लगे। सोनू के पास पांच सौ इकट्ठे हुए थे और गुड़िया की गुल्लक में पूरे चार सौ रुपए थे। दोनों बेहद खुश थे। उन्होंने मां को अपनी इस बचत की खबर दी और यह भी बताया कि वे इन पैसों का क्या करने वाले हैं।

child11दिवाली की सुबह से हर घर में रंगोली बनने लगी। मां भी आंगन में रंगोली बना रही थीं गुड़िया और सोनू उनकी मदद कर रहे थे। रंगोली बन जाने पर गुड़िया गली में बाहर निकल आई। पीछे सोनू भी आ गया।
-भैया, मीतू नहीं दिखाई दे रहा। मैं सोच रही थी कि हम अपनी आतिशबाजियों में से थोड़े उसे भी दे देते। उसकी मां उसे खरीदने के लिए पैसे नहीं देगी।
मीतू गली की दूसरी तरफ रहता था उसके पिता की मौत हो चुकी थी और मां कुछ घरों में चौका बर्तन कर घर का खर्चा चलाती थी।
-चल देखते हैं मीतू क्या कर रहा है। वे दोनों उसके घर के अंदर गए। अंदर सन्नाटा था वहां कोई भी नहीं था उसके पड़ोसी ने बताया कि अचानक ही मीतू की तबियत खराब हो गई थी और मीतू की मां उसे अस्पताल लेकर गई थी। वे दोनों बुझे मन से फिर अपने घर की सीढ़ियों पर आ बैठे। थोड़ी देर बाद मीतू की मां आती दिखाई दीं। वे भाग कर उनके पास गए।
-आंटी मीतू को क्या हुआ है।
-बहुत तेज बुखार है डाक्टर ने भर्ती कर लिया है। दवाइयां लिखी थीं पर मेरे पास उतने पैसे नहीं थे। मैं जहां काम करती हूं सभी घरों में गई, पर उन्होंने मना कर दिया कहा- अपनी तनख्वाह तुम पहले ही ले चुकी हो, अब हम नहीं दे सकते। वह रोती हुई घर में चली गई।

child9दोनों बच्चे घर में वापस आए। वे अपने पास के रुपए लेकर मीतू के घर चले गए।
आंटी यह लो हमारे पास इतने रुपए हैं। इनसे दवाइयां आ जाएंगी न।
मीतू की मां ने एक नजर दोनों बच्चों को देखा और रो पड़ी – मेरे लिए तो तुम्हीं देवता हो गए। भगवान तुम्हें ढेरों खुशियां दे।
उस शाम सारे घर में रोशनी की लड़ियां जगमगा रही थीं। पूजा होने के बाद मां के साथ सारे घर में दिए रखे। हर कमरे में, चौबारे पर और तुलसी के पास और फिर प्रसाद लेकर बाहर आतिशबाजी देखने चले गए।
मां को कुछ अटपटा सा लगा। बच्चे आतिशबाजी देख रहे थे पर खुद नहीं जला रहे थे। तो क्या वे सारे पैसे खिलौनों में खर्च कर आए थे…? उन्होंने बच्चों के कमरे में जाकर देखा। वहां कोई खिलौना नहीं था। न वीडियो गेम ही था और न ही बार्बी डॉल। हां, आंगन में बने घरौंदे पर नन्हें दीप जगमगा रहे थे।
childबात खुली बच्चों के पिता के घर लौटने पर। उन्होंने बताया कि वे हॉस्पिटल से आ रहे थे..। घर आते वक्त उन्हें मीतू की मां मिली थी उसने बताया कि उसकी दवाइयों के लिए हमारे बच्चों ने पैसे दिए। फिर वे वापस हॉस्पिटल गए अब उसकी हालत स्थिर है पर हमारे बच्चों ने बड़े वक्त पर मदद की। बाकी उसकी देखभाल के लिए वे डाक्टर से कह कर आए थे।
-हमारे बच्चे….मां की आंखों में खुशी केआंसू आ गए।
-ये संस्कार तो तुमने दिए…हैं। उन्होंने सबसे अच्छी दिवाली मनाई है इसलिए तुम्हें थैंक्स … कहकर वे हंस दिए।

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