Advertisements

सफेद सड़क

- Advertisement -

सुबह खिड़की के कांच पर भाप जमी थी। भीतर से साफ करना चाहा तो बाहर पानी की लकीरें नरम बर्फ की परत सी जमी रहीं। फिर भी कुछ-कुछ दिखाई देता था। ट्रेन किसी मोड़ पर थी। उसके कूल्हे पर खूबसूरत खम पड़ रहा था। नर्तकी की मुद्रा की तरह। मैं बाहर झांक रहा था…. कुछ देखने के लिए। तभी अपने कुशेट से उठकर जून मेरी पीठ पर अधलेटी होकर चिपक गयी। उसकी रेशमी बांहों ने मेरी बगलों के गलियारे घेर लिए थे। उसके ओठों ने चम्पा के फूल की भीगी पत्तियों की तरह स्पर्श किया और धीरे से कहा नमस्ते ! नमस्ते ! वह ‘नमस्टे’ ही बोल पाती थी।
‘‘बाहर क्या है, जो देख रहे हो ?’’ जून ने पूछा।
‘‘बाहर सर्दी उतर रही है !’’ मैंने कहा।
‘‘हां….यही तो मुश्किल है। सर्दी आते ही मधुमक्खियां चली जाती हैं। तुम भी चले जाओगे।….’’ जून ने कहा।
मेरे पास कोई उत्तर नहीं था। उसे भी शायद किसी उत्तर की जरूरत नहीं थी। वह मेरे कुशेट में ही अधलेटी होकर साथ-साथ बाहर देखने लगी।  बर्फ खेतों पर, घास पर, नंगे पेड़ों की शाखों पर गुजरते जंगलों और आंख चुराकर पीछे भागती पहाड़ियों पर उनकी गोद और घरों की ढलवां छतों पर सफेद चूने की हलकी परत  की तरह पडी हुई थी। नदी के पानी से भाप उठ रही थी। नंगे काले पेड़ों की टहनियों पर बर्फ की सफेद झालरें लटकी हुई थीं। छितरी-छितरी ! 
‘‘तुम्हारी अयोधा में बर्फ पड़ती है ?’’ जून ने पूछा था।
‘‘नहीं !…..’’ मैंने कहा था। जून अयोध्या को अयोधा ही पुकार पाती थी।
‘‘पर तुम्हारे देश में सफेद बजरी वाली सड़कें तो नहीं हैं ?’’ जून ने बड़ी आसानी से पूछा था। पर इस बात को मैं समझ नहीं पाया था। इसका सन्दर्भ क्या था….सफेद बजरी वाली सड़कें !  आखिर इसका मतलब क्या था ?
लेकिन जून की चेतना में सफेद बजरी वाली सड़कें अटकी हुई थी। क्योंकि उसे उसकी असलियत का पता था।
हुआ यह था कि बॉन के बाहरी इलाके में काफी दूर, हम एक म्यूज़ियम देखने पहुंचे थे। जून साथ थी। यह एक वॉर मेमोरियल था म्यूज़ियम से ज्यादा वह कब्रिस्तान था….जहां दूसरे विश्व-युद्ध के शवों को दफनाया गया था। प्रहरी की तरह एक प्रोटेस्टेण्ट चर्च भी वहां मौजूद था। उसमें ताला पड़ा था। कोई पादरी या कीपर वहां नहीं था।
और जब मैं उस स्मारक को देखने के लिए आगे बढ़ने लगा था तो सफेद बजरी की सड़क देखकर मुझे बहुत अच्छा लगा था। कितनी खूबसूरत थी सफेद बजरी वाली सड़क ! भारत की गेरुआ-नारंगी बजरी से अलग….और इससे पहले कि मैं उस सड़क पर कदम रखता जून दौड़ती आयी थी। उसने मुझे दोनों बांहों से पकड़कर एक तरफ खींच लिया और चीखी थी, ‘‘आगे कदम नहीं बढ़ाओगे तुम ! ’’
‘‘क्यों, क्या हुआ ?’’
जून लगभग कांप रही थी। वह मुझे बांहों में पकड़े पागलों की तरह देख रही थी, ‘‘तुम्हें पता है….यह क्या है ?’’
‘‘क्या ! क्या है ?’’
‘‘यह सफेद बजरी वाला रास्ता….यह सड़क……’’
‘‘यह तो बहुत सुन्दर सड़क है !’’
