माता का जंगल

घाघरा नदी के किनारे बसा हुआ एक छोटा सा गांव। वह भरी दोपहर थी… गर्मी के इन दिनों में पशुओं को चराने के लिए काफी चरवाहे इधर-उधर पेड़ों की छाया में बैठे या तो बातें कर रहे थे या पशुओं को चरता छोड़ कर लंबी तान कर सो गए थे। मनीराम को उस दिन काफी थकान थी घर के काम खत्म कर वह सीधा यहां चला आया था इसलिए एक छायादार पेड़ के नीचे उसने सिर पर लपेटा हुआ कपड़ा खोला और ओढ़ कर सो गया। दो घंटे बाद जब उसकी नींद खुली तो उसने देखा कि उसके पशुओं में एक गाय नहीं थी। अपने साथियों से उसने बाकी जानवरों पर निगरानी रखने को कहा और उसे ढूंढने निकल पड़ा। यहां घाघरा नदी काफी नीचाई पर थी इस लिए पशु कभी-कभी उधर पानी की खोज में चले जाते थे। इसलिए मनीराम अपनी गाय ढूंढने उधर ही चला गया।

मीलों तक झाऊ के जंगल फैले थे। लोग इसमें जाने से डरते थे। इसे माता का जंगल कहा जाता था और यह भी कहते थे कि जंगल में उथल-पुथल करने से देवी नाराज होती हैं। झाऊ के जंगल के घनेपन के बीच माता का मंदिर था जिसकी लाल पताका दूर से दिखाई देती थी। मनीराम हिम्मत कर जंगल में गया पर घबराहट से उसका दिल धड़क रहा था। गाय को ढूंढता वह आधे फर्लांग तक अंदर चला गया। पर एक जगह वह ठिठक कर रुक गया सामने जो कुछ था वह उसे हैरान कर देने को काफी था। उसके सामने एक खूबसूरत सी झील थी स्वच्छ बिल्लौरी झलक लिए उसका पानी हवा से हौले-हौले कांप रहा था। इस झील के बारे में उसने कभी नहीं सुना था बस परियों की कहानियों की तरह हवा में बातें फैलती थीं जिन पर वह कम ही यकीन करता था, पर अब तो झील सामने थी। वह प्रशंसा से उस झील को देख रहा था, तभी उसकी नजर पानी पर फिसलती हुई झील की दूसरी तरफ चली गई। वहां एक लड़की बड़े इतमीनान से झील के पानी से अपना चेहरा धो रही थी। उसकी गुलाबी रेशमी साड़ी का पल्लू जमीन को छू रहा था। उसने चेहरा उठाया और मनीराम को देखते ही साड़ी के आंचल से मुंह पोंछती आराम से चलती घने जंगलों में गुम हो गई। मनीराम स्तब्ध सा देखता रहा फिर जंगल से बाहर निकल आया।

mata6कौन थी वह? जंगल में अकेले इस तरह कोई लड़की तो नहीं घूम सकती और फिर उसका पहनावा भी गांव की लड़कियों जैसा नहीं था।
तो क्या यह वही वन देवी थी जिसके बारे में लोग कहा करते थे। वह घर आया…गाय पहले ही घर पहुंच चुकी थी। उस रात उसे दहशत में बुखार हो आया और ठीक होने में भी एक सप्ताह लगाया। एक दो लोगों को उसने इस घटना के बारे में बताया भी तो लोग उसका मजाक बनाने लगे। इसके एक हफ्ते बाद उसी जंगल में देवी पूजन का आयोजन हुआ यह हर साल होता था सारे गांव से चंदा एकत्र किया जाता और फिर पूजा संपन्न होती। उन नौ दिनों में घने जंगल के बीच देवी के भजन सुनाई देते थे। इस बार शहर से आया रमेश देर तक जागता रहा। ढोल- ढमाके की आवाज के बीच वह सो ही नहीं पाया देर रात जब भजन के गीत बंद हो गए तो उसकी आंख लग गई। अचानक सन्नाटे में उसे पायलों की रुनझुन सुनाई दी वह उठ गया। उसने खिड़की से झांक कर देखा घर के सामने वाली सड़क पर एक खूबसूरत सी लड़की चली जा रही थी। उसके खुले हुए रेशमी बाल कमर तक लहरा रहे थे। उसने गुलाबी रेशमी साड़ी पहन रखी थी गले में फूलों की माला देख वह चकित रह गया। यह कैसी लड़की थी जो रात के सन्नाटे में सड़क पर टहल रही थी और गले में फूलों की माला डालने का क्या तुक था ?
वह सीढ़ियां उतरकर बाहर निकल आया। अब वह उससे बीस कदम दूर थी। उसने रमेश को मुड़ कर देखा और मुस्कुराई। वह मंत्र मुग्ध सा उसके पीछे-पीछे चल पड़ा। मोड़ पर पहुंचने तक वह उसके साथ था।
fairy6-आप इतनी रात को क्यों टहलने निकली हैं ..अंधेरे में डर नहीं लगता…?
-डर …किसका डर ? मैं तो रोज इसी समय टहलने निकलती हूं वह मुस्कुराई।
जाने क्या था उस मुस्कुराहट में कि वह सिहर गया।
– तुम्हें वापस जाना हो तो चले जाओ…मुझे आगे जाना है।
.-नहीं मैं आपको घर तक छोड़ देता हूं।
-ठीक है कहकर वह खामोश हो गई…कितनी देर वे चलते रहे रमेश को पता ही नहीं चला।
-मेरा घर आ गया …अब तुम जा सकते हो।
रमेश ने हैरान होकर देखा वह जंगल में मंदिर के सामने खड़ा था अंदर गर्भगृह में अभी भी दीपक जल रहा था।
-आप….यहां …कहां? आगे वह कुछ बोल न पाया।
-यही मेरा घर है कह कर वह सीढ़ियां चढ़कर मंदिर के अंदर चली गई।
रमेश वापस तो आ गया पर उसका दिमाग काम नहीं कर रहा था। क्या यह सच था…क्या ऐसा हो सकता था ?

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