आर्थिक लाभ देते हैं स्वर्णाकर्षण भैरव

कोलतार से भी गहरा काला रंग, विशाल प्रलंब, स्थूल शरीर, अंगारकाय त्रिनेत्र, काले डरावने चोगेनुमा वस्त्र, रूद्राक्ष की कंठमाला, हाथों में लोहे का भयानक दंड और काले कुत्ते की सवारी – यह है महाभैरव, अर्थात मृत्यु-भय के भारतीय देवता का बाहरी स्वरूप। यह एक ऐतिहासिक सत्य है कि भैरव उग्र कापालिक सम्प्रदाय के देवता हैं और तंत्रशास्त्र में उनकी आराधना को ही प्राधान्य प्राप्त है। कालभैरव की पूजा प्राय: पूरे देश में होती है और अलग-अलग अंचलों में अलग-अलग नामों से वह जाने-पहचाने जाते हैं।

bhairavमहाराष्ट्र में खंडोबा उन्हीं का एक रूप है और खंडोबा की पूजा-अर्चना वहां ग्राम-ग्राम में की जाती है। दक्षिण भारत में भैरव का नाम शास्ता है। वैसे हर जगह एक भयदायी और उग्र देवता के रूप में ही उनकी मान्यता है। भूत, प्रेत, पिशाच, पूतना, कोटरा और रेवती आदि की गणना भगवान शिव के अन्यतम गणों में की जाती है। दूसरे शब्दों में कहें तो विविध रोगों और आपत्तियों-विपत्तियों के वह अधिदेवता हैं। शिव प्रलय के देवता भी हैं, अत: विपत्ति, रोग एवं मृत्यु के समस्त दूत और देवता उनके अपने सैनिक हैं। इन सब गणों के अधिपति या सेनानायक हैं महाभैरव। वह सेनापति हैं जो बीमारी, विपत्ति और विनाश के पार्श्व में उनके संचालक के रूप में सर्वत्र ही उपस्थित दिखाई देते हैं। ‘शिवपुराण’ के अनुसार मार्गशीर्ष मास के कृष्णपक्ष की अष्टमी को मध्यान्ह में भगवान शंकर के अंश से भैरव की उत्पत्ति हुई थी, अतः इस तिथि को काल-भैरवाष्टमी के नाम से भी जाना जाता है। ऐसा कहा गया है कि भगवान शंकर ने इसी अष्टमी को ब्रह्मा के अहंकार को नष्ट किया था।

स्वर्णाकर्षण भैरव काल भैरव का सात्त्विक रूप हैं, जिनकी पूजा धन प्राप्ति के लिए की जाती है। ये हमेशा पाताल में रहते हैं, जैसे सोना धरती के गर्भ में होता है। इनका प्रसाद दूध और मेवा है। यहां मदिरा-मांस सख्त वर्जित है। भैरव रात्रि के देवता माने जाते हैं। इस कारण इनकी साधना का समय मध्य रात्रि यानी रात के 12 से 3 बजे के बीच का है। इनकी उपस्थिति का अनुभव गंध के माध्यम से होता है। शायद यही वजह है कि कुत्ता इनकी सवारी है। कुत्ते की गंध लेने की क्षमता जगजाहिर है। इनकी साधना से अष्ट-दारिद्य्र समाप्त हो सकता है। जो साधक इनकी साधना करता है, उसके जीवन में कभी आर्थिक हानि नहीं होती एवं सिर्फ आर्थिक लाभ देखने मिलता है। इस साधना मे जितना महत्व मंत्र का है उतना ही महत्व यंत्र का है। स्वर्णाकर्षण भैरव यंत्र स्थापन करने से भी अधिकाधिक लाभ होता है।

batuk-bhairavइनकी साधना रात्रि में 11 बजे स्नान करके उत्तर दिशा मे मुख करके की जाती है। वस्त्र-आसन का पीला होना जरूरी है। स्फटिक माला और यंत्र ( अगर है ) को पीले वस्त्र पर रखें और उनका सामान्य पूजन करें। साधना सिर्फ मंगलवार के दिन रात्रि में 11 से 3 बजे के समय में करनी होती है। इसमे 11 माला मंत्र जाप करना आवश्यक है। भोग मे मीठे गुड़ की रोटी चढाने का विधान है और दूसरे दिन सुबह वह रोटी किसी काले रंग के कुत्ते को खिलाएं,काला कुत्ता न मिले तो किसी भी कुत्ते को खिला दीजिए।

ध्यान
ॐ पीतवर्णं चतुर्बाहुं त्रिनेत्रं पीतवाससम्।
अक्षयं स्वर्णमाणिक्य तड़ित-पूरितपात्रकम्॥
अभिलसन् महाशूलं चामरं तोमरोद्वहम्।
सततं चिन्तये देवं भैरवं सर्वसिद्धिदम्॥

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