‘‘लेकिन तुम इस पर पैर नहीं रखोगे !’’ जून ने बहुत अधिकार से कहा था और मुझे अपने शरीर के साथ जकड़ लिया था। इस पल उसके शरीर में वह ऊष्मा नहीं थी, जिससे मैं परिचित था। उसके शरीर में भयानक प्रतिरोध था।
‘‘लेकिन बात क्या है जून ?’’ मैंने उसे कन्धों से भरते हुए पूछा था ‘‘यह रास्ता यह सड़क….सफेद बजरी तो बड़ी खूबसूरत लग रही है….हमारे यहां ऐसी बजरी नहीं होती। अगर होती भी है तो मटमैली, गेरुआ या नारंगी बजरी होती है….’’
‘‘वह बहुत खूबसूरत होगी….तुम बहुत खुशनसीब हो ! यह तो बेहद मनहूस और बदसूरत बजरी है…..क्या तुम्हें मालूम नहीं ?’’ जून ने लगभग चीखते हुए पूछा था, ‘‘क्या तुम्हें मालूम नहीं ?’’
‘‘नहीं !’’
‘‘देन लेट बी कर्स ऑन यू ….बट.,..सॉरी…..मैं तुम्हें शाप कैसे दे सकती हूं, क्योंकि तुम तो मासूम हो !’’ कहते हुए जून की आंखों में तरलता तैर गयी थी।
‘‘जून डार्लिंग ! पहेलियां मत बुझाओ, तुम कहना क्या चाहती हो ?’’ मैंने उसे बेबसी से देखते हुए कहा था, क्योंकि वह एक भारतीय लड़की की तरह ही बहुत समर्पित और वीतराग लड़की थी।
‘मुझे मालूम है कि तुम्हें नहीं मालूम…यह, सफेद बजरी सड़क बेकसूर मासूम लोगों की हड्डियों के चूरे से मिलकर बनी है जिन्हें नाज़ियों ने गैस चैम्बर्स में मारा था….उन्हीं की हड्डियों की यह बजरी है !….क्या तुम इस सड़क पर चलना चाहोगे ?’’ जून ने वेधती आंखों से देखते हुए पूछा था। 
तब मेरे दिमाग की धुर्रियां उड़ गयी थीं….मैं सहम गया था….नाज़ियों की नृशंसता के शिकार करोड़ों लोगों की हड्डियों की बजरी वाली सफेद सड़क !…जो कब्रिस्तान तक पहुंचाती थी। जहां एक प्रोटेस्टेण्ट चर्च ताला बन्द किये खड़ा था। 
सन्नाटा और भयानक शून्य।
लगभग वैसा ही सन्नाटा हमारे बीच छा गया था। ट्रेन का कुशेट तो गर्म था और जून के शरीर की गर्मी भी यथावत थी पर उस सड़क ध्यान आते ही मैं भीतर से ठण्डा पड़ गया था। मेरी इस तरह की मनःस्थिति को जून अच्छी तरह समझने लग गयी थी। उसने धीरे से कहा था, ‘‘तुम परेशान हो गये ? मुझे मालूम है तुम्हें कुछ याद आया है…’’
तुम भी परेशान हो मुझे अच्छी तरह मालूम है ! तुम्हीं ने तो बताया था कि तुम्हारे देश में नाजी शक्तियां बहुत प्रबल हो रही हैं….कि उन्होंने अयोधा की मस्जिद को गिरा दिया है…
क्या तुम्हारे यहां भी हजारों-लाखों लोग मारे गये हैं, मैंने तो उसी की वजह से पूछा था कि क्या तुम्हारे देश में भी सफेद बजरी वाले रास्ते हैं मैं तुम्हें परेशान नहीं करना चाहती थी। सर्दी उतर आई है मुझे मालूम है कि अब तुम्हें अपने देश लौटना है….सुनो कोई बोझ लेकर मत जाओ। तुम भी मधुमक्खियों की तरह बिना बताये चले जाओ…सर्दी आ गयी है न…’’ कहते हुए जून ने दूसरी तरफ देखना शुरू कर दिया था। उसकी आंखों में पानी की परत थी। नूरेमबर्ग स्टेशन शायद आनेवाला था।
मैंने जून की ओर देखा। जून ने मेरी ओर। लगा कि वह मुझे ठीक से देख नहीं पा रही थी…मैं भी उसे ठीक से नहीं देख पा रहा था। उसने कई बार पलक झपकाकर उनसे वाइपर का काम लिया था। और तब मैंने आहिस्ता से उसे बांहों में समेट लिया था। मेरे लिए उसका चेहरा अब पानी की सतह के नीचे था। मैंने उससे पूछा था-
‘‘जून ! तुम किस नदी में हो ?’’
