हार का बदला लेने पर खरगोशों की खुशी

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बहुत समय पहले की बात है। जब एक कछुआ और खरगोश में दौड़ हुई थी। हालांकि दोनों में बल बराबर था। परिश्रम भी बराबर किया, लेकिन अपने घमंड व आलसीपन से खरगोश अत्‍यन्‍त बिलम्‍ब से पहुंचा तब तक कछुआ दौड़ जीत चुका था। इस घटना को हुए वर्षों बीत गए। पूरी की पूरी खरगोश जाति में ऐसा कोई न हुआ जो इस हार का बदला ले पाता। उधर, कछुए भी अवसर मिलने पर हंसी उड़ाते।
अरे, हमसे कौन दौड़ में जीत सकता है। इनको सोने से समय नहीं; ऐसी बातें आशू और दीपू खरगोशों को कांटों की भांति चुभती।
सोचते…..वह समय कब आयेगा, जब अपनी जाति का बदला लिया जायेगा। यह बदला भी पूरे जंगल के जानवरों, चिड़ियों के सामने हो; तो कितना अच्‍छा रहेगा। कम से कम पूरे जंगल को तो तुरन्‍त ही पता चल जायेगा।

कुछ ही महीनों के बाद ऐसा सुअवसर आ गया। जब जंगल के राजा शेर सिंह ने ओलंपिक मशाल दौड़ की तरह एक दौड़ प्रतियोगिता के आयोजन का निर्णय लिया। निर्णायक मंडल में चिन्‍टू हिरन, सोनू गैंडा व मोन्‍टो जिराफ को रखा गया। प्रतियोगिता के दिन इस जंगल के पशु-पक्षी तो थे ही दूसरे जंगलों के पशु-पक्षी भी आमंत्रित किए गये थे। चिम्‍पू बंदर, जग्‍गा भालू, बेटू कछुआ, अंचल बैल, मटकू गीदड़, चम्‍पा लोमड़ी, भरकम हाथी आदि जानवरों ने भाग लिया, लेकिन फाइनल तक केवल दो ही पहुंचे। एक आषू खरगोश और दूसरा बेटू कछुआ।

फाइनल दौड़ के लिए जंगल के बीचोबीच स्‍थित मैदान को चुना गया। विजेता को मैदान के दूसरी ओर लगे झंडे को लेकर आना था। ऐसी निर्णायकों की ओर से घोषणा कर दी गई। इस बार दौड़ के मैदान में कोई पेड़ अथवा झाड़ी न थी। हरी-हरी घास से भरे मैदान के दूसरी ओर लगा झंडा फहरा रहा था। जंगल जानवरों की चहल-पहल व तालियों की गड़गडा़हट से गूंज रहा था। माइक पर बग्‍गा चीता ने घोषणा की – साथियों अब से कुछ ही क्षणों के बाद दौड़ शुरू होने वाली है। देखना है। वर्षों पहले का इतिहास दोहराया जाता है अथवा नया इतिहास लिखा जाएगा।

एक..दो… तीन… कहते ही दौड़ प्रारम्‍भ हो गई। खरगोश बड़ी तेजी से दौड़ा। आज उसके पास अपनी जाति पर वर्षों से लगे हार के कलंक को मिटाने का अवसर था। भले ही इसके लिए उसके प्राण ही क्‍यों न चले जाएं। उसका मन एकाग्र था। चेहरे पर घमंड का नामोनिशान न था। उधर, बेटू कछुआ भी अपने लक्ष्‍य के प्रति प्रयासरत था। दौड़ता ही चला जा रहा था। सभी पशु-पक्षियों की सांसें रुकी हुई थीं। सबको परिणाम की प्रतीक्षा थी तभी सामने से आशू झंडा लाता हुआ दिखाई दिया। सभी उसके स्‍वागत के लिए उठकर खड़े हो गए। जंगल के खरगोशों में खुशी की लहर दौड़ गई।

निर्णायकों के निर्णय से संचालक बग्‍गा चीता ने सभी को अवगत कराया –

सुनिए……. इस वर्ष की दौड़ का विजेता आशू खरगोश और उप विजेता बेटू कछुआ को घोषित किया जाता है। जंगल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। घोषणा के बाद पुरस्‍कार वितरण हुआ और सभी पशु-पक्षी अपने-अपने घरों को चले गये। खरगोशों को अपनी हार का बदला लेने की प्रसन्‍नता थी तो कछुए इस बात से प्रसन्‍न थे कि उनके कारण ही खरगोशों का घमंड चूर- चूर हुआ था।

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