‘‘राइन में !’’ और वह धीरे से मुस्करा दी थी। उसके होंठ हल्की लहरों की तरह थरथराये थे, जैसे राइन के पानी को हवा के हाथ ने धीरे से छू लिया हो। ‘तुम किस नदी में हो ?’ यह सवाल अब तक हमारे नितान्त आत्मीय क्षणों का गवाह बन चुका था। जब भी हमारी आंखों में सुख या दुःख का पानी भर आता था, तब हम यही सवाल एक दूसरे से पूछते थे।
‘‘तुम किस नदी में हो ?’’ जून ने पूछा था।
‘‘गंगा में !’’
हम अब एक-दूसरे में समाये हुए थे। ट्रेन रुकी। चम्पा की भीगी पंखुड़ियां सिकुड़कर अलग हो गयीं। खिड़की में एक पेण्टिंग समा गयी। पतझड़ था। मौसम की पहली बर्फ पीछे छूट गयी थी। सामने एक नंगा पेड़ खड़ा था। कुछ पत्तियां अभी भी उसमें लगी हुई थीं। बाहर हवा चली, तो पेड़ पर बैठी पत्तियां चिड़ियों के बच्चों की तरह शाखों से उड़ीं और नीचे बिछे पीले कार्पेट पर आकर बैठ गयीं। हम दोनों ने चिड़ियों के उन बच्चों को साथ-साथ देखा।
‘आंसू हमेशा साथ देते हैं….अन्त तक….’’ जून ने फिर वही वाक्य बोला जो वह बॉन में बोली थी। तब हम बॉन में गंगा की तरह बहती राइन नदी के तट पर खड़े थे, कैनेड़ी ब्रूक….,उस छोटे-से पुल के नीचे। मुंसतर प्लाज़ के पास, जहां बायीं ओर वाली गली में बीथोवन का घर है। दूसरे तट पर मोटर बोट्स खड़ी थीं।
‘‘पता है…..फ्रैंकफर्ट के पास राइन एक बहुत पतली घाटी से गुजरती है। उस पतली-पथरीली घाटी में बीथोवन का उदास संगीत हमेशा गूंजता रहता है और एक लड़की उस शान्त एकान्त में हमेशा गाती रहती है….वह अपने एकान्त में खलल पसन्द नहीं करती…इसलिए जो नावें वहां जाती हैं….पथरीली चट्टानों से टकराकर टूट जाती हैं !’’
‘‘तुम इन दन्त कथाओं में विश्वास करती हो जून ?’’
‘‘हां ! कम-से-कम दन्त कथाएं इतिहास से तो बेहतर हैं। इतिहास हमें डराता है। तुम अयोधा से नहीं डरते ?’’ जून ने बड़ा तीखा सवाल किया था।
‘‘थोड़ा-थोड़ा !’’ मैंने कहा था।
‘‘खैर छोड़ो।’’ कहकर जून ने अपनी बांह मेरी बांह में उलझा दी थी और वहां से बॉन विश्वविद्यालय की ओर ले गयी थी।
‘‘तुम्हें बताऊं ?’’
‘‘क्या ?’’
‘‘मैं इसी विश्वविद्यालय में पढ़ी हूं… पिंक हाउस से लेकर यहां का पूरा इलाका दूसरे-विश्व युद्ध में ध्वस्त हो गया था। यह बॉन यूनिवर्सिटी भी। मेरी मां तब इन खंडहरों में पढ़ने आती थी। उसी ने बताया था कि तब हर विद्यार्थी के लिए आवश्यक था कि पत्थर की ईंट बनाए। मेरी मां ने भी एक ईंट बनायी थी। वह इमारत में जरूर कहीं लगी होगी….लेकिन इमारतें खड़ी हो जाने के बाद भी खंडहर दिखाई देते रहते हैं….नहीं !’’ कहकर जून खामोश हो गयी थी।
अयोध्या की बाबरी मस्जिद का खंडहर तब मेरे सामने तैरने लगा था….चारों तरफ पत्थर की ईंटों का मलबा बिखरा पड़ा था, जैसै वहां बमबारी हो चुकी हो।
ट्रेन कब चल पड़ी थी और कब नूरेमबर्ग स्टेशन आ गया था, पता नहीं चला। ‘‘यहां से इन्साफ की कुछ आवाजें आती हैं, इस शहर ने बर्बरता का उत्तर दिया था !’’ जून ने मेरी बाहों में दस्तक देते हुए कहा, तब समझ में आया कि हमारी ट्रेन नूरेमबर्ग स्टेशन पर खडी़ है।
‘‘हां ! बर्बरता की तरह इन्साफ भी कभी–कभी बहुत बर्बर होता है !….’’ यह एक और आवाज थी जो जून की बात का उत्तर बनकर आयी थी।
सामने देखा तो एक यात्री सामान रखकर बैठ चुका था। उसने बिना किसी औपचारिकता से अपना परिचय दिया, ‘‘मैं डेविड मोर्स हूं। मैं तेहरान और अजरबेज़ान में पहले अंग्रेजी पढ़ाता था। अब अपना देश छोड़कर आस्ट्रिया में बस गया हूं आप लोग भी शायद विएना ही चल रहे हैं !’’
‘‘हां !’’
और जब ट्रेन ने नूरेमबर्ग छोड़ा तो बातें डेविड से ही होने लगीं। जून ने उससे पूछा था, ‘‘आपने अपना मुल्क क्यों छोड़ दिया ?’’ 
‘‘क्योंकि हम इन्सान का इन्तजार करते रहे ?….हमने अपने देश की बर्बरता का मुकाबला बहुत देर से किया। यही तो जर्मनी में हुआ था। हिटलर का नूरेमबर्ग नहीं हैं। हिटलर तो एक घटना बनकर आया था।, बर्बर विचार तो उससे पहले आ गये थे….हमारे देश में भी तेहरान, शीराज़, इस्फहान.. तरबेज़ के लेखकों, पत्रकारों और प्राध्यापकों ने देरी कर दी। इसलिए तो जमाल सादेह, सादिक हिदायत बोजोर्ग जलवी जैसे लेखकों को देश छोड़कर भागना पड़ा था। फिर भी उनकी वर्जित किताबें चोरी-छुपे ईरान में पहुंचती रहीं लेकिन किताबें अकेले तो नहीं लड़ सकतीं !’’ 
अभी ये बातें चल रही थीं कि ट्रेन की रफ्तार धीमी पड़ने लगी।
‘‘पासान !’’ जून बोली।
‘‘मतलब !’’
‘‘बॉर्डर।’’
ट्रेन रुकते ही टिकट, पासपोर्ट, वीज़ा और कस्टम कण्ट्रोल वाले आ गये। चैकिंग शुरू हुई तो जून मुझसे और सटकर बैठ गयी। जून का पासपोर्ट चैक करते हुए कण्ट्रोल वालों में कोई खास उत्सुकता नहीं दिखायी, क्योंकि वह आस्ट्रिया की ही थी। मेरा पासपोर्ट चेक किया तो उसने पूछा—
‘‘इन्दियन !’’
‘‘हां।’’
‘‘मोहम्मदीन !’’
‘‘यस….इण्डियन मुस्लिम ! इण्डियन मोहम्दीन !’’
‘‘मैरिड !’’
‘‘नो…’’
‘‘नो वाइफ !’’ इशारा जून की तरफ था- ‘‘निख्त गूद….यह अच्छा नहीं है…..या…’’
मैं समझ नहीं पा रहा था कि वह इस स्थिति को अच्छा बता रहा था या बुरा। पर वह बोलता जा रहा था- निख्त दिमोक्रातीक दोइचलैन्द….निख्त काफे….बेलकम आस्त्रिया !’’ उसकी बातों पर जून धीरे–धीरे मुस्करा रही थी, तो लग रहा था कि कन्ट्रोल वाला कुछ अच्छा ही बोल रहा है। चैकिंग के बाद जून ने ही बताया, वह कह रहा था-जर्मनी में डेमोक्रेसी नही है, पीने के लिए अच्छी कॉफी भी वहां नहीं मिलती। आस्ट्रिया में तुम्हारा स्वागत है !
लिंज़ क्रास करते हुए जब हम विएना पहुंचे, तब तक शाम हो चुकी थी। डेविड वैस्ट वॉनहोफ स्टेशन पर उतरते ही अलविदा कहके चला गया था। यारगासे में जून का घर था।, कमरे में पहुंचते ही वह मुझ पर बेल की तरह छा गयी। सांसों को जब रास्ता मिला तो मैंने उसकी आंखों में झांकते हुए पूछा था-
‘‘तुम किस नदी में हो ?’’
‘‘डैन्यूब में !…..तुम किस नदी में हो ?’’
‘‘सरयू में ! डैन्यूब कहां है जून ?’’
‘‘डैन्यूब विएना शहर से बाहर बहती है….बीच शहर में डैन्यूब नहर अब बहने लगी है…तुम किस नदी का नाम ले रहे थे ?’’ जून ने पूछा था।
‘‘सरयू का।’’
‘‘वह कहां बहती है ?’’
‘‘अयोध्या में !’’
‘‘तुम तो नदी में नहाते हो ?’’
‘‘हां।’’
‘‘कोई तुम्हें रोकता नहीं…?’’
‘‘रोकेगा कौन…सरयू हमरे देश की नदी है !’’ आदतन ‘हमरे देस’ निकल ही गया था। जून वैसे भी अवधी के इस आकस्मिक फर्क को क्या समझती। मैंने उसे अंग्रेजी में दोहरा दिया था। 
‘‘तुम उस मस्जिद के खंडहर से गुजरते हो ?’’ 
‘‘नहीं वह मेरे रास्ते में नहीं पड़ता। वैसे भी जून हमारी सभ्यता बहुत पुरानी है…..बहुत से धर्मों-पन्थों के खंडहर हमारे यहां पड़े हैं।’’ 
‘‘खंडहरों में से ही नाज़ी निकलते हैं….सावधान रहना !’’ फिर गहरी सांस लेकर उदास होते हुए उसने कहा था। ‘‘मेरी तो दादी हंगेरियन थी और मेरे दादा यहूदी….पर वे ईसाई हो गये थे। प्रोटेस्टेण्ड ईसाई…..पता नहीं हिटलर के किस यातना शिविर में उसकी मौत हुई….. वे तब पादरी थे….और तो कुछ नहीं बचा …..सिर्फ उनकी एक डायरी हमारे पास है…तुम्हें दिखाऊं ?’’ जून ने कहा। 
‘‘दिखाओ !’’
‘‘अच्छा दिखाऊंगी……कल ही ऑल सेण्ट्स डे है और कल ही तुम चले जाओगे…सिर्फ आज की रात बाकी है….चलो घुमा लाऊं।’’
‘‘कहां ?’’
‘‘ग्रिंजिर ! वहां इसी साल की वाइन मिलती है ! चलें !’’
यारगासे में जून के घर के पीछे ही पुराना राजमहल था। हम कमर में बांहें डाले निकल पड़े। डैन्यूब नहर के किनारे-किनारे। पापलर के नंगे पेड़ सन्तों की तरह ख़ड़े थे….अंधेरा तो था पर पतझड़ के कारण काफी दूर बहुत कुछ साफ-साफ दिखाई देता था। छोटी नदी विएन भी मिली। अंगूरी पानी की नदी। वह बहुत व्याकुल थी। राइन और गंगा की तरह शान्त नहीं।
‘‘जून !’’
‘‘हाँ !’’
‘‘यह विएन नदी इतना क्यों अकुला रही है ?’’
‘‘सर्दी उतरने से पहले यह हमेशा ऐसे ही अकुलाती है….शायद मेरी तरह !’’ कहते हुए जून ठिठककर खड़ी हो गयी थी। मैं उसे कन्धों से घेरकर खड़ा हो गया। पता नहीं कितनी देर हम लोग मूर्तियों की तरह निश्चल खड़े रहे-मूर्तियों के उस राजमहल के आगे जहां गेटे और शिलर की मूर्तियां लगी थीं, वहां से उन्होंने आंख खोलकर हमें देखा था…कोहरे का धुआं हमारे चारों ओर भरा था। तभी एक गाड़ी गुजरी थी उसमें बैठा परिवार जलती मोमबत्तियां लेकर गुजरा तो पत्थर-प्रतिमाओं की तरह एक दूसरे में आबद्ध हम एकाएक सांस लेने लगे थे।
‘‘जलती मोमबत्तियां लेकर ये कहां जा रहे हैं ?’’ मैंने जून से पूछा था। 
‘‘कब्रिस्तान जा रहे है आज वीकेण्ड है। आज लोग मृत सम्बन्धियों की कब्रों पर फूल चढ़ाने और मोमबत्तियां जलाने अपने-अपने कब्रितान में जाएंगे।’’ जून ने बताया था। 
‘‘अपने-अपने कब्रिस्तान में !’’ 
‘‘क्यों ? सबका अपना-अपना कब्रिस्तान होता है ! नहीं ?’’ 
‘‘तुम्हारे दादा-दादी का कहां है ?’’ 
‘‘पता नहीं !’’ कुछ पलों के लिए हमारे बीच खामोशी छा गयी थी।
‘‘ग्रिंजिर पहुंचकर हम बहुत-सी बातों को भूल जाएंगे..’’ कहकर उसने मुझे पकड़ा और दूसरी सड़क पर ले आयी थी। वहीं पुराने राजमहल के पास से हमने इकहत्तर नम्बर ट्राम पकड़ी थी-‘‘लेकिन पहले किसी कब्रिस्तान में हो लें….जिन्हें भी याद करना है, उन्हें पहले याद कर लें। आओ…

 

-कमलेश्वर 

Advertisements

- Advertisement -

%d bloggers like this: